किसी ने वॉट्सएप पर एक सन्देश भेजा। पढ़ते ही इतना प्रासंगिक और सत्यपरक लगा कि मैंने इसे तुरन्त #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करने का निर्णय ले लिया। क्योंकि ‘डायरी’ धीरे-धीरे सही, पर ऐसी स्वस्थ, रोचक-सोचक, प्रेरक और सरोकार से पूर्ण सामग्री के प्रसार का जरिया बन रही है। तो ‘डायरी’ के पाठक भला क्यों इससे वंचित रहें। सन्देश कुछ इस तरह है...
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शोर में बहुधा एकांत छिन जाने का खतरा रहता है। पर कुछ शोर मन को बहुत भाते हैं। मसलन- चिड़ियों की चहचहाट, टिटहरी की चीख, मुंडेर पर कौवों का क्रन्दन, नदियों में उद्दाम वेग से बहते पानी का कलकल भरा आलाप, समुद्र में चिंघाड़ भरती लहरों का शोर। किसी शंख को कान में लगाकर देर तक अनहद नाद को सुनना। जंगल में किसी सूनी पगडंडी से गुजरते हुए पत्तियों और झूमती मदमस्त शाखाओं का संगीत। मंडला (मध्य प्रदेश का शहर) में गोंड राजा के किले में असंख्य चमगादड़ों का शोर, जो उजालों से घबराकर सदियों से एक कमरे में भटक रहे हैं। पहाड़ों के उत्तुंग शिखर पर चढ़ते हुए पत्तों और घास की सरसराहट या अपने कम
मामला पूरी तरह निजी है। फिर भी विचार के लिए एक रोचक विषय है और सोचक यानि सोचनीय भी। क्योंकि इसी तरह के मामले अक्सर समाज में वैमनस्य और भेद के भाव का कारण बनते हैं। लेकिन पहले इस विमर्श का जो घटना आधार बनी, उस पर एक नज़र डाल लेते हैं।
उसने एक बँधी हुई छवि को तोड़ा है। जिस समुदाय में लड़कियों की शिक्षा ही विवाद का विषय हो जाया करता है, उसी समाज से निकलकर उसने पढ़-लिखकर ऊँचा मुकाम हासिल किया है। नाम- रज़िया सुल्ताना। बिहार की पहली मुस्लिम महिला उप-पुलिस अधीक्षक।
भगवन बुद्ध ने दु:ख को पहला सत्य बताया। बड़े अद्भुत हैं बुद्ध। बहुत लम्बी-चौड़ी बात नहीं करते। एक शब्द में बता दिया कि समस्या क्या है।
एक छोटी सी कविता। बड़ा सा विचार। ये बताता है कि ख़ुशी की तलाश में भटकते हम दरअसल उसे अपने नज़दीक देख नहीं पाते। महसूस नहीं कर पाते।
बड़ी-बड़ी चीजों में उसे ढूँढ़ते रहते हैं। पूरी ज़िन्दगी इस तलाश में खपा देते हैं। लेकिन जब भी कभी मिलती है तो बेहद छोटी-छोटी सी चीजों में। कम वक़्त के लिए।
जब भी मिलती है तो छोड़ने का मन नहीं होता। लेकिन बड़ी चीजों में तलाशने का हमारा भ्रम, दुविधा और मृगतृष्णा हमेशा उसे हमेशा हमसे दूर ले जाता है।
और हम... बस, तलाशते रह जाते हैं। सहेज नहीं पाते।
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भगवान बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपनी बात सुनने के लिए मना लिया। तथागत ने उन्हें समझाया। उनकी रुचि देख जो पहला उपदेश दिया वह धर्मचक्र प्रवर्तन ( संयुक्त निकाय 55।2।1 बुद्धचर्या ) कहलाया।
उन्होंने कहा : भिक्षुओ, दो अतियों का सेवन नहीं करना चाहिए।
भिक्षु : वे कौन-सी हैं?
बुद्ध : प्रथम अति है हीन, ग्राम्य तथा पृथक्जनों के योग्य, अनार्य, अनर्थों द्वारा सेवित, काम-वासनाओं द्वारा प्रेरित काम-सुख में लिप्त नहीं रहना चाहिए।
भिक्षु : और दूसरी अति कौन सी है?
ये सिर्फ़ दो-तीन मिसालें ही हैं। लेकिन शुरुआत से अब तक हिन्दी पत्रकारिता और उसके पत्रकारों के साथ लगभग स्थायी भाव से जुड़े संयोग-दुर्याोगों की मुकम्मल कहानी कहती हैं। एक-एक कर इन्हें समझने-देखने की कोशिश करते हैं।
1. उदन्त मार्त्तण्ड, नारद जयन्ती और तथ्यों का घालमेल :
नवजोत सिंह सिद्धू। भारतीय क्रिकेट की दुनिया में धाकड़ बल्लेबाज के तौर पर जाना-पहचाना नाम। फिर जब क्रिकेट की दुनिया छोड़ी तो वक्तृत्व कला (Art of Oratory) के क्षेत्र में उससे भी बड़ा नाम। राजनीति में आए तो उसमें भी पीछे की बेंच पर नहीं ही दिखे।
लोग अक्सर उनके ये कारनामे देख चौंकते हैं। पूछते हैं- कैसे कर पाए इतना कुछ? हर किसी के वश में तो नहीं होता? कोई एक जन्म में किसी एक क्षेत्र विशेष को ही अच्छी तरह साध ले, वही बड़ी बात है?
वन में वैशाख पूर्णिमा को जन्मा राजकुमार फिर वन की तरफ चल दिया। पुनः जन्म लेने हेतु। वह राजगृह के घने वनों में भटकता रहा। पहाड़ियों की गुफ़ाओं में ध्यान, तप और अध्ययन करते हुए समय व्यतीत किया। कुछ समय आलार कालाम सन्यासी के पास रहे। उसके बाद उद्रक नामक सन्यासी से हिन्दू धर्म दर्शन की शिक्षा प्राप्त की। उद्रक ने सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा प्रदान की थी। लेकिन इससे सिद्धार्थ को मानसिक शान्ति नहीं मिली हृदय को सन्तोष न मिला।