हो आज रंग है री...आज रंग है री। तन - मन अधिक उमंग हर्षायो।
बृज की होरी कान्हा की पिचकारी, गोपियन की रंग-रास बरजोरी। अंगिया-भंगिया संग कान्हा-किशोरी। मन ललचा गयो मोरा फाग ने हिलोरी। हो आज रंग है री सखी...आज रंग है री।
सखियां कहें मोसे कहाँ गओ कान्हा, मैंने कह दयो रंग में सिमट गओ..भंग में सिमट गओ...मोरे अंग में लिपट गओ। बो तो उलझ गओ मोरे गेसुअन में, हमहुँ अरझ गये कान्हा की अंखियन में...सखी री बांकी बतियन में...रास और रसभरी रतियन में। हो आज रंग है री सखी...आज रंग है री।
ज़िन्दगी एक लम्बा ट्रैफिक है। आने-जाने वाले वाहनों की भीड़ है। छोटे-बड़े वाहन सड़क पर हर तरफ पसरे हैं। कोलाहल है, आवाज़ें हैं। कर्कश शोर है और धूल-धुआँ लगातार हर पल हर जगह बना हुआ है। मैं इसके बीच से गुजरता हूँ और हर झटके और छोटे-बड़े वाहनों के टल्ले से रोज अपने को बचाकर ले आता हूँ। गहरे अवसाद और तनाव के क्षणों में मेरा खालीपन, मेरी उदासी यह सब याद करके अपनी पीठ थपथपाती है। बहादुर होने का ख़ुद को ही ख़िताब देती है कि मुफ़लिसी के चरम दिनों में और इस क़दर व्यस्त संसार को अनथक देखते-समझते हुए तुम फिर लौट आए जीवन में। किसी के पास समय नहीं कि काँधे पर दो पल महीन सा एक गर्म हाथ रख दे और पूछ ले कि ठीक तो हो
होली पर कवियों का जमघट पुरानी परम्परा है। इसी परम्परा को आगे बढ़ा रहा है भारतप्रज्ञाप्रतिष्ठानम्। एक ऐसा संगठन, जो संस्कृति के क्षेत्र में नित-नए काम कर रहा है।
इस रंगोत्सव पर भारतप्रज्ञाप्रतिष्ठानम् ने देश के कोने-कोने से कुछ युवा हस्ताक्षरों को एक मंच पर लाने का काम किया है। कवि सम्मेलन रविवार, 20 मार्च, 2022 को है।
युवा प्रतिभाओं को सुनने के लिए 20 मार्च को शाम 5 बजे जुड़ना न भूलें। जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
होलीकोत्सव रंगों का उत्सव है। इसमें कोई भी रंग किसी से अलग नहीं बल्कि सभी मिलकर एक-रंग हो जाते हैं। हमारा देश अपनी विविधताओं से, विविध रंगों से उज्ज्वल है। हम ऊपरी तौर पर भले अलग-अलग दिखाई दें लेकिन भारतीय के तौर पर हम केवल भारत के एक नागरिक हैं। शुभम् आर्यन ने अपनी छोटे से चलचित्र के माध्यम से ऐसा ही सुन्दर सन्देश देने का प्रयास किया है। इसको सार्थक बनाते हुए आइए हम सभी भारतीयता के रंग से सराबोर हों भारत को सम्पन्न, समृद्ध, खुशहाल और श्रेष्ठ बनाएँ।
सभी को #अपनीडिजिटलडायरी की तरफ से रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।
छह- अर्जुनसिंह, मुख्यमंत्री : राजीव गांधी के दबाव में और एंडरसन के प्रभाव में थे। चुनाव के समय आए इस संकट में अपनी पोजीशन को बनाए और बचाए रखते हुए उन्हें एक साथ तीन को संतुष्ट करना था। पहला प्रधानमंत्री के नाते राजीव गांधी, दूसरा- अमेरिकी आभामंडल के प्रतीक एंडरसन और तीसरा- यहां की पीड़ित-प्रताड़ित जनता। एंडरसन की कसौटी पर ये खरे उतरे, क्योंकि जाते वक्त वह उन्हें गुड-गवर्नेस का तमगा देकर गया। कानूनी खानापूर्ति के लिए एंडरसन की गिरफ्तारी कराई, लेकिन गैर-कानूनी तौर पर उसे जाने भी दिया। ऐसा करके इन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे। पहला- चुनावी मौसम में हुए भयानक गैस हादसे स
श्रृंखला में पीछे हम जैन दर्शन के अन्तर्गत जीव या आत्मा की चर्चा कर रहे थे। आत्मा वही जो जीव है। जिसमें चेतना है। जिसमें बोध अर्थात् जिसमें समझ हो। जिसमें ज्ञान हो। जिसमें विवेक हो। वह जीव है। ‘आत्मा’ यह शब्द दर्शन के क्षेत्र में बड़े महत्त्व का है। ‘मैं’ यह बोलने वाला ‘मैं’ आत्मा है, अगर ऐसा कहें तो अनुचित नहीं होगा। यह ‘मैं’ जीव ही कह सकता है। जीव में ही ‘मैं’ होने का भाव रहता है। जैन आचार्य जीव के कई भेद करते हैं। इनमें संसारी और मुक्त भेद महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें संसारी और मुक्त भेद का अंतर एक कथा से समझने का प्रयास करते हैं।
फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को लेकर सोशल मीडिया पर जारी बेइंतिहा गहमागहमी से सभी वाक़िफ़ हैं। फिल्म को लेकर कश्मीरी पंडितों के अनुभव से लेकर विरोध में उठ खड़े हुए पब्लिक इंटलेक्चुअल्स स यह पता तो लग ही जाता है कि इससे जमीन हिली है। सो, इसका जायज़ा लेने के लिए एक लंबे अरसे के बाद आज आइनॉक्स जाना हुआ। वहाँ ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म
खुशियाँ छोटी थीं इतनी कि नजर नहीं आती थीं। शायद दरवाज़े पर ‘शुभ-लाभ’ लिखा होने या सुबह माँ की बनाई रंगोली में लक्ष्मी के पाँव देखकर लौट जाती हों। कम खर्च और मितव्ययिता का अर्थ तो अब इस उम्र में मालूम पड़ रहा है। पर उस समय में लम्बा चलना या मन मसोसकर रह जाना, मानो जीवन का स्थाई भाव था। लम्बी-लम्बी बहसों का परिणाम यह होता कि कामरेड लोग कहते कि तुम सुखी हो, जो इतना कुछ है तुम्हारे पास। यह कहकर वे लोग एक लम्बी गाड़ी में, जिसमें विदेशी किस्म की शराब भरी होती, एसी लगा होता, में बैठकर चले जाते। उनके घरों के गमले और पौधों का खर्च मेरी एक माह की तनख़्वाह के बराबर होता था। उनके घरों के एक कप, जो अक्सर हर
आज ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ है। पूरा विश्व महिला सशक्तिकरण और महिलाओं के अधिकारों पर व्याख्यान दे रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में, मैं भी जब जैनदर्शन की इस श्रृंखला का यह भाग महिला-केन्द्रित होकर लिखने की इच्छा से बैठा, तो सोचने लगा कि भारतीय समाज कितना उदार रहा है। भारतीय समाज में प्रत्येक विचारधारा पुरुष के पक्ष में नहीं, अपितु शक्ति की आराधना में लीन दिखाई देती है। मुझे इस बात कर गर्व की अनुभूति हुई कि भारतीय समाज की श्रेष्ठता सम्भवत: इसी में है कि वह मानवीय है। यहाँ महिला को अशक्त माना ही नहीं गया, जो उसके सशक्तिकरण के लिए आन्दोलित होने की आवश्यकता दिखाई दे।
चलो जीती हूँ आज से, मैं सिर्फ़ अपने लिए।
भूल जाती हूँ बचपन से, जीना माता-पिता के लिए शादी के बाद पति और बच्चों के लिए चलो तोड़ती हूँ, आज सारे बन्धन, मैं सिर्फ़ अपने लिए।
चलो मुश्किल है मुझे समझना, आसान बनाती हूँ, सबके लिए छोड़ती हूँ ससुराल में, सबकी हाँ में हाँ मिलाना शादी के बाद सिन्दूर और बिन्दी लगाना चलो छोड़ती हूँ हर क़दम पे, मैं रिश्तों का बोझ उठाना।