आज के बुलेटिन में जानिए
आज के बुलेटिन में जानिएः
इन सवालों के बारे में जानते हैं देवांशी से....
वाक़या जितना रोचक है, उतना सोचक भी। आज सुबह-सुबह काम करने के लिए जैसे ही कंप्यूटर खोला, उसमें दाहिनी तरफ से विज्ञापनों के नोटिफिकेशंस (Notificatoions) की जैसे बमबारी होने लगी। हर आधे-एक मिनट में एक ‘टुन्न’, फिर ‘टुन्न’। मतजब ऐसा कि आधे घंटे में भी दिमाग झन्ना गया। बीते रोज कंप्यूटर बन्द करते समय कहीं कोई अनदेखी हो गई होगी, जिसका नतीज़ा इस तरह सामने आ रहा था। चूँकि अपना कंप्यूटर का ज्ञान कामचलाऊ स्तर का ही है, इसलिए बहुत देर तक तो सूझा ही नहीं कि ये नोटिफिकेशंस आख़िर आ क्यों रहे हैं? और इन्हें बन्द कैसे किया जाए?
वहाँ इतना अँधेरा था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। इतना कि न नीचे ज़मीन दिख रही थी और न आसमान ऊपर। जब गर्दन घुमाई टेढ़ी करके, एक मौन हर तरफ व्याप्त था। दूर कहीं उजाला था तो कुछ चिंगारियाँ फुनगीनुमा थीं जो उस राख में से फुदक कर उछल पड़ती थीं। यह सब उस भीड़ से बहुत दूर था, जिसके पास हमेशा इस राख और इन चिंगारियों का भय व्याप्त रहता था। इस कटु सत्य को जानते सब थे, मानना कोई नहीं चाहता था।
सोनम वांगचुक को देश ही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों में भी लोग जानते हैं। शिक्षाविद्। हमेशा नवाचार में लगे रहने वाले। हर समय देश के हित में सोचने वाले। उन्होंने कुछ समय पहले ही मराठी भाषा के ‘एबीपी माझा’ चैनल पर एक साक्षात्कार दिया। इसमें बताया कि भारत के सरकारी स्कूलों की दशा-दिशा कैसे सुधारी जा सकती है।
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तत्कालीन गृह सचिव कृपाशंकर शर्मा : मुझे सीएस ने कुछ नहीं बताया
• एंडरसन को बचाने में कौन किसके दबाव में था? कलेक्टर ने कहा कि सीएस ने कहा था?
→यदि सीएस ने ऐसा कहा तो सीएम की मर्जी से ही किया होगा। वैसे अर्जुनसिंह की कार्यशैली ऐसी नहीं थी कि वे एंडरसन जैसे अहम मामले में सिर्फ सीएस को कहकर फारिग हो जाते। उन्होंने सीएस के साथ कलेक्टर और एसपी को बुलाकर सीधी बात की होगी। ताकि ऊपर से नीचे तक यह स्पष्ट हो कि हुक्म किसका है? मैं तो कहता हूं कि भोपाल के उस वक्त के हालात के मद्देनजर उस वक्त ये अधिकारी ऐसा हुक्म मानने से इंकार कर सकते थे।
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धन कमाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति प्रायः अपने पक्ष में यह कहता है कि ‘सर्वे गुणाः काञ्चनम् आश्रयन्ति’ यानि सभी गुण धन के आश्रय से ही फलते-फूलते हैं। इसीलिए हर कोई करोड़पति बनना चाहता है। लेकिन कैसे बनना है? यह प्रश्न दिमाग में आते ही उत्तर भी आता है, कैसे भी। यह ‘कैसे भी’ आश्चर्यजनक उत्तर है। क्योंकि इसमें मार्ग क्या हो, इसका महत्त्व नहीं रह जाता। रह जाता है, केवल धन कमाकर ‘धनपशु’ बन जाना।
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तस्वीर - PTI से साभार