पैदा होने के बाद ग़लत स्कूल में चला गया। वहाँ तीन ग़लत प्राचार्यों और 50-60 ग़लत शिक्षकों ने ग़लत पढ़ा दिया। गणित के बदले जीव विज्ञान विषय गलती से भर दिया प्रवेश फॉर्म में तो भुगतना पड़ा आजतक जीवन में। माध्यमों के खेल में असली खेल सीख ही नहीं पाया कभी। एक दिन जवाहर चौक, देवास में ग़लत जगह खड़े होकर केरल से आए नुक्कड़ नाटक के दल का भोपाल गैस त्रासदी पर नाटक देख लिया और जीवन देखने की दृष्टि ही बदल गई। उस दिन एक गलत बस में बैठा था और वह मुझे उस गाँव ले गई, जहाँ से बदलाव और विकास का नया रास्ता चुना मैंने।
भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परम्परा अगर कहीं अब भी अपने श्रेष्ठ स्वरूप (कुछ अगर-मगर छोड़ दें, तो बहुतायत) में है तो वह या तो आध्यात्म का क्षेत्र है या संगीत का। इसमें संगीत की बात करें तो सालों-साल की साधना से अपनी विधा में जो शिष्य थोड़े पक जाते हैं, वे अक्सर अपनी तैयारी के प्रदर्शन से गुरु/गुरुओं को स्वरांजलि, आदरांजलि दिया करते हैं।
बीते दो-तीन दिनों राज्यसभा के सदस्य प्रोफेसर मनोज झा का सदन में दिया यह भाषण ख़बरिया ( Media) और सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर चल रहा है। चल क्या रहा है, छाया हुआ है। लोग उनके भाषण की तारीफ़ कर रहे हैं। तारीफ़ के काबिल है भी। क्योंकि आजकल के नेताओं से ऐसी उम्मीद कम ही की जाती है कि वे आम नागरिकों की ज़िन्दगी और मौत से जुड़े मुद्दों पर इतनी नज़दीकी संवेदनशीलता से बोलेंगे।
इस देश में नेताओं और उनके परिवारों ने छवि इस तरह की बना ली है कि एक बार इस तस्वीर (लेख के साथ दी गई) पर शायद ही किसी को यक़ीन हो। लेकिन यह सच्ची तस्वीर है। सहजता और सादगी की। तस्वीर में दिख रहे दम्पति केन्द्रीय मंत्री एल मुरुगन के माता-पिता हैं। पिता- लाेगनाथन, उम्र 68 साल और माँ- वरुदम्मल, उम्र 59 साल। दोनों तमिलनाडु के नमक्कल जिले में स्थित अपने गाँव कोनुर में रहते हैं। आज से कई बरस पहले जब बेटा (मुरुगन) छोटा था, तब ऐसे ही मज़दूरी किया करते थे। उसे जैसे-तैसे इधर-उधर से कर्ज लेकर पढ़ाया-लिखाया। बेटा होनहार था। जल्द ही अपने पैरों पर खड़ा हो गया। वकील बन गया। राजनीति में कदम रखे और देश के स
अभी किसी से फोन पर बहुत लम्बी बात हुई। आवाज़ों के शोर के पीछे जो आँसुओं का दर्द था, वो मैं महसूस कर पा रहा था। हम दोनों में पिछले दशक से एक अबोला प्रेम था। निश्छल, अबोध और बगैर अपेक्षाओं वाला। हम व्यक्त करने में बहुत समय लेते हैं। इसलिए जब हम किसी को सुनते हैं, तो एकाग्र होकर सुनें और अपनी ओर से कुछ न जोड़ें। बल्कि यदि कहना भी हो तो इतना ही कि बस सामने वाले को लगे कोई है जो सुन-गुनकर मेरे साथ है।
जब 1982 में तिरुपति बालाजी चढ़े थे, तो पैदल ही चढ़ना होता था। वहाँ बहुत लोगों को कबीट ( कैथा ) के माफिक सर मुँडवाते देखा। हिन्दी बोल रहे थे, तो खूब मार खाई। एक गंजी स्त्री ने उन सबका मुकाबला किया और भीड़ को समझाया था, तेलुगु भाषा में कि बच्चे हैं, जाने दो। हिन्दी, यही इस देश की भाषा है। इसी यात्रा में राष्ट्रपति पुरस्कार लेना था। तत्कालीन मद्रास के यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन (YMCA) के मैदान पर 15 दिन रुककर कैम्प किया था। आने में कन्याकुमारी देखा पहली बार, रामेश्वरम और मण्डपम के बीच खुलने वाला समुद्र किनारे का पुल बना ही था नया-नया। वहाँ के लोगों की हिम्मत कमाल थी। पता नहीं था क
बड़ों की बातें हैं। इसी तरह की होती हैं। सालों पहले कही जाती हैं। सालों बाद तक सुनी जाती हैं। उनकी कीमत कहे जाते वक्त जितनी होती है, सुने जाते समय उससे और अधिक बढ़ जाती है। फिर अगर कहीं गुन ली जाए, तो क्या ही कहने, तब वे बातें किसी भी कीमत की हद पार कर लिया करती हैं।
कल एक बहुत प्रिय मित्र को एकान्तवास में भेज दिया गया। उनका बेटा भी संग में, इस काल में ग्रसित हो गया। कल ही एक मित्र ने बताया कि मात्र 34 बरस का एक युवा यहाँ भर्ती कर लिया गया है। भोपाल में एक मित्र के माता-पिता अकेले रहते हैं। दिन-रात समाचारों की आँधी से भड़भड़ाकर वे मान बैठे हैं कि काल उनके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है। चलते-फिरते उन्हें लगता है कि कोई कह दे, यह घोषित कर दे कि वे अब ज़्यादा समय रह नहीं पाएँगे। एक मित्र आशंका में अपना सब कुछ खोलकर बैठ गए। बही खातों से लेकर कपड़े और जेवरात भी। घर मे उपस्थित लोगों को बाँट रहे हैं। हाथ की अँगूठी और गले से चेन निकालकर दे दी।
बुद्ध होने के लिए इच्छाओं को त्यागना पड़ता है। यह त्याग अत्यधिक कठिन है। इस त्याग को, इस निरोध को मोक्ष का मार्ग भी कहा गया है।
"क्षणिकाः सर्व संस्कारा इत्येवं वासना यका। स मार्ग इह विज्ञेयो निरोधो मोक्ष उच्यते"।। ( षड्दर्शन समुच्चय, बौद्ध मत कालिका 7) अर्थ- समस्त संस्कार अर्थात पदार्थ क्षणिक हैं, इस क्षणिक भावना को, मार्गतत्त्व को और विषय भोगों के प्रति रागादि को, वासनाओं के नाश को, निरोध अर्थात मोक्ष कहते हैं।
रास्ते थे, सड़के थीं, नदियाँ, पहाड़, हवाई किलों से गुजरने वाले पथ और चलने वाले असंख्य पाथेय, जो अपनी-अपनी छाप देकर वहाँ चले गए हैं, जहाँ की आबादी आज की धरती पर बसे इन ज़िन्दा लोगों से बहुत-बहुत ज्यादा है। सक्षम, दक्ष और अनुभवी है। बस इतना है कि वे सब सदैव के लिए चुप हो गए हैं। उनके नामों का डंका जरूर आज भी गाहे-बगाहे लोग पीट लेते हैं पर उनमें से कोई आज हुँकार नहीं भरता।