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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

जब हमारा अस्तित्त्व नहीं था, संघर्ष तब भी था और जीत भी हमारी थी!

अखिलेश जैन, छतरपुर, मध्य प्रदेश से, 20/6/2021

किसी ने वॉट्सएप पर एक सन्देश भेजा। पढ़ते ही इतना प्रासंगिक और सत्यपरक लगा कि मैंने इसे तुरन्त #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करने का निर्णय ले लिया। क्योंकि ‘डायरी’ धीरे-धीरे सही, पर ऐसी स्वस्थ, रोचक-सोचक, प्रेरक और सरोकार से पूर्ण सामग्री के प्रसार का जरिया बन रही है। तो ‘डायरी’ के पाठक भला क्यों इससे वंचित रहें। सन्देश कुछ इस तरह है...

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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं...‘वा घर सबसे न्यारा’ ..

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 19/6/2021

शोर में बहुधा एकांत छिन जाने का खतरा रहता है। पर कुछ शोर मन को बहुत भाते हैं। मसलन- चिड़ियों की चहचहाट, टिटहरी की चीख, मुंडेर पर कौवों का क्रन्दन, नदियों में उद्दाम वेग से बहते पानी का कलकल भरा आलाप, समुद्र में चिंघाड़ भरती लहरों का शोर। किसी शंख को कान में लगाकर देर तक अनहद नाद को सुनना। जंगल में किसी सूनी पगडंडी से गुजरते हुए पत्तियों और झूमती मदमस्त शाखाओं का संगीत। मंडला (मध्य प्रदेश का शहर) में गोंड राजा के किले में असंख्य चमगादड़ों का शोर, जो उजालों से घबराकर सदियों से एक कमरे में भटक रहे हैं। पहाड़ों के उत्तुंग शिखर पर चढ़ते हुए पत्तों और घास की सरसराहट या अपने कम

ये क्या है, किसी विचार का समर्थन या उससे ग्रस्त-त्रस्त हो जाना?

टीम डायरी, 13/6/2021

मामला पूरी तरह निजी है। फिर भी विचार के लिए एक रोचक विषय है और सोचक यानि सोचनीय भी। क्योंकि इसी तरह के मामले अक्सर समाज में वैमनस्य और भेद के भाव का कारण बनते हैं। लेकिन पहले इस विमर्श का जो घटना आधार बनी, उस पर एक नज़र डाल लेते हैं। 

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बिहार की इस बेटी को एक कड़क सैल्यूट तो बनता है

टीम डायरी, 11/6/2021

उसने एक बँधी हुई छवि को तोड़ा है। जिस समुदाय में लड़कियों की शिक्षा ही विवाद का विषय हो जाया करता है, उसी समाज से निकलकर उसने पढ़-लिखकर ऊँचा मुकाम हासिल किया है। नाम- रज़िया सुल्ताना। बिहार की पहली मुस्लिम महिला उप-पुलिस अधीक्षक। 

"अपने प्रकाशक खुद बनो", बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 8/6/2021

भगवन बुद्ध ने दु:ख को पहला सत्य बताया। बड़े अद्भुत हैं बुद्ध। बहुत लम्बी-चौड़ी बात नहीं करते। एक शब्द में बता दिया कि समस्या क्या है। 

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खुशी, कुछ सीखो अपनी बहन परेशानी से!

टीम डायरी, 6/6/2021

एक छोटी सी कविता। बड़ा सा विचार। ये बताता है कि ख़ुशी की तलाश में भटकते हम दरअसल उसे अपने नज़दीक देख नहीं पाते। महसूस नहीं कर पाते।

बड़ी-बड़ी चीजों में उसे ढूँढ़ते रहते हैं। पूरी ज़िन्दगी इस तलाश में खपा देते हैं। लेकिन जब भी कभी मिलती है तो बेहद छोटी-छोटी सी चीजों में। कम वक़्त के लिए।

जब भी मिलती है तो छोड़ने का मन नहीं होता। लेकिन बड़ी चीजों में तलाशने का हमारा भ्रम, दुविधा और मृगतृष्णा हमेशा उसे हमेशा हमसे दूर ले जाता है।

और हम... बस, तलाशते रह जाते हैं। सहेज नहीं पाते।

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बुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 1/6/2021

भगवान बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपनी बात सुनने के लिए मना लिया। तथागत ने उन्हें समझाया। उनकी रुचि देख जो पहला उपदेश दिया वह धर्मचक्र प्रवर्तन ( संयुक्त निकाय 55।2।1 बुद्धचर्या ) कहलाया। 

उन्होंने कहा : भिक्षुओ, दो अतियों का सेवन नहीं करना चाहिए।

भिक्षु : वे कौन-सी हैं?

बुद्ध : प्रथम अति है  हीन, ग्राम्य तथा पृथक्जनों के योग्य, अनार्य, अनर्थों द्वारा सेवित, काम-वासनाओं द्वारा प्रेरित काम-सुख में लिप्त नहीं रहना चाहिए।

भिक्षु : और दूसरी अति कौन सी है?

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हिन्दी पत्रकारिता और पत्रकारों से जुड़े संयोग-दुर्योग की कहानी!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश से; 31/5/2021

ये सिर्फ़ दो-तीन मिसालें ही हैं। लेकिन शुरुआत से अब तक हिन्दी पत्रकारिता और उसके पत्रकारों के साथ लगभग स्थायी भाव से जुड़े संयोग-दुर्याोगों की मुकम्मल कहानी कहती हैं। एक-एक कर इन्हें समझने-देखने की कोशिश करते हैं।

1. उदन्त मार्त्तण्ड, नारद जयन्ती और तथ्यों का घालमेल :

संघर्ष और साधना की ये कहानी सिर्फ़ सिद्धू की नहीं, शख़्सियत बने हर शख़्स की ह्रै

ज्योति प्रकाश त्यागी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 28/5/2021

नवजोत सिंह सिद्धू। भारतीय क्रिकेट की दुनिया में धाकड़ बल्लेबाज के तौर पर जाना-पहचाना नाम। फिर जब क्रिकेट की दुनिया छोड़ी तो वक्तृत्व कला (Art of Oratory) के क्षेत्र में उससे भी बड़ा नाम। राजनीति में आए तो उसमें भी पीछे की बेंच पर नहीं ही दिखे।

लोग अक्सर उनके ये कारनामे देख चौंकते हैं। पूछते हैं- कैसे कर पाए इतना कुछ? हर किसी के वश में तो नहीं होता? कोई एक जन्म में किसी एक क्षेत्र विशेष को ही अच्छी तरह साध ले, वही बड़ी बात है?

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वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध का पुनर्जन्म और धर्मचक्रप्रवर्तन

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 25/5/2021

वन में वैशाख पूर्णिमा को जन्मा राजकुमार फिर वन की तरफ चल दिया। पुनः जन्म लेने हेतु। वह राजगृह के घने वनों में भटकता रहा। पहाड़ियों की गुफ़ाओं में ध्यान, तप और अध्ययन करते हुए समय व्यतीत किया। कुछ समय आलार कालाम सन्यासी के पास रहे। उसके बाद उद्रक नामक सन्यासी से हिन्दू धर्म दर्शन की शिक्षा प्राप्त की। उद्रक ने सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा प्रदान की थी। लेकिन इससे सिद्धार्थ को मानसिक शान्ति नहीं मिली हृदय को सन्तोष न मिला।

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