‘द बिग बुल’ अभिषेक बच्चन की फिल्म है। उन्होंने इसमें अपनी अभिनय क्षमता को खरा सोना साबित करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की है। हालाँकि फिल्म कुछ दूसरे मोर्चा पर कमज़ोर पड़ी है। लेकिन यह कई सवालों को उठाने में कामयाब रही, इसमें कोई दो-राय नहीं। बशर्ते, हम हिन्दुस्तान के मुस्तकबिल को ध्यान में रखते हुए देखें, तो। अभिषेक के किरदार हेमन्त शाह की नियति चाहे जो रही हो, लेकिन फिल्म ने ये साबित करने की कोशिश की है कि वह परिस्थितियों में फँसकर मारा गया। हालाँकि इससे पहले उसने हमारी बैंकिंग प्रणाली में व्याप्त कमजोर पहलुओं को अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से पकड़कर करोड़ों कमाए
भारतीय मनीषा, विलक्षण संगीतकार और महान गायक पंडित कुमार गंधर्व का आज जन्मदिन है। कर्नाटक से मालवा के देवास में आ बसे। फिर यहीं जीवनभर संगीत और सुरों की आराधना करते रहे। आज उनके गाए कबीर को सुनकर ही मेरे जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं। उन्हीं के निर्गुण (भजन) से जीवन में गुण-अवगुण को परिभाषित कर पाता हूँ। उन्हीं से सीखा है, "जब होवेगी उमर पूरी, तब टूटेगी हुकुम हुजूरी। उड़ जाएगा हंस अकेला।"
पूरा जीवन राय बनाने में, विचारों को संश्लित करने में, सघन अनुभूतियों की जमीन को उर्वरा बनाने में ही निकलता नज़र आ रहा है। यह प्रक्रिया उस एकांत से बार-बार गुजरी, जिसने एक बड़ी समझ बनाने में मदद की पर जब भी कहीं कुछ दिखा, लगा और भीतर से महसूस किया तो तन-मन शीतल न हो पाया। एक अगन में, ज्वर में भावनाएँ उफनती रहीं और अपनी समझ से कुछ कह दिया।
पंडित रविशंकर आज 101 साल के हो गए। ऐसा इसलिए कहना ठीक है, क्योंकि उनके जैसे लोगों की सिर्फ़ देह ही दुनिया छोड़ती है। शख़्सियत यहीं रह जाती है, हमेशा के लिए। पर एक समय शायद ऐसा भी आया था, जब उनकी शख़्सियत ने इतना बड़ा आकार नहीं लिया था। उसके निर्माण का क्रम चल रहा था कि तभी एक दिन रबीन्द्र शंकर चौधरी (पंडित रविशंकर का शुरुआती नाम) ‘ज़िन्दगी’ छोड़ने चल दिए थे।
क्या हम प्रतिभाओं को परखने में, उनका आकलन करने में गलती करते हैं? मेरे दिमाग में यह सवाल अक्सर ही आता है। बीते दो-ढाई दशक से बच्चों को क्रिकेट का प्रशिक्षण देने के दौरान ऐसे तमाम वाक़ये पेश आए हैं, जब बार-बार यह सवाल ज़ेहन में उभरा। और अभी जब किसी मित्र ने वॉट्सऐप पर मुझे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ का कथन (Quote) भेजा, तो सवाल फिर जीवन्त हो उठा।
हिन्दी के लेखक लोग #NoToFree चला रहे हैं, माने मुफ़्त में कुछ नहीं। इसके विरोध में मेरा #YesToFree है। मैं सभी तरह के कार्यक्रमों, मंचों, शादी, बियाह, जनेऊ, मुंडन के लिए उपलब्ध हूँ। कुछ श्रद्धा से खर्चा-पानी दे दीजिएगा। एक समय का मैथिल भोजन काफ़ी है। रसगुल्ला न मिले तो गुलाबजामुन चलेगा। इक्यावन व्यंजन का जोर न देंगे, ग्यारह से काम चल जाएगा।
बुद्ध दर्शन। ये परवर्ती दर्शन है। लेकिन बुद्ध दर्शन परम्परा का आदि दर्शन है, ‘चार्वाक दर्शन’। सवाल हो सकता है कि यह बौद्ध परम्परा का आदि दर्शन कैसे? तो ज़वाब ये मिलता है कि बौद्ध दर्शन असल में नास्तिक दर्शन है। और भारतीय दर्शन परम्परा में आचार्य चार्वाक को नास्तिकों का शिरोमणि कहा जाए तो सम्भवत: अनुचित न होगा। इस तरह नास्तिक दर्शनों में आदि दर्शन हुआ, चार्वाक दर्शन। इसीलिए यह बुद्ध दर्शन का भी आदि दर्शन हुआ।
हम सब अपने एकांत में बेहद क्रूर और दुराचारी होते हैं। भीड़ में बेहद डरपोक और शिष्ट।
याद आता है कि कैसे एक शान्त नदी अपने उद्भव से निकलती है, तो छोटी सी लकीर होती है। पर ज्यों-ज्यों पहाड़, कन्दराओं से गुजरती है तो उच्छृंखल और बेख़ौफ़ होती जाती है। क्योंकि वह अपने उद्भव को, अपनी जड़ों को छोड़ चुकी है। अब मस्त होकर वह सब कुछ हासिल कर लेना चाहती है।
#अपनीडिजिटलडायरी पर भारतीय दर्शन श्रृंखला का पहला लेख पढ़ा। शुरुआत बहुत अच्छी है।
मेरी भी यही मान्यता है कि भारतीय संस्कृति अपने उदातग स्वरूप में, समृद्ध चिन्तन परम्परा में, ज्ञान विज्ञान की उन्नति में, वाद-प्रतिवाद, तर्क-वितर्क, इन सब में तभी विकसित हो पाई, जब हम भौतिक ऐश्वर्य से युक्त हो चुके थे। जीवन व्यवस्थित था। कोई न कोई शासन, न्याय प्रणाली आकार ले चुकी थी। कभी भी भूखा, कबीलाई, घुमक्कड़ समाज इतना उत्कृष्ट चिन्तन नहीं दे सकता।
एक दीवार है, जो गाढ़ी नीली रँगी है। जब कमरा बना था, तो इस पिछली दीवार को गाढ़ा नीला रंग लगाया था। ठीक पिछले पड़ोसी की दीवार से लगकर इसे कंक्रीट की छत पर उठाया था, जो अब इस कमरे की ज़मीन बन गई है।
तीन हल्के नीले रंगों के बीच गाढ़े रँगीले नीले रंग पर एक छोटा सा बल्ब भी टाँग रखा है। वो भी गहरा नीला है। सिर्फ़ उजाले से ही नही, बल्कि अपने होने से भी।