डायरी के इस पन्ने पर पड़ी तारीख अपने आप में सारी कहानी कहती है। यह ऐसी तारीख है, जब देश में कोरोना के मामले पहली बार सारे आँकड़ों को पार कर गए हैं। पिछले साल इन्हीं दिनों अमेरिका बिलबिला उठा था। यह वह समय था जब वहाँ एक दिन में तीन लाख मामले सामने आए थे।
अब हमारे यहाँ हालात उस महाशक्ति से भी बदतर हो गए हैं। अभी दो दिन पहले यानी 21 तारीख को देश में 24 घंटे में पहली बार तीन लाख 14 हजार नए मामले सामने आए। ये कल के अख़बारों का शीर्षक था।
हर साल एक लड़के के माता-पिता उसे गर्मी की छुट्टी के लिए दादी के घर ले जाते थे, और वे दो हफ़्ते बाद उसी ट्रेन से घर लौट आते।
फिर एक दिन लड़का अपने माता-पिता से कहता है: "अब मैं अब बड़ा हो गया हूँ। क्यों न मैं इस साल अकेले ही दादी के घर जाऊँ?"
चर्चा के बाद माता-पिता भी सहमत हो जाते हैं। अब सब लोग प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं, और एक-दूसरे का अभिवादन कर रहे हैं। जैसे ही खिड़की के पास खड़े होकर पिता बेटे को यात्रा के लिए कुछ टिप्स देने लगते हैं, लड़का कहता है, “मुझे पता है। आप पहले ही मुझे कई बार बता चुके हैं!”
रोज़ाना की तुलना में आज मेट्रो सूनी है। इतना सूनापन डराता है। हालाँकि आज दिल्ली में कर्फ्यू है। लेकिन ज़िन्दगी तो चल ही रही है। कुछ ज़िन्दगियाँ लड़खड़ा रही हैं, तो उन्हें सम्भालने की कोशिश में कई ज़िन्दगियाँ लगी हैं। इस क्रूर समय में यही एक ख़ूबसूरत बात है।
मेट्रो में एक लड़का हैरान-परेशान है। बार-बार पानी पी रहा है। लगातार कहीं फ़ोन मिलाने की कोशिश कर रहा है। खीझ रहा है। बात नहीं हो पा रही है। एकाध जगह बात हुई तो "सलाम अलैकुम" से आगे नहीं बढ़ पाई। मास्क के ऊपर आँखें गीली हैं। माथे पर पसीने की सीलन है।
कहानियाँ रास्तों में बिखरी पड़ी थीं। कविताएँ पेड़ों पर लदी रहती थीं। धूल के हर कण में चलते-फिरते चरित्र नज़र आते थे। उसे लगता कि रचना बहुत सरल है और इसी राह पर चलते-चलते वह एक दिन इतना विपुल रच देगा कि शायद संसार में किसी से पढ़ना सम्भव ही नहीं हो पाएगा। पहले का रचा-बुना गया सब व्यर्थ हो जाएगा।
वह उन अभिन्न पलों का साक्षी रहा है, जो जीवन ने उसे भरपूर मात्रा में दिए; जिन्हें वह सहेजते हुए ही उम्र के उस पड़ाव पर आ गया कि सब कुछ विरल हो गया। मानो, इस यात्रा में उसे इतना मिला कि उसकी झोली भरते-भरते खाली हो गया। एकदम विरक्त और विलोपित।
आज शाम गायत्री मन्दिर जाना हुआ। वहाँ जाता हूँ तो अक्सर कोई न कोई बुज़ुर्ग मिल जाता है। उनसे बातें करता हूँ, तो कुछ नया जानने को मिलता है। आज भी एक बुज़ुर्ग मिल गए। उनसे बातें करने लगा। उन्होंने एक कहानी सुनाई, जिसे मैं हू-ब-हू यहाँ डायरी में दर्ज़ कर रहा हूँ। वे बताने लगे...
जाने-माने लेखक संदीप नाईक जी की 'एकांत की अकुलाहट' श्रृंखला का हम दिन बदल रहे हैं। इस श्रृंखला की अगली कड़ियॉ॑ अब हर शनिवार को आया करेंगी। #अपनीडिजिटलडायरी के पाठक-सहभागियों के आग्रह का सम्मान करते हुए यह फ़ैसला लिया गया है।
डायरी से जुड़े कई लोगों का कहना था कि दो पठनीय श्रृंखलाओं को हम एक के बाद एक लगा रहे हैं। पहले मंगलवार को अनुज राज पाठक की 'भारतीय दर्शन' श्रृंखला। फिर अगले ही दिन संदीप जी की 'एकांत की अकुलाहट'। लेकिन अगर इनके बीच दो-तीन दिन का अन्तराल होता तो बेहतर रहता।
पिछली तीन कड़ियाें में चार्वाक दर्शन के बारे में थोड़ा कुछ जानने-समझने की कोशिश की। जबकि उससे पहले दो कड़ियों में इन प्रश्नों पर विचार किया कि भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी? और परम ब्रह्म को जानने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा? आज इसी दूसरे प्रश्न से सिलसिला आगे बढ़ाते हैं।
जीवन में कई बार छोटी-छोटी कहानियाँ बड़ी सीख दे जाती हैं। लेकिन वे कहानियाँ सबसे सुन्दर होती हैं, जो इंसानियत का पाठ पढ़ाती हैं।
इस छोटी-सी कहानी को सुनकर महसूस किया जा सकता है कि हमें किस तरह सबसे पहले अपने कर्त्तव्य पर ध्यान देना चाहिए। पैसा तो आना-जाना है। इस पल किसी हाथ में है, तो अगले में और के हाथ में होगा।
क्लबहाउस (ऐपल यूजर्स के लिए बतकही का अड्डा) पर चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर के साथ चुनिन्दा पत्रकारों (पढ़ना चाहिए, मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी के आलोचक) की बातचीत लीक होने के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार और भाजपा की जीत के कयास लगने तेज हो गए हैं। लोग कह रहे हैं कि प्रशान्त किशोर ने हार मान ली। भाजपा बंगाल जीत जाएगी। उनकी प्रतिक्रिया देख ऐसा लग रहा है, जैसे भाजपा के बंगाल जीत जाने से कयामत आ जाएगी, जो अब तक नहीं आई है।
‘द बिग बुल’ अभिषेक बच्चन की फिल्म है। उन्होंने इसमें अपनी अभिनय क्षमता को खरा सोना साबित करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की है। हालाँकि फिल्म कुछ दूसरे मोर्चा पर कमज़ोर पड़ी है। लेकिन यह कई सवालों को उठाने में कामयाब रही, इसमें कोई दो-राय नहीं। बशर्ते, हम हिन्दुस्तान के मुस्तकबिल को ध्यान में रखते हुए देखें, तो। अभिषेक के किरदार हेमन्त शाह की नियति चाहे जो रही हो, लेकिन फिल्म ने ये साबित करने की कोशिश की है कि वह परिस्थितियों में फँसकर मारा गया। हालाँकि इससे पहले उसने हमारी बैंकिंग प्रणाली में व्याप्त कमजोर पहलुओं को अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से पकड़कर करोड़ों कमाए