जीने की सम्भावनाओं के बीच हम जीने के बजाय अमर होने की चाह लिए रहते हैं। अपने हर कर्म, विचार को इस कसौटी पर तौलते हैं कि मेरे बाद मेरे साथ यह संलग्न न रहे, या मुझे यश देकर अमर कर दे। इस सबमें जीने का मज़ा भूलते हैं। याद रखना चाहिए कि मरने के बाद तो हम कम से कम हजार वर्ष ज़िन्दा रहेंगे ही। जब तक कि हमारी स्मृतियाँ किसी न किसी में क्षणांश भर के लिए भी बनी हैं। पर आज जो अपने ज़ेहन में सुखद स्मृतियों के बजाय अवसाद, तनाव और कटुता एकत्रित कर रहे हैं, उससे तो जीने का मज़ा ही खत्म हो जाएगा। सब भूलकर बस आनन्द से जी लो, कोई किसी को न सुधार सकता है, न बिगाड़ सकता है। और न ही आप-हम पर
जो चीज जैसी है, उसे वैसे ही जानना, न कम, न ज़्यादा, अवस्था के अनुरूप जानना, उसका सम्यक् बोध होना ही सम्यक् ज्ञान है। सम्यक् ज्ञान क्या नहीं है? यह जानना सम्भवत: सम्यक् ज्ञान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया। सम्यक् ज्ञान के अभाव में हम अक्सर दूसरों को तो चोट पहुँचाते ही हैं। उससे भी अधिक ख़ुद को आत्मिक चोट देते रहते हैं। सबसे बड़ी बात इस आत्मिक क्षति का अहसास हमें अक्सर नहीं हो पाता।
परछाइयाँ बहुत गहरी हैं। हम सब बहुत तकलीफ़ में हैं। उम्र का लम्बा पड़ाव बीत गया है और कुल जमा हासिल अगर यह था या ये होने वाला था तो ज़िन्दगी की सभी शर्तें नामंज़ूर हैं और मैं सब लौटाकर फिर से शून्य पर लौटना चाहता हूँ। एक नई ताक़त और जोश के साथ, नई दिशाएँ तलाशने और वो सब कुछ पाने को जो खिलन्दड़पन से हासिल हो सकता है। मुझे नहीं चाहिए ये ख़ौफ़, वहशत और अंधेरे बन्द कमरों की सौग़ातें।
भीड़भरे शहरों में अक्सर रहा हूँ, जहाँ ट्रैफिक सिग्नल को देखते-समझते ही उम्र के दशक गुजरते जाते हैं। हम भीड़ में फँसे हों और सामने की गाड़ियाँ सरक रही हों, तो दस बार लाल-हरी बत्ती को देखते-देखते अधीरता भी ख़त्म होने लगती है। एक उकताहट सी होने लगती है। अन्त में जब हमारा नम्बर आता है तो अक्सर हमें लाल और हरे के बीच पीले वाले समय मे क्रॉस करना पड़ता है। जीवन इसी का नाम है, ख़तरों और सुरक्षित घेरे के बीच से निकलकर पार हो जाना।
एक मैयत में गया था आज। घर में तो सब ठीक था। रास्ते में भी दुख उमग रहा था। पर श्मशान में मुखाग्नि से कपाल क्रिया के बीच फुर्सत के घंटों में हम सब लोगों ने उस मृतक को इतना ग़लत साबित किया कि यदि वह सुन लेता तो शायद जन्म के क्षण ही मरने का निश्चय कर लेता। दिलचस्प यह कि बाहर निकलते समय श्मशान वैराग्य का टैग सबके मन मस्तिष्क और आत्मा पर नत्थी था।
दो अधेड़ और काफ़ी हद तक प्रबुद्ध सुअर, हाँ भाई सुअर ही, अपनी किसी राष्ट्रीय समस्या पर चर्चा कर रहे हैं। चूँकि दोनों प्रबुद्ध हैं तो सुअर होने की नियति से ऊपर उठकर चर्चा करना उनका नैतिक दायित्व है। वे इस समय देश में स्वच्छता की समस्या पर चर्चा कर रहे हैं। उनके लिए स्वच्छता ही समस्या है। चूँकि समस्या
एक मीना बाज़ार लगता था, हर वर्ष नवरात्रि में। उसमें घूमने जाने का मज़ा ही कुछ और होता था। बड़े-बड़े झूले उसकी पहचान थी। कई बार हिम्मत की कि किसी एक झूले में बैठूँ पर अन्दर का डर हमेशा हावी रहा। ऊँचाई, चक्राकार गति और कर्कश आवाज़ें नीचे से ही सुनकर भयभीत हो जाता था। रोपवे पर आज भी बड़ी हिम्मत के बाद बैठ पाता हूँ। नीचे देख नहीं पाता। ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं। जुगुप्सा रूपी भय दर्ज़ करती है, दिलो-दिमाग़ पर। इसलिए ऊँचाई कभी पसन्द नहीं आई।
दो बार फोन लगाया पर नहीं उठाया, आख़िर रख दिया। सोचा कि अगला ड्यूटी पर होगा और जब समय मिलेगा तो ख़ुद कर लेगा। आख़िर रात में स्क्रीन पर नाम चमका तो लगा कि चलो, ज़वाब तो आया। बात शुरू की तो कुछ समझ नहीं आ रहा था। जैसे कोई गम्भीर हकलाने वाला हो और आवाज़ लथड़ रही हो। बहुत हिम्मत करके वो लगभग चार मिनिट में इतना ही बोल और समझा पाया कि टेक्स्ट मैसेज से बात करो।
जिनसे उम्र भर लड़ते-भिड़ते रहते हैं, वे एक दिन हम सबसे दूर हो जाते हैं। सदा के लिए संसार त्याग देते हैं। हम दुख मनाते हैं। मातम में रहते हैं। फिर धीरे-धीरे पटरी पर लौटते हैं और दोबारा सुख खोजते हैं। खुशियाँ तलाशते हैं पर यह भूल जाते हैं कि खुशियाँ रिश्तों में नहीं हैं। सम्बन्धों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर हैं।
अब मार्केट में देवी-देवताओं के नाम वाले बम और पटाखे तो नहीं हैं, लेकिन नेताओं के नाम वाले पटाखों की भरमार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिशा-निर्देशों में कहा है कि पटाखे पॉल्यूशन-फ्री होने चाहिए। यानि उनसे किसी तरह का प्रदूषण न फैले। लेकिन इन नेता छाप पटाखों पर ये दिशा-निर्देश लागू नहीं होते। इसलिए आम आदमी को मशविरा दिया जाता है कि इनका इस्तेमाल सोच-विचारकर ही करें।