#अपनीडिजिटलडायरी पर भारतीय दर्शन श्रृंखला का पहला लेख पढ़ा। शुरुआत बहुत अच्छी है।
मेरी भी यही मान्यता है कि भारतीय संस्कृति अपने उदातग स्वरूप में, समृद्ध चिन्तन परम्परा में, ज्ञान विज्ञान की उन्नति में, वाद-प्रतिवाद, तर्क-वितर्क, इन सब में तभी विकसित हो पाई, जब हम भौतिक ऐश्वर्य से युक्त हो चुके थे। जीवन व्यवस्थित था। कोई न कोई शासन, न्याय प्रणाली आकार ले चुकी थी। कभी भी भूखा, कबीलाई, घुमक्कड़ समाज इतना उत्कृष्ट चिन्तन नहीं दे सकता।
एक दीवार है, जो गाढ़ी नीली रँगी है। जब कमरा बना था, तो इस पिछली दीवार को गाढ़ा नीला रंग लगाया था। ठीक पिछले पड़ोसी की दीवार से लगकर इसे कंक्रीट की छत पर उठाया था, जो अब इस कमरे की ज़मीन बन गई है।
तीन हल्के नीले रंगों के बीच गाढ़े रँगीले नीले रंग पर एक छोटा सा बल्ब भी टाँग रखा है। वो भी गहरा नीला है। सिर्फ़ उजाले से ही नही, बल्कि अपने होने से भी।
सुबह उठो, अपने आपको च्यूँटी काटो
जागो, अपने उन दो पाँवों को निहारो जो आगे बढ़ते हैं सदैव
इन्हीं पाँवों पर तन - मन और आत्मा के साथ सपनों का बोझ डालो
अपने मुँह के भीतर जुबाँ घूमाओ और खुद का नाम पुकारो, जोर से
खिड़की खोलो, दरवाज़े को धक्का मारकर खोलो, रोशनी का स्वागत करो
आँखों को मलो और दीदें फाड़कर सूरज को घूरकर देखो
चूल्हे की आग को अपने आँचल में सामने रखो ताकि जलती हुई अग्निप्रभा सबको दिखाई दें, और फिर सबके सामने से सिर ऊँचा करके निकलो
माँ अब बदल रही है। पर कितनी, कहाँ। और कहाँ नहीं। वक़्त के साथ उसका बदलना कितना ज़रूरी है। इस कविता में ऐसे कुछ पहलू छूने की कोशिश की गई है। कविता के साथ ही महिलाओं की तरफ़ एक महिला की महात्वाकाँक्षी पुकार भी है.. ..‘खोल दो बन्धन इनके, हर मंज़िल पा जाएँगी!
महान् गुणों से ओत-प्रोत महिलाएँ समर्थ थीं, हैं और रहेंगी भी। क्योंकि उनमें तमाम विपरीतताओं के बावज़ूद उस सामर्थ्य को हासिल कर लेने का इरादा होता है। कैसे भी। उदाहरण, अभी कुछ दिन पहले ही मेरे अनुभव से गुज़रा। मेरी सासू माँ श्रीमती शकुन्तला पाठक जी का उस दिन मेरे पास फोन आया। वे पूछ रही थीं, “बेटा गाड़ी में ऐसी कौन सी चीज लगती है, जिससे कहीं आते-जाते वक़्त बीच रास्ते में कहीं रुकना नहीं पड़ता।” उनकी बात सुनकर समझने में मुझे थोड़ा समय लगा। इस बीच उन्होंने जैसे ही बताया कि रास्ते में “सबकी गाड़ियाँ बिना रुके निकल जाती हैं, पर हमारी रुकी रहती है”, तो बात तुरन्त मेरी समझ में आ गई।&nb
अख़बारी दफ़्तर में शनिवार-इतवार को अमूमन काम कुछ कम ही हुआ करता है। विशेष तौर पर अगर कोई घटना-दुर्घटना न हो ताे। लिहाज़ा, इसी शनीचर की रात फ़ुर्सत के पलों में बैठे-ठाले मैं कुछ कड़ियाँ जोड़ने की कोशिश कर रहा था। ये कड़ियाँ बीते दो-तीन महीनों में मेरी नज़रों के सामने से गुजरी थीं। सो, अपने ज़ेहन की तस्वीरों को थोड़ा उल्टा घुमाया तो पाया कि कड़ियाँ आपस में पहले ही जुड़ी हैं। बस, नज़र नहीं गई थी। एक शीशेनुमा महीन धागे ने उन्हें आपस में जोड़ रखा था। उस पर अब जबकि मेरी नज़र ठहरी तो ख़ुद का अक़्स दिखने लगा। सुन्दर क़तई नहीं था वह। इसलिए एकबारगी लगा कि इस कहानी को यूँ ही बिना ना
भारतीय संस्कृति में समस्त विद्याओं का स्रोत यानि पैदा होने का स्थान वेद को माना जाता है। इसीलिए यह निश्चित है भारतीय दर्शन का मूल भी वेद ही हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक स्तर पर अत्यधिक उन्नत संस्कृति रही है। कारण शायद ‘भौतिक समृद्धि’ रहा होगा। जब पेट भरा हो, तब भजन ठीक से होता है। भोजन से तन की भूख शान्त होती है। भजन मन की भूख शान्त करने के लिए किया जाता है। जब मन की भूख शान्त होती है, तो आत्म यानि स्वयं को जानने की भूख पैदा होती है। बस, यहीं से दर्शन की उत्पत्ति शुरू हुई होगी।
#अपनीडिजिटलडायरी पर पढ़ा... “झुकन झुकन से जानिए, झुकन झुकन पहचान। तीन जनें जादा (ज़्यादा) झुकें, चीता चाेर कमान।”
बढ़िया लिखा है... और जो लिखा गया है, मौज़ूदा लोक-व्यवहार में एक हद तक सही भी है।
पर दूसरा पहलू इसका उल्टा भी है - वृक्ष जब फलों से लद जाता है तो झुकता है
शायर भी कहते है, "यक़ीनन उसका क़द आपसे बड़ा रहा होगा। वो शख़्स जो आपसे झुककर मिला होगा।"
तीसरा पहलू भी है। कवि/शायर दुष्यन्त कुमार लिखकर गए हैं, “ये सारा ज़िस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा। मैं सज़दे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।”