सुबह उठो, अपने आपको च्यूँटी काटो
जागो, अपने उन दो पाँवों को निहारो जो आगे बढ़ते हैं सदैव
इन्हीं पाँवों पर तन - मन और आत्मा के साथ सपनों का बोझ डालो
अपने मुँह के भीतर जुबाँ घूमाओ और खुद का नाम पुकारो, जोर से
खिड़की खोलो, दरवाज़े को धक्का मारकर खोलो, रोशनी का स्वागत करो
आँखों को मलो और दीदें फाड़कर सूरज को घूरकर देखो
चूल्हे की आग को अपने आँचल में सामने रखो ताकि जलती हुई अग्निप्रभा सबको दिखाई दें, और फिर सबके सामने से सिर ऊँचा करके निकलो
अख़बारी दफ़्तर में शनिवार-इतवार को अमूमन काम कुछ कम ही हुआ करता है। विशेष तौर पर अगर कोई घटना-दुर्घटना न हो ताे। लिहाज़ा, इसी शनीचर की रात फ़ुर्सत के पलों में बैठे-ठाले मैं कुछ कड़ियाँ जोड़ने की कोशिश कर रहा था। ये कड़ियाँ बीते दो-तीन महीनों में मेरी नज़रों के सामने से गुजरी थीं। सो, अपने ज़ेहन की तस्वीरों को थोड़ा उल्टा घुमाया तो पाया कि कड़ियाँ आपस में पहले ही जुड़ी हैं। बस, नज़र नहीं गई थी। एक शीशेनुमा महीन धागे ने उन्हें आपस में जोड़ रखा था। उस पर अब जबकि मेरी नज़र ठहरी तो ख़ुद का अक़्स दिखने लगा। सुन्दर क़तई नहीं था वह। इसलिए एकबारगी लगा कि इस कहानी को यूँ ही बिना ना
बड़े बुज़ुर्ग पहले जो बातें कहावतों में कह जाया करते थे, उनकी मार दूर तक होती थी। सटीक निशाने पर लगती थी। शायद इसीलिए किसी ने दो पंक्तियों में लिखा है, ‘पुराने लोग अच्छे थे, बाण मारते थे’। ये एक तरह का रूपक है। इस ‘बाण’ में वे तीर तो हैं ही, जो कमान से छूटते थे। वे तीखी कवाहतें भी हैं, जो ज़ुबान से निकलती थीं। हालाँकि वक्त के साथ हमने बुज़ुर्गों को वृद्धाश्रम भेज दिया और उनकी कही बातों को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में। यानि वे जगहें, जो होने के बावज़ूद हमारे लिए न होने जैसी हैं। और जिनकी तरफ़ हम बेपरवाह हो चुके हैं।
नगर कीर्तन, सदियों पुरानी एक विशुद्ध भारतीय परम्परा। सुबह-सुबह कुछ लोग जब हरिनाम संकीर्तन, भक्तिपद गाते हुए हमारे दिन को ‘सुदिन’ बनाने के मकसद से गलियों, चौक-चौबारों से गुजरते हैं, तो वह ‘नगर कीर्तन’ कह दिया जाता है। यही नगर कीर्तन तब ‘प्रभात फेरी’ हो जाता है, जब समाज में जागरुकता लाने, लोगों का ध्यान किसी मसले की तरफ़ खींचने के लिए उस विषय का काव्य कहते हुए लोगों के समूह यूँ ही हमारे दरवाजों से गुजरा करते हैं। मिसाल के तौर पर बहुत लोगों को बचपन की प्रभात फेरियाँ अब भी शायद भूली न होंगी। हर 15 अगस्त की सुबह विद्यालयों की गणवेष (Uniform) पहने बच्चे आज़ादी के तराने गाते, हमें सुनाते निकला करत
हर पहलू से रोचक-सोचक है, ये दास्तां। दास्तां, एक मजदूर की। दास्तां, उस मजदूर के सबसे सम्मानित शख़्सियतों में शुमार होने की। दास्तां, कंकर के शंकर हो जाने की। दास्तां, भूरी बाई की।
कमाल यूँ ही नहीं होते। सालों-साल लगते हैं, उनके होने में। गढ़ने में, बढ़ने में। लेकिन जब होते हैं, तो यक़ीनी तौर पर सालों-साल ही नहीं, मुद्दतों तक याद रखे जाते हैं। हिन्दी सिनेमाई फ़नकार कमाल अमरोही, उनकी बेगम मीना कुमारी और इन दोनों का मिला-जुला शाहकार (रचना) ‘फिल्म पाकीज़ा’ ऐसे ही कमाल हैं। आज, यानि 4 फरवरी को ‘कमाल की पाकीज़ा’ का 50वाँ साल लग गया है, जो 2022 में पूरा होगा। ‘पाकीज़ा’ 1972 में फिल्मी पर्दे पर आई थी।
क्रिकेट से तो हम में से तमाम लोग वाकिफ़ हैं, लेकिन क्या ‘ब्लॉकेथॉन’ (Blockathon) को जानते-समझते हैं? सम्भव है, क्रिकेट से ताल्लुक रखने वाले कई लोग इससे भी बावस्ता हों। मगर क्या इसमें हम अपने जीवन-संघर्षों के लिए कोई सबक छिपा देख सकते हैं?... ये बहुतों के लिए मुश्किल सवाल हो सकता है। पर सच में, ब्लॉकेथॉन हमारे जीवन-संघर्ष से जुड़ता है। ये हमें उस संघर्ष में टिके रहने का बड़ा गुर सिखाता है।
परसों शाम अस्पताल से लौटते वक्त मन कुछ अंतर्मुखी हो रहा था। जीवन की सभी परिक्षाओं को लेकर मन में उहापोह हो रही थी और दो सवाल उठे। पहला- धार्मिक समाज को इतने अत्याचार क्यों सहना पड़ रहा है? दूसरा- धर्मविरोधी क्या भगवान का अंश नहीं है, तो उसका प्रतिकार क्यों किया जाए? सवाल उठाकर सद्गुरुदेव का ध्यान कर उनके समक्ष निवेदित कर दिए। फिर मन में जो विचार तरंगें प्रकट हुईं, उससे सारा कुहाँसा छँट गया। उन प्रश्नों और उत्तरों को यहाँ डायरी में दर्ज कर रहा हूँ, शायद और किसी भाग्यवान को लाभप्रद सिद्ध हो जाएँ!
This story was narrated to me by my uncle from the maternal side when I visited him in 2004. After retirement, he chose to stay at Pondicherry. He was old now and like any normal aged person, enjoyed sharing stories and anecdotes with others.