रोचक-सोचक

आभासी दुनिया में सामूहिक बलात्कार! यह दावा हमें सोचने पर मजबूर जरूर करेगा

टीम डायरी, 4/2/2022

आभासी दुनिया (Vertual World) में कुछ भी हो सकता है। किसी के साथ सामूहिक बलात्कार भी। जी, ब्रिटेन की एक 43 वर्षीय भारतवंशी महिला नीना जेन पटेल ने दावा किया है कि फेसबुक-मेटावर्स (Facbook-Metaverse) के आभासी प्लेटफॉर्म ‘होराइजन वेन्यूज’ (Horizon Venues) में उनके साथ तीन-चार लोगों ने ‘वर्चुअली सामूहिक बलात्कार’ किया। यूजर्स ‘होराइजन वेन्यूज’ में अपने ही आभासी किरदार (Avatar) बनकर एक अलग ही दुनिया में विचरण करते हैं।

अक्सर समाधान समस्या के साथ ही होता है, लेकिन हम देख नहीं पाते।

नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 31/1/2022

वाक़या जितना रोचक है, उतना सोचक भी। आज सुबह-सुबह काम करने के लिए जैसे ही कंप्यूटर खोला, उसमें दाहिनी तरफ से विज्ञापनों के नोटिफिकेशंस (Notificatoions) की जैसे बमबारी होने लगी। हर आधे-एक मिनट में एक ‘टुन्न’, फिर ‘टुन्न’। मतजब ऐसा कि आधे घंटे में भी दिमाग झन्ना गया। बीते रोज कंप्यूटर बन्द करते समय कहीं कोई अनदेखी हो गई होगी, जिसका नतीज़ा इस तरह सामने आ रहा था। चूँकि अपना कंप्यूटर का ज्ञान कामचलाऊ स्तर का ही है, इसलिए बहुत देर तक तो सूझा ही नहीं कि ये नोटिफिकेशंस आख़िर आ क्यों रहे हैं? और इन्हें बन्द कैसे किया जाए?

ये 65 साल से ऊपर के युवा, जिंदगी को ‘जलेबी की तरह’ बताते ही नहीं चबाते भी हैं

टीम डायरी, 13/1/2022

बड़ा रोचक-सोचक है, इनका जमावड़ा। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक जगह है, शाहपुरा। वहीं के आसपास के यही कोई 65 से 85 साल के करीब 14-15 ‘युवा’, जी हाँ युवा ही, मंडली के किसी एक सदस्य के घर पर हर महीने जुटते हैं। कोशिश होती है, महीने की शुरुआत में ही यह जुटान हो जाए। इस दौरान गप्पें होती हैं। ठहाके गूँजते हैं। शेरो-शायरी, कविताओं के दौर चलते है। दिल की बात और जज़्बात भी साझा करते हैं। फिर दावत होती है। और इस दावत में जलेबी ज़रूर होती है। 

स्वच्छता अभियान पर गैर-राजनीतिक चर्चा!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 25/11/2021

दो अधेड़ और काफ़ी हद तक प्रबुद्ध सुअर, हाँ भाई सुअर ही, अपनी किसी राष्ट्रीय समस्या पर चर्चा कर रहे हैं। चूँकि दोनों प्रबुद्ध हैं तो सुअर होने की नियति से ऊपर उठकर चर्चा करना उनका नैतिक दायित्व है। वे इस समय देश में स्वच्छता की समस्या पर चर्चा कर रहे हैं। उनके लिए स्वच्छता ही समस्या है। चूँकि समस्या

राजनीति का पटाखा बाज़ार : मोदी बम, सिद्धू रॉकेट, केजरी तड़तड़ी.. और भी बहुत कुछ!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 5/11/2021

अब मार्केट में देवी-देवताओं के नाम वाले बम और पटाखे तो नहीं हैं, लेकिन नेताओं के नाम वाले पटाखों की भरमार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिशा-निर्देशों में कहा है कि पटाखे पॉल्यूशन-फ्री होने चाहिए। यानि उनसे किसी तरह का प्रदूषण न फैले। लेकिन इन नेता छाप पटाखों पर ये दिशा-निर्देश लागू नहीं होते। इसलिए आम आदमी को मशविरा दिया जाता है कि इनका इस्तेमाल सोच-विचारकर ही करें। 

बेटा! नाहक गरमी मत दिखा, हमने इसे घर की लक्ष्मी को निकालते देखा है

समीर, भोपाल मध्य प्रदेश से, 1/11/2021

घटना बहुत पुरानी नहीं है। लेकिन समय वह था, जब देश में धन-समृद्धि अधिक थी। मग़र फिर भी किसी ब्राह्मण का धनवान होना तो एक अनहोनी घटना ही होती थी। ऐसे ही, एक अत्यंत विरल महानुभव हमारे गाँव के हरिप्रसाद व्यास थे। व्यास जी के पास कोई दो सैकड़ा बीघा ज़मीन थी। बैलों की 30 से कम जोड़ी कभी नहीं रहती थीं उनके यहाँ। पाँच सौ से अधिक गायें थीं। सिर्फ़ गाय-बैलों की देखरेख के लिए पंद्रह-सोलह लोग थे। खेती के कामों के लिए हाली अलग थे। पंडित जी स्वभाव से थोड़े तेज थे, लेकिन अपने धर्मसम्मत आचरण, समझबूझ और व्यवहार से आसपास के 40 गाँवों में उनका सम्मान था। गाँव में किसी को भी दूध-दही- मठे की ज़रूर

जब देश के गृह मंत्री बोल रहे हैं तो ख़बरदार, डरना सख़्त मना है!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 28/10/2021

अगर देश के गृह मंत्री बोल रहे हैं कि अब किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है तो फिर वाक़ई डरने की ज़रूरत नहीं ही होगी। सिद्धान्तत: ऐसा माना जा सकता है। पर ऐसे भी कैसे मान लें? इसकी ज़मीनी स्तर पर पुष्टि भी तो ज़रूरी है। सो, यही पुष्ट करने के लिए रिपोर्टर सीधे पहुँच गया एक आम आदमी के पास। इतिहास गवाह है कि सबसे ज़्यादा डर तो आम आदमी को ही लगता है। इसलिए डर के स्तर के बारे में असली पुष्टि तो आम आदमी से ही हो सकती थी।  

“आप रिपोर्टर ही हो, इस बात की क्या गारंटी?” इधर-उधर देखकर आम आदमी ने पूछा। वह इन्टरव्यू से बचने का कोई न कोई रास्ता तलाश रहा है। बेमतलब का लफड़ा नहीं चाहता। 

निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोग बड़ी संख्या में नौकरियाँ क्यों छोड़ रहे हैं? 

निकेश जैन, बेंगलुरु, कर्नाटक से, 18/10/2021

भारत के बड़े समाचार चैनल में काम करने वाली युवा पत्रकार सौम्या सिंह ने अभी ही नौकरी छोड़ी है। वैसे, यह कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन सोशल मीडिया (LinkedIn) पर उन्होंने नौकरी छोड़ने की सूचना देते हुए जो लिखा, वह ज़रूर बड़ी बात है। सौम्या ने लिखा, “मैंने नौकरी के साथ ज़हरीला वातावरण भी छोड़ दिया है।.. अब मैं बहुत राहत महसूस कर रही हूँ।” इसके बाद उनके जानने वालों ने उन्हीं के अन्दाज़ में उन्हें बधाइयाँ दीं। हालाँकि यह कोई इक़लौता उदाहरण नहीं है। ... क़रीब 70 फ़ीसद लोग ऐसे ही कारणों से और बेहतर विकल्पों के लिए इस्तीफ़ा देने को तैयार हैं। 

...और रावण ने आत्महत्या कर ली!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 14/10/2021

जैसे-जैसे विजयादशमी नज़दीक आती है, बड़े रावण की छोटे वाले से कोफ़्त बढ़ती जाती है। विजयादशमी के दिन तो वह फूटी आँख नहीं सुहाता। सोचता, यह जितनी जल्दी यहाँ से टले, उतना अच्छा। लाज़िमी भी है। मंच पर भाषण वो दे, समिति वालों को चन्दा वो दे और सारा अटेंशन लूट ले जाए मैदान में खड़ा छटाँक भर का रावण। क़द बड़ा हुआ तो क्या हुआ, रावणत्व में तो छोटा ही है, बड़े वाले की तुलना में छटाँक भर का।

मसख़रा होना राजनीति की अनिवार्य योग्यता है... ठोको ताली!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 7/10/2021

हम मसख़रों पर हँस सकते हैं, लेकिन उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। क्योंकि इसका मतलब होगा, देश की पूरी राजनीति और लोकतंत्र को ख़तरे में डाल देना। याद रखें, उन्हें लोकतंत्र को गाहे-बगाहे ख़तरे में डालने का अधिकार है, हमें नहीं। तो हम क्या करें? 

एक मसख़रे से बात ही कर लेते हैं। 

आप मसख़रे होकर भी राजनीति में हैं? 

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