मैंने 17 अगस्त 2020 को फ्लिपकार्ट से एक मोबाइल फ़ोन मँगवाया। सामान बताए गए पते पर पहुँचने के बाद भुगतान करने (कैश ऑन डिलीवरी) का वहाँ कोई विकल्प नहीं था। इसलिए एकीकृत भुगतान व्यवस्था- यूपीआई (Unified Payments Interface) के ज़रिए भुगतान किया। बाद में किसी वजह से 20 अगस्त को मैंने मोबाइल का वह ऑर्डर रद्द कर दिया। उस समय फ्लिपकार्ट की ओर से बताया गया, “आपके पैसे वापस कर दिए गए हैं।” मैंने पता लगाया तो मेरे खाते में पैसे नहीं पहुँचे थे। तब मैंने सोचा कि अमूमन ऐसा होता है। कुछ दिन इन्तज़ार करना चाहिए।
नैनीताल में जुलाई से सितम्बर तक लगभग ढाई-तीन महीनों की लगातार बरसात और सीलन के बाद धूप आने पर गर्म कपड़ों, गलीचों, गद्दे और रजाइयों को टीन की छत पर सुखाने का एक सिलसिला चलता है। महीनों की सीलन और उदासी के बाद चमकदार धूप आने पर उसमें सूखते कपड़ों और हवा में गायब होती गर्म सीलन को सूँघने की ख़ुशी टीन की नालीदार छतों पर संभल-संभलकर चलती उन मुदितमना गृहणियों के चेहरे पर साफ़ झलकती है। घर के पुरुषों का भी इस जरूरी काम में भरपूर योगदान होता है। कारण कि अमूमन पहाड़ी घरों में पाए जाने वाले और बरसात के मौसम में लीटरों पानी और सीलन पी चुके गाँधी आश्रम के उन 50-50 किलो रुई के गद्दे, रजा
प्रिय ईशू
तुम कुछ ही दिनों बाद इस समय जिनेवा में सम्भवत: अपनी कक्षा में रहोगे। यह भगवद्कृपा है कि उच्च शिक्षा के लिए तुम्हें एक अच्छे विश्वविद्यालय में अध्ययन का अवसर मिला है। तुम अपनी पढ़ाई अच्छे से करोगे, इसमें मुझे सन्देह नहीं। पर मैं तुम्हारा ध्यान एक दीगर बात की ओर आकर्षित करना चाहूँगा। वह है, अध्ययन के अतिरिक्त ज्ञानार्जन की। अपने प्रवास के दौरान तुम यूरोप में भारत के प्रतिनिधि रहोगे। स्थानीय नागरिक तुम्हारे हर व्यवहार और गतिविधि से भारतीयों के सम्बन्ध में राय बनाएँगे। इसलिए एक जिज्ञासु विद्यार्थी के रूप में तुम्हारे ऊपर बड़ी जिम्मेदारी होगी।
आज अनन्त चतुर्दशी मनाई गई। भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप की इस दिन विशेष पूजा की जाती है। इसलिए उन्हीं से जुड़े अपने अनुभव के एक प्रसंग को आज मैं ‘डायरी’ में दर्ज़ करना चाहूँगा। कुछ रोज पहले मेरे एक परिचित ने मुझे व्हाट्स ऐप पर एक वीडियो भेजा। तिरुपति के मन्दिर में भगवान वेंकटेश्वर की आरती का वीडियो था। उसे देखकर मेरे सामने कई साल पहले की यादें ताज़ा हो गईं, जब मैं तिरुपति गया था। भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए। इस समय जो वीडियो मेरे सामने था, वह महज 1:02 मिनट का था। लेकिन उसे देखने के बाद बहुत देर तक उस मन्दिर के तमाम दृश्य मेरी आँखों के सामने घूमते रहे। एक बार तो ऐसा लग
आज राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया गया। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचन्द का जन्मदिन। भारत का मान बढ़ाने वाले खेल-खिलाड़ियों को उनके हिस्से का सम्मान देने का दिन भी। लिहाज़ा, दूर देश में भारत का मान बढ़ाने वाली एक बेटी का जिक्र करने का भी इससे बेहतर मौका कोई हो नहीं सकता। उसका नाम लिज़ा स्थालकर है। बेहद प्रेरक कहानी है लिज़ा की। हालाँकि ये बात दीगर है कि भारत के मीडियाने उसकी कहानी को जगह देने की ज़्यादा ज़हमत नहीं उठाई। पर ऑस्ट्रेलिया के अग्रणी अख़बार ‘द गार्जियन’ ने इसी 26 अगस्त को उसकी कहानी प्रकाशित की है।
हिन्दु पंचांग के अनुसार आज राधाष्टमी है। यानि वह दिन, जब मधुरा के बरसाना कस्बे में, मुखिया वृषभान राय के घर ‘राधा जी’ ने जन्म लिया था। पूरे बृज में इस दिन को बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। देशभर के तमाम कृष्ण मन्दिरों में भी विशेष आयोजन होते हैं। क्योंकि ‘राधा’ कोई सामान्य किशोरी नहीं मानी जातीं। उन्हें श्रीकृष्ण की परम प्रेयसी का दर्जा हासिल है। बल्कि उनसे भी ऊपर मानी जाती हैं। राधा जी के जन्म और इसके बाद उनकी छठी पूजा आदि के मौके पर गाए जाने वाले पदों में इसका स्पष्ट उल्लेख है। जैसे- नीचे दिए गए इस पद में ख़ास तौर पर कहा गया है, “या कन्या के आगैं, कोटिक बेटन को अब मानैं...”। मतलब- करोड़
आज यकायक माई की याद आ गई। इसीलिए उसकी स्मृति को डायरी में दर्ज कर रही हूँ। यही कोई 38 साल पहले की बात है। तब मैं बहुत छोटी थी। पाँच-छह साल की। स्कूल में नया दाखिला मिला था। बाबा के तबादले के साथ ही हम एक नए शहर में आए थे। बुलढाणा, जो महाराष्ट्र के पहाड़ों में बसा है। हमारा बड़ा कुनबा था। दादा, दादी, दो चाचा, हम तीन बच्चे। बाबा घर भी बनवा रहे थे। सो, माँ पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया था। तब वह बूढ़ी माई हमारे घर पहली बार आई थी। घरेलू कामकाज के लिए। कमर कुछ झुकी हुई। बाल काले, घुँघराले। उनका छोटा सा जूड़ा बना होता था। वह भील जाति से थी।
ख़बर आई है कि पंडित जसराज नहीं रहे। पर क्या ऐसा हो सकता है भला? ये सवाल ग़ैरवाज़िब नहीं, बल्कि सोचने लायक है। क्योंकि जो शख़्स अपने संगीत से पिता को भी जीवन्त करने का इरादा रखता हो। जिसने अपने संगीत से पिता के साथ-साथ ख़ुद को भी समयातीत-सा बना लिया हो। क्या वह यूँ दुनिया छोड़ सकता है? नहीं। हाँ, उनकी ‘देह का अन्त’ ज़रूर हुआ है अलबत्ता और ये सच्चाई है। लेकिन बस इतनी ही। पंडित जसराज ख़ुद भी देह-गेह की बस इतनी ही सच्चाई स्वीकार करते थे शायद। उनके जीवन से जुड़े किस्सों से ये बात साबित होती है।
अभी चार अगस्त (मंगलवार) को ही संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी)-2019 की परीक्षा का अन्तिम नतीज़ा आया है। इसमें हरियाणा के प्रदीप सिंह ने पहला स्थान हासिल किया है। प्रदीप सोनीपत जिले के रहने वाले हैं। किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनकी इस पृष्ठभूमि की वज़ह से वे चर्चा में हैं। चौथी बार में उन्होंने यह सफ़लता हासिल की है। शुरू में दो बार सफल नहीं हुए। तीसरी बार 260वाँ स्थान आया और अब पहला। जैसा कि उन्होंने ख़ुद मीडिया के प्रतिनिधियों को बताया, “बीच में एक बार मैंने हार मान ली थी। लगा कि मुझसे नहीं हो पाएगा। तब पिताजी ने हौसला दिया। इसके बाद फिर तैयारी शुरू की और इस मुकाम तक पहुँचा।”
कुछ दिनों पहले एक ख़बर पढ़ी थी। विशेष तौर पर मध्य प्रदेश के सन्दर्भ में थी। हालाँकि कमोबेश वैसी स्थिति दूसरे राज्यों में भी हो सकती हैं। सम्भवत: होगी ही। उस ख़बर में बताया गया था कि निजी स्कूलों के असरदार संचालक सरकार में अपने सम्पर्कों के जरिए राज्य शिक्षा विभाग के आला अफ़सरों पर दबाव डाल रहे हैं। उनके द्वारा कोशिश ये की जा रही है कि किसी तरह स्कूलों को फिर खोलने की अनुमति मिल जाए। भले सप्ताह में तीन दिन ही सही। उनकी दलील है कि चूँकि कोरोना महामारी के संक्रमण की वज़ह से की गई देशव्यापी तालाबन्दी अब ख़त्म हो चुकी है। धीरे-धीरे सभी गतिविधियाँ खुल रही हैं। सामान्य हो र