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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

कुछ ऐसा कीजिए उपाय, सारी कड़वाहट दूर हो जाए

By आकाश कुमार सिंह, छपरा, बिहार से, 28/3/2021 - रवि, 03/28/2021 - 14:01

होली त्यौहार है रंग का, उमंग का। पर अगर दिलों में कड़वाहट घुली हो तो जीवन में न कोई उमंग रह जाती है, न रंग। इसीलिए हर साल होली आती है। हमारे बीच की कड़वाहट मिटाने के लिए। रंग और उमंग चढ़ाने के लिए। हालाँकि एक होली के दिन तो शायद यह सम्भव हो भी जाता हो, मगर क्या साल के पूरे 365 दिन, हर दिन हम कड़वाहट भूलकर रंग, उमंग के साथ रह पाते हैं? ज़वाब इसका बहुतों के लिए मुश्किल हो सकता है। 

मैं अगर चाय छोड़ सकता हूँ, तो यक़ीन करना चाहिए- कोई कुछ भी कर सकता है

By गजेन्द्र सोनी, जौनायचा खुर्द, अलवर, राजस्थान से, 27/3/2021 - शनि, 03/27/2021 - 22:38

चाय। चाय केवल इसीलिए नहीं पी जाती कि अच्छी लगती है। चाय पीने के और भी कई कारण हो सकते हैं। चाय आदर-सत्कार की अनिवार्य वस्तु मानी जाती है। चाय पर न जाने कितने रिश्ते बन-बिगड़ जाया करते हैं। और फिर मैं तो ठहरा चाय का शौकीन। कोई मुझसे उसकी बात भी छेड़े, तो बातचीत का विस्तार फिर चाय की चुस्कियों के साथ ही होता है। 

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हिन्दी में लिखना ही तुम्हारी शरण अर्हता का प्रमाण है!

By प्रणीण झा, कॉन्ग्सबर्ग, नॉर्वे से, 26/3/2021 - शुक्र, 03/26/2021 - 13:50

हिन्दी के लेखक लोग #NoToFree चला रहे हैं, माने मुफ़्त में कुछ नहीं। इसके विरोध में मेरा #YesToFree है। मैं सभी तरह के कार्यक्रमों, मंचों, शादी, बियाह, जनेऊ, मुंडन के लिए उपलब्ध हूँ। कुछ श्रद्धा से खर्चा-पानी दे दीजिएगा। एक समय का मैथिल भोजन काफ़ी है। रसगुल्ला न मिले तो गुलाबजामुन चलेगा। इक्यावन व्यंजन का जोर न देंगे, ग्यारह से काम चल जाएगा। 

अहो! भारत के तेज से युक्त यह होली दिख रही है..

By टीम डायरी, 25/3/2020 - गुरु, 03/25/2021 - 14:26

जिस उम्र में लोग आधुनिकता और दुनियावी चमक-दमक के पीछे भागते हैं, उस उम्र में कुछ युवा ऐसे भी हैं, जो संस्कृत और संस्कृति को चमका रहे हैं। उसे निखार रहे हैं। उसकी नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं।

ऐसे युवाओं में कुछ नाम हैं - शुभम आर्यन्, गौरव मलिक, शौर्य नान्दल और संजू नान्दल। इन युवाओं ने 25 मार्च को ही एक वीडियो ज़ारी किया है। होली के अवसर पर, संस्कृत भाषा में, भारतीय संस्कृति के रंगों से सजे पर्व की शुभकामनाएँ देने के लिए।

वीडियो में सुने जा रहे गीत के बोल हैं...

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काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता!

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 24/3/2021 - बुध, 03/24/2021 - 17:06

इसी गाढ़ी नीली दीवार के पीछे लटका है, माघ के शुक्ल पक्ष का चाँद, जो पूनम से होते हुए आज चौथ पर एक चौथाई कम हो गया है।  बस यही, हाँ यही चाँद मुझे पसन्द है - पूनम का बड़ा सा खिला-खिला दूधिया रोशनी में नहाता चाँद मुझे पसन्द नही है, जिसे सारी दुनिया देखती है। आज के चाँद को देखने वही लोग देर तक जागते हैं, जो उपवास करते है, हिम्मत से भूखे रहकर बाट जोहते रहते हैं कि कब आसमान में चौथ का उदय होगा और चाँद निकलेगा।

‘चारु-वाक्’...औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होए!

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 23/3/2021 - मंगल, 03/23/2021 - 21:40

बुद्ध दर्शन। ये परवर्ती दर्शन है। लेकिन बुद्ध दर्शन परम्परा का आदि दर्शन है, ‘चार्वाक दर्शन’। सवाल हो सकता है कि यह बौद्ध परम्परा का आदि दर्शन कैसे? तो ज़वाब ये मिलता है कि बौद्ध दर्शन असल में नास्तिक दर्शन है। और भारतीय दर्शन परम्परा में आचार्य चार्वाक को नास्तिकों का शिरोमणि कहा जाए तो सम्भवत: अनुचित न होगा। इस तरह नास्तिक दर्शनों में आदि दर्शन हुआ, चार्वाक दर्शन। इसीलिए यह बुद्ध दर्शन का भी आदि दर्शन हुआ। 

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मैं 70-80 के दशक का बचपन हूँ...

By अवनीश सक्सेना, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 19/3/2021 - शुक्र, 03/19/2021 - 13:56

ये लाइनें किसने लिखीं, पता नहीं। लेकिन जिसने भी लिखीं, क्या खूब और कितनी सच्ची लिखी हैं। दिल से लिखी हैं। सीधे दिल तक पहुँचती हैं। बीते दिनों सामाजिक कहे जाने वाले माध्यमों (Social Media) से होते हुए मुझ तक ये लाइनें पहुँचीं, तो मुझे लगा इसे #अपनीडिजिटलडायरी पर भी दर्ज़ करना चाहिए। इसीलिए लिखने वाले के प्रति ह्रदय से आभार व्यक्त करते हुए इन लाइनों का यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ, जिन्होंने चन्द मिनटों में ही मेरा और मेरे जैसे न जाने कितने लोगों का बचपन आँखों में तैरा दिया होगा।

मैं 70-80 के दशक का बचपन हूँ।

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जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो...

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 17/3/2021 - गुरु, 03/18/2021 - 00:18

हम सब अपने एकांत में बेहद क्रूर और दुराचारी होते हैं। भीड़ में बेहद डरपोक और शिष्ट।

याद आता है कि कैसे एक शान्त नदी अपने उद्भव से निकलती है, तो छोटी सी लकीर होती है। पर ज्यों-ज्यों पहाड़, कन्दराओं से गुजरती है तो उच्छृंखल और बेख़ौफ़ होती जाती है। क्योंकि वह अपने उद्भव को, अपनी जड़ों को छोड़ चुकी है। अब मस्त होकर वह सब कुछ हासिल कर लेना चाहती है। 

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परम् ब्रह्म को जानने, प्राप्त करने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 16/3/2021 - मंगल, 03/16/2021 - 14:02

क्या है कि बहुत से मनुष्यों की प्रकृति बेचैन रहने की होती है। उनको कुछ ना कुछ चाहिए, जिसमें वे उलझे रहें। ऐसे ही कुछ लोगों के मन में हर चीज को खोद-खोद कर देखने की आदत लगी होगी। उनकी बेचैन प्रकृति ने उनके मन में उतने ही स्वाभाविक सवाल पैदा किए होंगे। जैसे, हवा क्या है? पानी क्या है? ज़मीन क्या है? आग क्या है? आकाश क्या है? ये कहाँ से आए? इन्हें किसने बनाया? क्यों बनाया? इनकी जरूरत क्या है? इन्हें मिटा कौन देता है? ऐसे तमाम सवालों से उन पहले से बेचैन लोगों की बेचैनी और बढ़ी होगी।  

काश, ‘26 जनवरी वाले वे बड़े लोग’ इस बच्चे से रह जाते! 

By टीम डायरी, 13/3/2021 - शनि, 03/13/2021 - 21:34

वीडियो में दिख रहा ये छोटा सा बच्चा दिल्ली के मयूर विहार स्थित रयान इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है। धैर्य जोशी नाम है इसका। इसी 26 जनवरी की बात है, जब ये सज-धजकर अपने ‘गणतंत्र दिवस’ और उसकी अहमियत के बारे में चन्द पंक्तियाँ बोल रहा था। निश्चित रूप से उसके शिक्षकों या माता-पिता ने उसे ये पंक्तियाँ रटवाई होंगी। पर उसने उन्हें इस ख़ूबसूरती से निभाया कि वहाँ मौज़ूद लोग उसे अपने मोबाइल कैमरों में कैद करने से ख़ुद को रोक नहीं पाए। 

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