धर्म, जाति, भाषा के नाम पर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े होने की सूचना-सामग्री अथाह है। समाचार माध्यमों और कथित सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर ऐसा कुछ एक ढूँढ़ने जाएँ, तो सैकड़ों की तादाद हाथ में आती है। पर उसी अँधेरी खोह में कोई टिमटिमाती सी एकाध रोशनी भी कभी मिल जाती है। जैसे यह वीडियाे। इसे किसने बनाया? इसमें दिख रहे कलाकार कौन हैं, कहाँ से हैं?
मैं प्रमोद पांडे। वर्तमान में अमेरिका के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में व्याख्याता (Professor) हूँ। हालाँकि मैं मूल रूप से मध्य प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट से ताल्लुक रखता हूँ। वहाँ के नज़दीकी गाँव नकैला में मेरा जन्म हुआ। शुरुआती शिक्षा भी गाँव के सरकारी विद्यालय में ही हुई। इसके बाद मैं उच्च शिक्षा के लिए चित्रकूट आ गया। वहाँ ग्रामोदय विश्वविद्यालय से मैंने अभियांत्रिकी में स्नातक (Bachelor in Engineering) की उपाधि ली। वहाँ की पढ़ाई मेरे जीवन का सबसे अहम मोड़ साबित हुई। यह मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है।
ये एक विज्ञापन है। लेकिन बेहद प्रासंगिक, संवेदनशील और सामाजिक सन्देश देने वाला। सामाजिक इसलिए क्योंकि मातृशक्ति रूप बेटियों की अहमियत हमेशा ही कम आँके जाने जैसे मसले को छूता है। संवेदनशील इसलिए क्योंकि यह सिर्फ़ स्त्री ही नहीं, समाज में बेहद उपेक्षित जीवन जीने वाले हिजड़ों की संवेदनाओं तक भी पहुँचता है। और प्रासंगिक इसलिए क्योंकि ये अंग्रेजी अवधारणा वाले मातृ दिवस (मदर्स डे) पर जारी हुआ था, जबकि इस वक्त पूरा देश भारतीय संस्कृति वाला नौ-दिनी मातृदिवस मना रहा है।
अभी कुछ रोज पहले तक कर्नाटक (दक्षिण भारतीय) संगीत के एक बड़े गायक हुआ करते थे। नाम था, ‘कुमारी’ अबुबाकेर। जैसा नाम दिलचस्प, वैसा ही काम भी। वे ‘तमिल इस्लामिक कीर्तन’ परम्परा के आख़िरी स्तम्भ थे। ‘कुमारी’ अबुबाकेर के निधन के साथ वह स्तम्भ इसी महीने ढह गया। दुख की ही बात है कि भारतीय सांगीतिक संस्कृति के ऐसे बिरले नाम और परम्परा के धारक तथा साधक को न जीवनकाल में उनके हिस्से का सम्मान मिला, न निधन के बाद। आलम ये कि दक्खन के दो प्रमुख अख़बारों की वेबसाइट
बच्चों में पड़ने वाले हर संस्कारों में, वे अच्छे हों या बुरे, परिवेश की भूमिका अहम होती है। ये इस वीडियो को देखकर समझा जा सकता है। इसमें अनन्या पाठक हैं। उम्र सिर्फ 11 साल। लेकिन इतनी उम्र इन्होंने जिस परिवेश में गुजारी, उसने इन्हें शुरुआती तौर पर गढ़ने में अहम भूमिका निभाई है। इसका प्रमाण है, ये गीत जो वे गा रही हैं। अभी 11 अक्टूबर को भारत रत्न नानाजी देशमुख की जयन्ती पर इन्होंने उन्हीं के एक गीत से उनका स्मरण किया। गीत के बोल हैं, “हर हाथ को देंगे काम, हर खेत को देंगे पानी। दुलहन बनकर फिर से सजेगी अपनी धरती रानी।।”
नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में बुधवार,सात अक्टूबर का दिन ऐतिहासिक रहा। रसायन शास्त्र से सम्बद्ध विशिष्ट श्रेणी में दो महिलाओं काे इस पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई। इस श्रेणी में किसी पुरुष को सम्मान के लिए नहीं चुना गया। इन महिला वैज्ञानिकों का नाम है- जेनिफर ए. डॉडना (Jennifer A.
भारतीय महिला हॉकी टीम ने प्रशंसनीय पहल की है। ऐसी, जो आम आदमी के ‘सरोकार’ से जुड़ी है। ओलम्पिक चैनल (olympicchannel) नाम की वेबसाइट के मुताबिक भारतीय महिला हॉकी टीम की सदस्य देश में ‘स्तन कैंसर’ के ख़िलाफ़ जागरुकता अभियान का हिस्सा बन रही है। यह अभियान ‘आरोग्य’ नाम का एक ग़ैरलाभकारी संगठन चला रहा है। यह संगठन कैंसर के इलाज से जुड़े शोध में भी शामिल है। संगठन के संस्थापक डॉक्टर प्रियांजलि दत्ता और ध्रुव काकेर हैं।
विषाणु (Virus) हमारे जीवन में सिर्फ़ विष यानि नकारात्मकता नहीं लाते। वे हमें काफी कुछ सकारात्मक भी देते हैं। बल्कि कुछ विषाणु तो अच्छे ही माने जाते हैं। मतलब कि वे हमारी सेहत, शरीर के लिए फायदेमन्द (Good Virus) होते हैं। वहीं जो ख़तरनाक होते हैं, घातक और मारक होते हैं, जैसे कि कोरोना, उनका भी दूसरा पहलू सकारात्मकता से भरपूर है। ऐसे विषाणु भी हमारे लिए कई अच्छे बदलावों के माध्यम बनते हैं।
अभी इसी महीने की 14 तारीख को 'हिन्दी दिवस’ मनाया गया। हर साल मनाया जाता है। लेकिन हर बार हिन्दी के प्रसार के लिए होने वाले सार्थक प्रयासों की जगह भाषायी विवाद ज्यादा सुर्खियाँ बटोरते हैं। इस बार भी यही हुआ। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का बयान 'हिन्दी दिवस’ के मौके पर पूरे दिन चर्चा में रहा। उन्होंने कहा था, “हिन्दी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हो भी नहीं सकती।” दक्षिण भारत के किसी राजनेता द्वारा हिन्दी पर की गई ऐसी टिप्पणी कोई नई बात नहीं है। वहाँ दशकों से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने-बताने की हर कोशिश का विरोध होता आया है। पर दुखद य