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अफ़सर रिश्वत ले रहे, कोई बात नहीं; पर पकड़ में क्यों आ रहे?

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 23/9/2021

वैसे तो ऐसे नाक़ारा देशभर में मिल जाएँगे, लेकिन इन दिनों मध्य प्रदेश में ये कुछ ज़्यादा ही पाए जा रहे हैं। अख़बार आए दिन ऐसे नाक़ारा लोगों की ख़बरों से भरे पड़े हैं। जिधर देखो, उधर कोई न कोई छोटा-बड़ा अफ़सर रिश्वत लेते पकड़ में आ रहा है। खलबली मची हुई है। पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लग रहे हैं। अब जितने मुँह, उतनी बातें...

“वाक़ई बड़ी शर्म की बात है। ऐसे ही लोगों की वज़ह से हमारी पूरी बरादरी बदनाम हो जाती है।” 

कानून के लम्बे हाथों की दुहाई मत दो यार...ये हमने ठाकुर को लौटा दिए हैं...!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 16/9/2021

बीते दिनों मध्य प्रदेश के एक शहर में 800 से भी अधिक पुलिसकर्मियों ने मार्चपास्ट किया। मक़सद अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा करना था। इससे अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा हुआ होगा, ऐसा माना जा सकता है। क्योंकि जिन क्षेत्रों के कस्बा निरीक्षक (टीआई), पुलिसकर्मी इत्यादि उस रैलीनुमा मार्चपास्ट में शामिल हुए, उन क्षेत्रों में उस दिन एक भी अपराध न होने की ख़बर है। वैसे, ख़बर के अलग-अलग अर्थ लगाने के लिए पाठक स्वतंत्र हैं। 

बुद्ध कुछ प्रश्नों पर मौन हो जाते हैं, मुस्कुरा उठते हैं, क्यों?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 14/9/2021

एक बार बुद्ध के पास मौलुंकपुत्त नामक व्यक्ति आया। उसने बुद्ध से पूछा कि क्या वाक़ई ईश्वर है? 

बुद्ध ने ज़वाब दिया, “क्या वाक़ई में तुम्हें जानने की इच्छा है कि ईश्वर है या नहीं? या फिर तुम ऐसे ही पूछ रहे हो?” 

मौलुंकपुत्त ने बुद्ध से कहा, “बिल्कुल जानना है, मैं इतनी दूर आप से यही जानने आया हूँ।” 

मौलुंकपुत्त को लगा कि बुद्ध उसे गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं, तो उसने कहा, “मैंने कई विद्वानों से इस प्रश्न का ज़वाब माँगा। लेकिन कभी मिला नहीं।”  

महात्मा बुद्ध आत्मा को क्यों नकार देते हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 7/9/2021

किन्हीं सेठ जी को अपने धन पर बहुत गर्व था। वे जब किसी को धन से मदद करते, तो सब जगह उसका बख़ान किया करते थे। अपना ही गौरवगान करते। एक दिन उन्हें पता चला कि नगर में महात्मा बुद्ध आए हैं। उन्होंने सोचा- क्यों न, महात्मा जी को कुछ भेंट दी जाए। थोड़ा पुण्य अर्जित कर लिया जाए। लिहाज़ा, वह हजार स्वर्ण मुद्राएँ लेकर बुद्ध के पास पहुँच गए। अभिवादन किया और पास ही बैठ गए। बुद्ध ने उनके आने का कारण पूछा, तो पहले उन्होंने अपनी दानशीलता की स्वयं प्रशंसा की। फिर बोले, “महात्मन्, आपके पास धन का अभाव रहता होगा। इसलिए मैं आपके लिए कुछ भेंट लाया हूँ। कृपया, इसे ग्रहण करें।” इसके बाद उन्होंने स

अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 5/9/2021

हम सब अधूरे हैं। आधे-अधूरे काम करते हैं। अधूरेपन में जीते हैं। अधूरे रहकर ही जीवन समाप्त करते हैं। अपने अधूरेपन के कारण ही जीवन मुकम्मल हो पाता है। --- हम अपने आपको इस क़दर अधूरा छोड़ते हैं कि किसी न किसी को उसे पूरा करना पड़ता है। जो पूरा करने का मुग़ालता रखता है, वह भी बहुत संत्रास में जीता है। पूरापन असल में कुछ होता ही नहीं है। --- जो चीज़ें अपने भव्य और सम्पूर्ण स्वरूप में दिखाई देती हैं, वह किसी समय-सीमा और हड़बड़ाहट का अन्तिम परिणाम नहीं बल्कि किसी तरह से ख़त्म कर नए अधूरे को थामने की पुरज़ोर कोशिश है। क्योंकि मानव मन एक ही जगह लम्बे समय तक टिक नहीं सकता। ---

कृष्ण और बुद्ध के बीच मौलिक अन्तर क्या हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 31/8/2021

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर कृष्ण के विविध रूपों की लोगों ने अपने-अपने मतानुसार आराधना की। प्राय: श्रीक़ष्ण का बाल रूप और उनके उस स्वरूप की लीलाएँ हर व्यक्ति के मन को मोह लेती हैं। सभी के मन को आकृष्ट करती हैं। इसका कारण है कि बाल स्वभाव, बाल रूप सहज, सरल और मोहक ही होता है। लेकिन वही बालक जब बड़ा होकर युवक बन जाता है और समाज में अपनी पहचान स्थापित करता है, तब वह हर किसी के लिए मोहक नहीं रह जाता। कारण कि युवा अपनी योजना, अपनी शैली, अपने विचारों का पुंज होता है। इसलिए उससे सम्बन्धित लोग उसकी इन तमाम चीजों को देखते हैं, आकलन करते हैं,

हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 28/8/2021

जीवन में जब होने, खोने और पाने के मायने जल्दी समझ आ जाते हैं, तो समझदार व्यक्ति ही आगे जाने या ख़ुद को ख़त्म करने का निर्णय लेता है।

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बुद्ध की बताई ‘सम्यक समाधि’, ‘गुरुओं’ की तरह, अर्जुन के जैसी

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 24/8/2021

आतंक के शिकंजे में दबोचे जा चुके अफ़ग़ानिस्तान से आज, 24 अगस्त 2021 को गुरु ग्रन्थ साहिब की तीन प्रतियाँ भारत आई हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब, यानि वह पुस्तक जिसमें गुरुओं की शिक्षाएँ हैं। जिसमें गुरुओं के बताए मार्ग का उल्लेख है। जिसमें गुरुओं की ओर से मानव जीवन के लिए तय लक्ष्यों का ज़िक्र है। वे गुरु, जिन्होंने हिन्दुस्तान के एक काल-विशेष में सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपना सब कुछ अर्पित कर दिया। मानवता, सभ्यता, संस्कृति, अस्मिता की रक्षा के लिए अपना कुछ भी अपने पास नहीं रखा। जो धारण किया, वह भी सिर्फ़ इन्हीं लक्ष्यों के लिए। 

अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 21/8/2021

यूँ तो रोज ही छुट्टी है, लेकिन इन दिनों रविवार का अपना मज़ा है। लिहाज़ा उस रोज़ सोचा कि कुछ बटन टूट गए हैं, उन्हें टाँक लूँ कमीज़ में। सो, सुई धागा खोजा पर मिला नहीं। दोपहर को याद आया। फिर जब सुई धागा मिला, तो बटन नहीं मिले। बटन मिले तो उनमें से लाल वाले गायब थे, जिनकी ज़रूरत थी। अन्त में वह कमीज़ ही भूल गया, जिसके बटन टूट गए थे। 

काबुलीवाला से संयुक्त राष्ट्र- हम अफ़ग़ानिस्तान के ड्रायफ्रूट्स के लिए चिन्तित हैं!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 19/8/2021

काबुलीवाला ... हाँ, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की कहानी का पात्र काबुलीवाला। पाँच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त काबुलीवाला। कोलकाता की गलियों में घूम-घूमकर सूखे मेवे (ड्रायफ्रूट्स) बेचता काबुलीवाला। मिनी में अपनी बेटी को याद करता काबुलीवाला। 

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