घटना बहुत पुरानी नहीं है। लेकिन समय वह था, जब देश में धन-समृद्धि अधिक थी। मग़र फिर भी किसी ब्राह्मण का धनवान होना तो एक अनहोनी घटना ही होती थी। ऐसे ही, एक अत्यंत विरल महानुभव हमारे गाँव के हरिप्रसाद व्यास थे। व्यास जी के पास कोई दो सैकड़ा बीघा ज़मीन थी। बैलों की 30 से कम जोड़ी कभी नहीं रहती थीं उनके यहाँ। पाँच सौ से अधिक गायें थीं। सिर्फ़ गाय-बैलों की देखरेख के लिए पंद्रह-सोलह लोग थे। खेती के कामों के लिए हाली अलग थे। पंडित जी स्वभाव से थोड़े तेज थे, लेकिन अपने धर्मसम्मत आचरण, समझबूझ और व्यवहार से आसपास के 40 गाँवों में उनका सम्मान था। गाँव में किसी को भी दूध-दही- मठे की ज़रूर
अगर देश के गृह मंत्री बोल रहे हैं कि अब किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है तो फिर वाक़ई डरने की ज़रूरत नहीं ही होगी। सिद्धान्तत: ऐसा माना जा सकता है। पर ऐसे भी कैसे मान लें? इसकी ज़मीनी स्तर पर पुष्टि भी तो ज़रूरी है। सो, यही पुष्ट करने के लिए रिपोर्टर सीधे पहुँच गया एक आम आदमी के पास। इतिहास गवाह है कि सबसे ज़्यादा डर तो आम आदमी को ही लगता है। इसलिए डर के स्तर के बारे में असली पुष्टि तो आम आदमी से ही हो सकती थी।
“आप रिपोर्टर ही हो, इस बात की क्या गारंटी?” इधर-उधर देखकर आम आदमी ने पूछा। वह इन्टरव्यू से बचने का कोई न कोई रास्ता तलाश रहा है। बेमतलब का लफड़ा नहीं चाहता।
अभी तक विविध कड़ियों के माध्यम से बुद्ध के सिद्धान्तों, उपदेशों, उनके जीवन की घटनाओं का परिचय प्राप्त किया। इन विविध प्रसंगों से यह ज्ञात होता होता है कि बुद्ध ने भारतीय परम्परा से प्राप्त ज्ञान और अनुभव से, अपने उपदेशों के जरिए समाज में सरल व्यवस्था बनाने का प्रयास किया।
किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ भी नहीं मिलेगा। मेरे से लेकर तुम्हारे अतीत तक इतना कीचड़ है कि हम यह पूरी धरती 10 बार ढाँक सकते हैं। इसलिए बस वर्तमान में रहें, जब भी किसी से मिलें मुस्कुरा दें- अपना और उसका वही चेहरा ज़ेहन में रहे, जो अभी साँस ले रहा है। थोड़ा भी दिमाग़ पर जोर डालेंगे तो दिक्क़त होगी।
भारत के बड़े समाचार चैनल में काम करने वाली युवा पत्रकार सौम्या सिंह ने अभी ही नौकरी छोड़ी है। वैसे, यह कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन सोशल मीडिया (LinkedIn) पर उन्होंने नौकरी छोड़ने की सूचना देते हुए जो लिखा, वह ज़रूर बड़ी बात है। सौम्या ने लिखा, “मैंने नौकरी के साथ ज़हरीला वातावरण भी छोड़ दिया है।.. अब मैं बहुत राहत महसूस कर रही हूँ।” इसके बाद उनके जानने वालों ने उन्हीं के अन्दाज़ में उन्हें बधाइयाँ दीं। हालाँकि यह कोई इक़लौता उदाहरण नहीं है। ... क़रीब 70 फ़ीसद लोग ऐसे ही कारणों से और बेहतर विकल्पों के लिए इस्तीफ़ा देने को तैयार हैं।
बहुत पुरानी बात है। बोलपुर (पश्चिम बंगाल) के स्टेशन पर आधी रात थी। छोटा सा स्टेशन और मुसाफ़िरख़ाने में सात-आठ यात्री इन्तज़ार कर रहे थे। झपकी ऐसी लगी कि मेरा सहयात्री मुझे जगाता रहा पर मैं नहीं जागा। वह चला गया, सदा के लिए। कुछ यात्राएँ कभी पूरी नहीं होतीं। वे भीतर ही भीतर चलती हैं। वे छोड़ती नहीं अपना दारुण्य और वैभव।
जैसे-जैसे विजयादशमी नज़दीक आती है, बड़े रावण की छोटे वाले से कोफ़्त बढ़ती जाती है। विजयादशमी के दिन तो वह फूटी आँख नहीं सुहाता। सोचता, यह जितनी जल्दी यहाँ से टले, उतना अच्छा। लाज़िमी भी है। मंच पर भाषण वो दे, समिति वालों को चन्दा वो दे और सारा अटेंशन लूट ले जाए मैदान में खड़ा छटाँक भर का रावण। क़द बड़ा हुआ तो क्या हुआ, रावणत्व में तो छोटा ही है, बड़े वाले की तुलना में छटाँक भर का।
‘न्यूटन’ फिल्म में अभिनेता राजकुमार राव दूरस्थ आदिवासी गाँव में चुनाव करवा रहे हैं। वे बूथ पर अपने सहयोगियों से पूछते हैं कि क्या वे निराशावादी हैं? ये सवाल जब वे अभिनेत्री अंजलि पाटिल से पूछते हैं तो वे जवाब देती हैं, "नहीं सर मैं आदिवासी हूँ" और राजकुमार राव चुप हो जाते हैं। इस ज़वाब का क्या मतलब है? यही कि जो जल, जंगल, ज़मीन पर निर्भर है, जिसने प्रकृति से जीवन को जोड़कर अपने को दुनिया से मुक्त कर लिया है, जिसने न्यूनतम साधनों से जीवन की लय को जोड़कर मस्त रहना सीख लिया है, वह निराशावादी हो नहीं सकता। कबीर कहते हैं, "जब मन मस्त हुआ तो फिर क्या बोले।" आशा यहीं से उपजती है। ---
हम सब स्तब्ध हैं। निशब्द हैं। दिमाग़ पंगु हो गया है। यदि कोई इस समय ज़रूरी मुद्दे या काम की बात कर ज्ञान-विज्ञान, समाज, संस्कृति, राजनैतिक बिन्दुओं आदि पर अपनी पारंगतता दर्शाता है, तो माफ़ कीजिए वह मनुष्यता की सीमा से परे हो चुका है। ---- अभी-अभी हमने सड़कों पर छाले लिए चलती लाशों के हुज़ूम देखे हैं। गर्भवती, धात्री एवं सद्य प्रसूताओं के साथ नवजात शिशुओं को देखा है। वे किसी कारवाँ में चल रहे थे। हमारे देखते-देखते तड़प कर गिर पड़े। उनकी इहलीला समाप्त हो गई। -----
गाँधी जी भारत की तरह चिरन्तन हैं। वे भारत की महानता, बल, कमजोरी, सीमाएँ और सम्भावनाओं के प्रतीक हैं। जयन्ती के बहाने एक बार फिर हम उनकी और अपनी हक़ीक़त का जायज़ा लेने का प्रयास करते हैं।
स्वातंत्रोत्तर मुख्यधारा के इतिहास में गाँधी जी भारतीय गणराज्य के नैतिक, संवैधानिक और राजनीतिक मूल्यों के स्रोत के रूप में अवतरित होते हैं। वे युगपुरुष हैं, जिनमें अपने देश-काल के धर्म, नीति और राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति की विहंगम दृष्टि और समझ है। समकालीन समाज को दिशा देने का प्रबल पुरुषार्थ है।