उस वक्त शाम के 5.25 बज रहे थे। मैं जर्मनी में अपने एक ग्राहक के साथ उनके दफ़्तर में बैठा हुआ था। बातचीत जारी थी कि अचानक वह कुर्सी से उठते हुए मुझसे बोले, “निकेश, मुझे एक मिनट का वक़्त दो। मैं बस यूँ गया और यूँ आया।” इतना कहकर वे तेजी से दफ़्तर के बाहर निकल गए।
बमुश्किल दो मिनट बाद ही हाँफते हुए लौटे और मुझसे कहने लगे, “हाँ अब हम अपनी बातचीत जारी रख सकते हैं।” मैं अब तक कुछ समझ नहीं पाया था। इसलिए मैंने उनसे सवाल किया, “आख़िर हुआ क्या था माइकल?”
दिन के चौबीस घंटों में एकांत यूँ ही आता है, टुकड़ों में और हम उसमें एकसार होते हैं। फिर जीवन में लौट जाते हैं, जहाँ शोर है और सन्नाटा। --- कभी दूध को गर्म करें, अपनी आँखों के सामने। बहुत एकाग्रता लगती है। फोकस करना पड़ता है और अक्सर इन दोनों के होने के बाद भी उफनकर दूध बाहर निकल जाता है। जीवन में मौके ऐसे ही होते है प्रायः। ---
एक पुरानी कहानी है। एक राजा हुआ करता था। उसका नियम था कि उसके शहर के हाट-बाजार में जो भी सामान नहीं बिकता, उसे वह खरीद लेता। उसी के राज्य में एक गरीब अन्धा युवक भी रहता था। माता-पिता नहीं थे और वह अपने दो भाइयों पर आश्रित था। गरीबी से तंग आकर उसने अपने भाइयों से कहा, “मैं अपना जीवन आप पर भार बनते नहीं देख सकता। आप मुझे बाजार में बेच दो।” भाइयों ने पहले तो इंकार किया पर जैसा कि होता है, अन्त में गरीबी ने उन्हें व्यावहारिक निर्णय लेने के लिए बाध्य कर ही दिया।
और उस दिन ‘तंत्र’ की ‘जन’ से मुलाकात हो गई। पाठकों को लग सकता है कि भाई ‘तंत्र’ और ‘जन’ दोनों की मुलाकात का क्या चक्कर है? दोनों तो साथ ही रहते हैं - जनतंत्र।
हिन्दी का थोडा़ आनन्द लेते हैं। हिन्दी के मुहावरों की भाषा, उनकी अहमियत, उनकी ख़ासियत समझने की कोशिश करते हैं। हालाँकि इस ख़ूबसूरती से इन मुहावरों को चन्द लाइनों में सहेज लेने का यह काम मैंने नहीं किया है। काश!
मेरे कमरे में जब सुबह धूप आती है, तो बहुत गुनगुनी होती है। दोपहर तक परवान चढ़ती है और शाम फिर ठंडी पड़ने लगती है। लगता है जीवन में दुःख यूँ ही आते हैं। --- शाम का तापमान कभी एक समान नहीं देखा मैंने अपने जीवन में। जबकि सुख और दुःख हर दिन समान थे। एकदम किसी अटल पहाड़ के समान। सुरंगें अक्सर उजालों भरी ही होती हैं। असल में हमें उस पार उजाला देखने के भ्रम सिखा दिए गए हैं। --- ज़िन्दगी लम्बी या बड़ी नहीं होनी चाहिए। बस, अभी जो है, वैसी ही होनी चाहिए। अपने पूरे आकार और स्वरूप में। ताकि जो साँस अन्दर जा रही है, उसके साथ ही इसे आत्मसात कर सकें। पता नहीं हम अगली साँस में हों न हों। ---
भारतीय महिला हॉकी टीम टोक्यो ओलम्पिक खेलों में चौथे नम्बर रही। शुक्रवार, छह अगस्त को ब्रिटेन ने नज़दीकी मुकाबले में भारत की टीम पर चार-तीन से जीत हासिल की। यह वही ब्रिटिश टीम है, जिसने शुरुआती मुकाबले में भारत काे चार-एक से हरा दिया था। पिछले ओलम्पिक की स्वर्ण पदक विजेता थी। लेकिन इस बार वह काँस्य पदक के लिए भारत से मुकाबल
आज शाम मौसम अचानक बदल गया। दूध ख़त्म हो गया था फ्रिज में। बहुत हिम्मत करके बाहर निकला और गुमटी से दूध लिया। उसे जब रुपए दिए तो वापसी के लिए उसके पास चिल्लर नहीं थी। मैंने कहा, "कोई बात नहीं बाद में कर लेंगे हिसाब" तो वह बोला, "नहीं भैया जी, ले जाओ बाद में मैं भूल जाऊँगा।" मुझे समझ नहीं आया कि मात्र तीन रुपए की चिल्लर के लिए उसने अपने आप को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया।
दो जासूस, दोनों के दोनों प्रगतिशील किस्म के। देश-दुनिया की समस्याओं पर घंटों चर्चा करके कन्क्लूजन को अपनी तशरीफ़ वाली जगह पर छोड़कर जाने वाले। दोनों एक कॉफ़ी हाउस में मिले। वैसे तो दोनों अक्सर इसी कॉफ़ी हाउस में मिलते रहते हैं। लेकिन आज का मिलना ज्यादा क्रान्तिकारी है। अब ये जासूस कौन हैं? क्या हैं?
हिन्दी फिल्मों के बड़े अभिनेता अमिताभ बच्चन अक्सर अपने जीवन का एक किस्सा सुनाया करते हैं। वे बताते हैं, “मैं छोटा ही था, जब बाबूजी ने जब मुझे जीवन के एक विचलित मोड़ पर ये सीख दी थी- मन का हो तो अच्छा, न हो तो ज्यादा अच्छा। उस वक्त मेरी समझ में नहीं आया कि जो मन का न हो वो ज्यादा अच्छा कैसे हो सकता है? लेकिन बाद में जब उन्होंने समझाया तो समझ गया कि अगर तुम्हारे मन का नहीं हो रहा है, तो समझो ईश्वर के मन का हो रहा है। और ईश्वर हमेशा तुम्हारा अच्छा ही चाहेंगे, इसलिए ज्यादा अच्छा।”