यहाँ आसमान में कड़क बिजलियाँ चमक रही है। बादलों की गड़गड़ाहट में किसी की आवाज सुनाई नहीं देती। बरसात की बूंदें बड़े ओलों के रूप में गिर रही हैं।
खेतों में गेहूँ कटा पड़ा है। चना मुस्तैदी से खड़ा है। सेम से लेकर बाकी सब्जियाँ झूम रही हैं। लेकिन काले बादल देखकर किसान की आँखें रो रही हैं। वह खेत मे बिजूका बनकर रह गया है, बस।
लगभग 2,600-2,700 वर्ष पूर्व भारत-भारती पर भासमान भास्कर का उदय हुआ। उसने भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित किया। यह सूर्योदय कपिलवस्तु के सिंहासन पर बैठने वाले परमसौभाग्यशाली राजा शुद्धोधन के राजमहल में हुआ। महाराज शुद्धोधन अपनी बड़ी रानी को प्रसव पूर्व रीति के अनुसार उनके पिता के घर (मायके) भेजते हैं। परन्तु मार्ग में ही लुम्बिनी नामक वन्य क्षेत्र में पुत्र का जन्म हो जाता है। वह तेजस्वी बालक जन्म के सात दिन बाद ही मातृछाया से वंचित हो जाता है। बालक का लालन-पालन उसकी विमाता करती हैं। तेजस्वी बालक का राशि नाम गौतम रखा गया। लोकप्रसिद्ध नाम- राजकुमार सिद्धार्थ।
इस श्रृंखला में ‘चार्वाक दर्शन’ की यह अन्तिम कड़ी है, ऐसा विचार कर चार्वाक दर्शन के विषय में संक्षेप में कुछ बातें रखने का प्रयास करते हैं।
भारतीय मत में ज्ञान का आदि स्रोत वेद है। इसमें सभी के सूत्र हैं, ऐसी मान्यता है। इसलिए शुरू वेद से ही करते हैं।
चार्वाक भौतिक सुख की कामना को महत्त्वपूर्ण मानते हैं इस भौतिक उन्नति के लिए वेद में अनेकानेक मंत्रों में प्रार्थना की गई है।
अथर्ववेद का 19/71/1 मंत्र है :
देश के जाने-माने चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता प्रभु जोशी जी ने इसी चार मई को हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं। वे कोरोना संक्रमित थे। लेकिन जाने से पहले से अपने इस वीडियो के जरिए भाषायी सरोकार पर हमारी आँखें खोलने का प्रयास भी कर गए। वे बता गए कि कैसे हमारी राष्ट्र भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को ख़त्म करने की मानो कोई साज़िश हो रही है। और हम उस साज़िश में जाने-अनजाने हिस्सेदार बन रहे हैं। साथ ही हमें चेता गए कि अगर हम आज सचेत नहीं हुए तो सम्भवत: कल को हमारी पहचान का संकट भी हमारे सामने उपस्थित हो सकता है।
भौतिक उन्नति करना यानि आज के सन्दर्भ में कहें तो पैसा कमाना। सामान्य तौर पर इसे बुरा नहीं माना जाता। लेकिन हमें यह पता होना चाहिए कि जीवन का उद्देश्य क्या है। अन्यथा हम मानव नहीं रह जाते। मात्र एक जीवरूप रह जाते हैं, जो पेट भरता है। चाहे इस पेट के लिए किसी की जान ही क्यों न लेनी पड़े। कहीं-कहीं हम मानवत्व से गिरकर राक्षसत्व तक पहुँच जाते हैं, इसके लिए। यह होता कब है? जब हम केवल भौतिक उन्नति की तरफ अग्रसर रहते हैं। चार्वाक के अनुयायी अक्सर यही करते हैं। केवल भौतिक उन्नति को ध्येय मानकर अपने जीवन को कहीं न कहीं दुःख के गर्त धँसा लेते हैं।
पानी नीला था, पानी नदी में था। नदी धरती पर थी, धरती पर पेड़ थे। पर पेड़ हरे-भरे थे। धरती के ऊपर एक आसमान था। आसमान नीला था। आसमान में पक्षी जो उड़ते थे, वे रंग-बिरंगे थे। कोई काला, कोई नीला, कोई हरा, कोई बैगनी, कोई जामुनी, कोई लाल और कोई-कोई इन सब रंगों से मिला-जुला हुआ करता था। सभी पक्षी छत के ऊपर से निकलते तो मेरे आसमान का नीला रंग छुप जाता। उनकी छाँह पानी में नजर आती तो पानी का नीला रंग भी छुप जाता।
अभी 22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ था। यह पहला अवसर है, जब पूरी दुनिया के ‘मानव’ एक ही समय में एक जैसी महामारी से पीड़ित है। और इससे बड़े आश्चर्य की बात है कि यह महामारी मानव को छोड़कर अन्य समस्त प्राणियों, समस्त प्रकृति के लिए वरदान बनकर आई है।
यह भी शुरुआत ही है। लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो गया है। जीवन कुल चार मकानों के इर्द-गिर्द समेट कर रख लिया है मानो। पहली धुँधली स्मृति रज्जब अली खाँ वाले रोड के मकान की है। दूसरी, बजरंग पूरे में हनुमान मन्दिर के सामने वाले मकान की। तीसरी, जच्चा खाने वाले रोड के मकान की। और चौथी, इस स्थायी मकान की, जहाँ से लगता है, अब विदाई का समय करीब आ गया है। जैसे कबीर कहते हैं, "चार जना मिल माथो उठायो और बाँधी काठ की घोड़ी"।
जाने-माने लेखक संदीप नाईक जी की 'एकांत की अकुलाहट' श्रृंखला का हम दिन बदल रहे हैं। इस श्रृंखला की अगली कड़ियॉ॑ अब हर शनिवार को आया करेंगी। #अपनीडिजिटलडायरी के पाठक-सहभागियों के आग्रह का सम्मान करते हुए यह फ़ैसला लिया गया है।
डायरी से जुड़े कई लोगों का कहना था कि दो पठनीय श्रृंखलाओं को हम एक के बाद एक लगा रहे हैं। पहले मंगलवार को अनुज राज पाठक की 'भारतीय दर्शन' श्रृंखला। फिर अगले ही दिन संदीप जी की 'एकांत की अकुलाहट'। लेकिन अगर इनके बीच दो-तीन दिन का अन्तराल होता तो बेहतर रहता।
जीवन में कई बार छोटी-छोटी कहानियाँ बड़ी सीख दे जाती हैं। लेकिन वे कहानियाँ सबसे सुन्दर होती हैं, जो इंसानियत का पाठ पढ़ाती हैं।
इस छोटी-सी कहानी को सुनकर महसूस किया जा सकता है कि हमें किस तरह सबसे पहले अपने कर्त्तव्य पर ध्यान देना चाहिए। पैसा तो आना-जाना है। इस पल किसी हाथ में है, तो अगले में और के हाथ में होगा।