#अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों को #नॉलेजपिल्स में देवांशी आज बता रही हैं, नए साल के ऐसे संकल्पों की जो पूरे हो सकते हैं। जैसे- महीने में कम से कम एक किताब पढ़ना, डायरी लिखना, अपने अपनों को ख्याल रखना, उनके साथ अधिक से अधिक वक्त बिताना। ताकि हमारी जिंदगी में कुछ मिठास, थोड़ी खुशी घुल सके।
ऐसे ही कुछ और.. जानते हैं देवांशी से।
किसी को उम्मीद नहीं थी कि अदालत का फैसला 25 साल (अब 37 साल) पुराना रायता ऐसा फैला देगा। मीडिया में जो कुछ भी खुलकर आ रहा था, उससे पहली बार व्यापक रूप से जाहिर हो रहा था कि हादसे के बाद हुए षड्यंत्रों, फायदे के सौदों आपराधिक अनदेखी, केस को कमजोर करने और दोषियों को बचाने क एक लंबा सिलसिला चला था, जिसमें सबने खुशी-खुशी हाथ बटाए थे। ये सारे चेहरे बेनकाब हो रहे थे…
#अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों को #नॉलेजपिल्स में देवांशी आज बता रहीं हैं उनके बारे में, जो इस साल सुर्खियों में रहे। सुर्खियाँ बने। जैसे- भारतीय खिलाड़ी नीरज चोपड़ा, जिन्होंने ओलंपिक में पहली बार भाला फेंक (जैवलिन थ्रो) जैसी प्रतिस्पर्धा में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। सुंदर पिचई, कमला हैरिस जैसे भारतवंशी भी इस सूची में हैं। जिन्होंने अपनी उपलब्धियों से भारत को कई बार गर्व करने का अवसर दिया।
ऐसे ही कुछ लोगों के बारे में, जानते हैं देवांशी से।
राजीव सरकार में आंतरिक सुरक्षा मंत्री अरुण नेहरू ही यूनियन कार्बाइड मामले को देख रहे थे। हालांकि वे मंत्रिमंडल में 1986 में आए, लेकिन उसके पहले भी सरकार में उनकी तूती बोलती थी। प्रणब मुखर्जी ने जो 1995-96 में विदेश मंत्री थे और उन्होंने एंडरसन को फाइल आगे नहीं बढ़ाई थी। इसी कारण वे भी बैकफुट पर हैं। रविवार को मुखर्जी और नेहरू दोनों ने ही सात दिसंबर 1984 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्जुनसिंह के बयान को आधार बनाकर एंडरसन की रिहाई का दोषी उन्हें ही बता दिया।
#अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों को ‘नॉलेज पिल्स’ में देवांशी बता रहीं इस साल के कुछ चर्चित नवाचारों के बारे में। जैसे- एलजी का ओएलईडी टीवी। यह पलँग के पैरहाने पर फिट हो जाता है। यानि हम बिस्तर पर लेटे-लेटे आराम फरमाते हुए टीवी पर पसन्दीदा कार्यक्रम देख सकते हैं। ज़रूरत पड़े तो इसी टीवी को कंप्यूटर जैसा इस्तेमाल कर अपने काम निपटा सकते हैं। और जब नींद आए तो टीवी को पैरहाने में ही धीरे से नीचे सरकाकर खुद भी लम्बी तानकर सो सकते हैं।
ऐसे ही और भी कुछ नवाचाारों की बात, जानते हैं देवांशी से।
दिल्ली में कांग्रेस पूरी कोशिश में है कि उसके महान् नेता राजीव गांधी की बेदाग बचा लिया जाए। एंडरसन की सुरक्षित रिहाई के दाग उनके दामन पर न आएं। 25 साल (अब 37) पहले इसी पार्टी की सरकारें जीवित एंडरसन को बचाने में लगी थीं। अब राजीव गांधी का ख्याल सबसे ऊपर है। बेमौत मारे गए हजारों बेकसूर लोगों और इतने सालों से तकलीफ झेल रहे हजारों दूसरे पीड़ितों से ज्यादा अहम यह है कि एक दिवंगत शख्स के दामन को बचाया जाए।
#अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों के लिए ‘नॉलेज पिल्स’ में देवांशी बता रहीं इस साल की प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं के बारे में। ख़ास तौर पर वे जो जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग आदि के कारण सामनें आईं। जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यहाँ तक कि भारत के उत्तराखंड में भी जंगलों में लगी भयानक आग। बाढ़, भूकंप, तूफान और इसी तरह की अन्य घटनाएँ भी तमाम हुई हैं। इन घटनाओं से बड़े पैमाने पर जन के साथ धन की भी हानि हुई है। इस नुकसान से जरिए इन घटनाओं ने हमें बताया है कि हम आज नहीं चेते तो आने वाला कल हमारे लिए ही बड़ा मुश्किल होने वाला है।
भगवान महावीर के शिष्य ने एक बार प्रश्न किया, “गुरुदेव, मनुष्य के अधोपतन का क्या कारण है और उससे अपनी मुक्ति के लिए क्या किया जाना चाहिए?”
इसका उत्तर देने के बजाय महावीर ने प्रश्न किया, “यदि कोई कमंडलु भारी है और उसमें पानी भी अधिक मात्रा में समा सकता हो, तो क्या वह खाली अवस्था में छोड़े जाने पर डूबेगा?”
“कदापि नहीं,” शिष्य ने उन्हें ज़वाब दिया, “बस, उसमें कोई छिद्र न हो।”
छोटी सी बच्ची का बड़ा सा काम। ‘नॉलेज पिल्स’ यानि ज्ञान की गोली के रूप में। दिल्ली से देवांशी वशिष्ठ ने यह कोशिश शुरू की है। #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों को ‘नॉलेज पिल्स’ देने। इसमें सामान्य ज्ञान की कुछ चुनिन्दा घटनाओं की जानकारी वे दे रही हैं। भाषा अंग्रेजी है उनकी। क्योंकि उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि अंग्रेजी माध्यम वाली है। हालाँकि यह अंग्रेजी ऐसी नहीं जो समझी न जा सके। देवांशी की कोशिश होगी कि वे रोज इस तरह की नॉलेज पिल्स डायरी के पाठकों को दे सकें। फिर भी वे अभी छोटी हैं तो सम्भव है, कभी सिलसिला चूके भी। हालाँकि डायरी के पाठकों का स्नेह उन्हें भरपूर मिला तो उनका प्रोत्साहन बढ़ेगा और
अशोक वर्णवाल (मध्य प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अफसर) ने लिखा…
मोती सिंह के सामने विकल्प था कि वे किसे चुनें- 'मैं नहीं तो कोई और' या 'मैं नहीं भले कोई और।' उन्होंने पहला और आसान लगने वाला विकल्प चुना। कोई और उस काम को करने के लिए राजी हो सकता था तो वे क्यों नहीं।