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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है...

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 12/6/2021 - शनि, 06/12/2021 - 23:24

देवास के जवाहर चौक में एक ही बड़ी सी दुकान थी झँवर सुपारी सेंटर। मंगरोली सुपारी वहीं मिलती थी, जिसे काटो तो नारियल जैसी लगती थी। घर में एक सरोता था जिसकी धार कुन्द हो चुकी थी। माँ को आदत थी, सुपारी खाने की। एक बैठक में आधी सुपारी खा जाती थीं। एक बार उसी सरोते से मैं भी सुपारी काटने लगा। उंगली कट गई, खून बहने लगा। घबराए तो सब थे, मैं भी, पर डरा नहीं था। 

तस्वीर (साभार)

बिहार की इस बेटी को एक कड़क सैल्यूट तो बनता है

By टीम डायरी, 11/6/2021 - शनि, 06/12/2021 - 00:06

उसने एक बँधी हुई छवि को तोड़ा है। जिस समुदाय में लड़कियों की शिक्षा ही विवाद का विषय हो जाया करता है, उसी समाज से निकलकर उसने पढ़-लिखकर ऊँचा मुकाम हासिल किया है। नाम- रज़िया सुल्ताना। बिहार की पहली मुस्लिम महिला उप-पुलिस अधीक्षक। 

"अपने प्रकाशक खुद बनो", बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 8/6/2021 - बुध, 06/09/2021 - 00:08

भगवन बुद्ध ने दु:ख को पहला सत्य बताया। बड़े अद्भुत हैं बुद्ध। बहुत लम्बी-चौड़ी बात नहीं करते। एक शब्द में बता दिया कि समस्या क्या है। 

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हम भोजन को भगवान मानते हैं और रोज उनका तिरस्कार करते हैं!

By टीम डायरी, 7/6/2021 - मंगल, 06/08/2021 - 00:28

उसका घर कॉलोनी के नुक्कड़ पर है। सामने तीन तरफ़ जाने वाले रास्ते तिकोने से जुड़ते हैं। वहीं एक तरफ़ उस रिहाइश (कॉलोनी) का दरवाज़ा है। उसके घर के बाहरी चबूतरे से चिपका हुआ। उस दरवाजे का, घर के सामने वाला जो पल्ला है न, उसके ठीक पीछे एक पत्थर की फर्शी रखी है। गन्दे नाले का एक उधड़ा सा मुँह बन्द करने के लिए। मगर अज़ीब-व-गरीब हाल ये कि वह फर्शी गन्दे नाले का मुँह तो बन्द कर देती है लेकिन रईस दिमागों की गन्दगी को रोज़ ही उघाड़ दिया करती है।

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खुशी, कुछ सीखो अपनी बहन परेशानी से!

By टीम डायरी, 6/6/2021 - सोम, 06/07/2021 - 00:06

एक छोटी सी कविता। बड़ा सा विचार। ये बताता है कि ख़ुशी की तलाश में भटकते हम दरअसल उसे अपने नज़दीक देख नहीं पाते। महसूस नहीं कर पाते।

बड़ी-बड़ी चीजों में उसे ढूँढ़ते रहते हैं। पूरी ज़िन्दगी इस तलाश में खपा देते हैं। लेकिन जब भी कभी मिलती है तो बेहद छोटी-छोटी सी चीजों में। कम वक़्त के लिए।

जब भी मिलती है तो छोड़ने का मन नहीं होता। लेकिन बड़ी चीजों में तलाशने का हमारा भ्रम, दुविधा और मृगतृष्णा हमेशा उसे हमेशा हमसे दूर ले जाता है।

और हम... बस, तलाशते रह जाते हैं। सहेज नहीं पाते।

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रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 5/6/2021 - शनि, 06/05/2021 - 19:40

रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है। चाहे नरम धूप हो या कड़क। सब देह को ही सहना है। धूप जब भीतर आत्मा तक छनकर पहुँचेगी तो हम छाँव की तलाश करेंगे। किसी घनी छाया वाले पेड़ के नीचे जाएँगे। वह मौलश्री का हो, बबूल या देवदार का। छाया का कोई रंग नही होता। धर्म और विश्वास तो बिल्कुल नहीं। 

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क्या हम पर्यावरण जैसे विषय पर इतने गैर-ज़िम्मेदार हैं?

By टीम डायरी, 5/6/2021 - शनि, 06/05/2021 - 01:05

जूही चावला अपने समय की लोकप्रिय अभिनेत्री हैं। उन्होंने अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। समाजसेवी, स्तम्भकार वीरेश मलिक और टीना वाचानी भी उनके साथ थे। याचिका में एक अहम मसला उठाया गया। दूरसंचार क्षेत्र में 5जी तकनीक के परीक्षण का। इस तकनीक के फ़ायदों पर जितनी चर्चा है, उतनी ही पूरी दुनिया में इसे लेकर आशंकाएँ भी तमाम हैं। याचिका में बताया गया कि बेल्जियम ने ब्रशेल्स शहर में इस तकनीक के परीक्षण पर अप्रैल-2019 में रोक लगा दी थी। वहाँ की संसद ने इसी साल पांच मई को फिर इस मसले पर विचार किया और 5जी तकनीक के परीक्षण की अनुमति न देने का निर्णय किया। ऐसे ह

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बुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 1/6/2021 - मंगल, 06/01/2021 - 21:06

भगवान बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपनी बात सुनने के लिए मना लिया। तथागत ने उन्हें समझाया। उनकी रुचि देख जो पहला उपदेश दिया वह धर्मचक्र प्रवर्तन ( संयुक्त निकाय 55।2।1 बुद्धचर्या ) कहलाया। 

उन्होंने कहा : भिक्षुओ, दो अतियों का सेवन नहीं करना चाहिए।

भिक्षु : वे कौन-सी हैं?

बुद्ध : प्रथम अति है  हीन, ग्राम्य तथा पृथक्जनों के योग्य, अनार्य, अनर्थों द्वारा सेवित, काम-वासनाओं द्वारा प्रेरित काम-सुख में लिप्त नहीं रहना चाहिए।

भिक्षु : और दूसरी अति कौन सी है?

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हिन्दी पत्रकारिता और पत्रकारों से जुड़े संयोग-दुर्योग की कहानी!

By नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश से; 31/5/2021 - मंगल, 06/01/2021 - 02:36

ये सिर्फ़ दो-तीन मिसालें ही हैं। लेकिन शुरुआत से अब तक हिन्दी पत्रकारिता और उसके पत्रकारों के साथ लगभग स्थायी भाव से जुड़े संयोग-दुर्याोगों की मुकम्मल कहानी कहती हैं। एक-एक कर इन्हें समझने-देखने की कोशिश करते हैं।

1. उदन्त मार्त्तण्ड, नारद जयन्ती और तथ्यों का घालमेल :

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बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 29/5/2021 - शनि, 05/29/2021 - 21:34

अड़सठ घाट भीतर हैं। कहाँ जाना है? न गंगा, न यमुना, सुमिरन कर ले मेरे मना, मन चंगा तो कठौती में ही गंगा है। बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं। इसी घट अन्तर और बाग-बगीचे हैं पर भागना रुक नहीं रहा है। सोचने-समझने को तैयार नहीं हैं।

हमने कन्दराओं में बैठे साधु देखे। जमीन की तलहटी में ईश्वर। पहाड़ों पर देवियाँ। नदियों की धार में साक्षात प्रकृति की लीला। समुद्र का रौद्र रूप। आसमान से बरसता नेह और आग भी। चमत्कारों के बीच अपने पैदा होने को भी प्रारब्ध माना। जब मौत की आगोश में समाए तो शाश्वतता और क्षणभंगुरता भी समझ आई।

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