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बेटा! मेरे नाम की चिट्ठी भेज दे, अब भगवान मुझे बुला ले

ये एक माँ के बोल हैं। सुनकर मन खिन्न रहा दिनभर। समझ नहीं आया कि क्या करूँ, किससे कहूँ। कैसे मदद करूँ। उस माँ की, जिसे किसी से शिकायत नहीं है। बस एक इल्तिजा है। यही कि कोई “भगवान को चिट्ठी लिख दे कि इस बूढ़ी औरत को वह अपने पास बुला ले।”

मई माह, कभी बारात की सामूहिक मेहमाननवाज़ी का महीना भी होता था, याद है?

वैश्विक महामारी ‘कोरोना’ के इस दौर में देशव्यापी तालाबन्दी है। इसलिए शादी-ब्याह भी नहीं हो रहे हैं। वरना अप्रैल, मई, जून के महीनों में तो जैसे हर तरफ़ शादियों की बहार होती है। हालाँकि आज से 20-25 बरस पहले की शादियों जैसी शादियाँ अब कहाँ होती हैं?

माँ कहती हैं- ये खदेड़े गए हैं, नहीं तो जान पर जोख़िम लेकर कोई यूँ नहीं निकलता!

उस रोज़ कामगारों के रेले-दर-रेले से गुज़रते हुए सिर्फ़ मैं ही बेचैन नहीं था। मेरे साथ गाड़ी की पिछली सीट में सवार माँ भी यह सब देखकर उतनी ही हैरान-परेशान हो रही थीं। उन्होंने जीवन के 64 बसन्त देखे हैं। लेकिन उन्होंने भी इससे पहले अपने जीवन में ‘देस-परदेस’ के बीच इस तरह का संघर्ष नहीं देखा। अपने ‘देस’ जाने की ऐसी भगदड़, ऐसी बेचैनी, ऐसी बदहवासी नहीं देखी कभी।

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