ये तस्वीर अपने आप में बहुत कुछ कहती है। वाराणसी की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र। शहनाई का दूसरा नाम कहे जाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ जैसे भारत-रत्नों की कर्मभूमि। जन्मभूमि। संगीत, कला, साहित्य, संस्कृति का धाम। बाबा विश्वनाथ की काशी।
ऐसे और न जाने कितने तमगे हैं इस शहर कन्धों पर। इसीलिए कम से कम इस शहर से तो ऐसी तस्वीर की अपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए। लेकिन यह स्याह हक़ीक़त है। हर बारिश में उधड़कर ऐसे ही सामने आ जाया करती है।
बुद्ध होने के लिए इच्छाओं को त्यागना पड़ता है। यह त्याग अत्यधिक कठिन है। इस त्याग को, इस निरोध को मोक्ष का मार्ग भी कहा गया है।
"क्षणिकाः सर्व संस्कारा इत्येवं वासना यका। स मार्ग इह विज्ञेयो निरोधो मोक्ष उच्यते"।। ( षड्दर्शन समुच्चय, बौद्ध मत कालिका 7) अर्थ- समस्त संस्कार अर्थात पदार्थ क्षणिक हैं, इस क्षणिक भावना को, मार्गतत्त्व को और विषय भोगों के प्रति रागादि को, वासनाओं के नाश को, निरोध अर्थात मोक्ष कहते हैं।
रास्ते थे, सड़के थीं, नदियाँ, पहाड़, हवाई किलों से गुजरने वाले पथ और चलने वाले असंख्य पाथेय, जो अपनी-अपनी छाप देकर वहाँ चले गए हैं, जहाँ की आबादी आज की धरती पर बसे इन ज़िन्दा लोगों से बहुत-बहुत ज्यादा है। सक्षम, दक्ष और अनुभवी है। बस इतना है कि वे सब सदैव के लिए चुप हो गए हैं। उनके नामों का डंका जरूर आज भी गाहे-बगाहे लोग पीट लेते हैं पर उनमें से कोई आज हुँकार नहीं भरता।
आज संत कबीरदास जी की जयन्ती है। ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा तिथि। सन् 1398 में कबीरदास जी का जन्म हुआ, ऐसा बताया जाता है। मतलब आज से लगभग 623 बरस पहले। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद कबीर आज भी प्रासंगिक हैं। दो-दो, चार-चार लाइनों के छन्द और दोहों में वे सब जो कह गए हैं। जीवन के निचोड़ बता गए हैं। कोरोना के इस कालखंड में (वीडियो में कही जा रही) उनकी इस रचना को ही लें। हर शब्द, हर लाइन हथौड़े की तरह हम पार चोट करती है। हमें झिंझोड़ती है। हमारी आँखें खोलने की कोशिश करती है। जीवन का सबसे बड़ा सच दिखाने का प्रयास करती है।
त्यागना। इसे सामान्य भाषा में हमेशा के लिए किसी चीज को छोड़ देना कह देते हैं। जैसे दान देना भी त्याग है। वैसे, अक्सर हम धन त्यागने को ही असल त्याग मान लेते हैं। क्योंकि शायद धन ही ऐसी वस्तु है, जिसे छोड़ना सबसे कठिन है। अन्य चीजें त्यागना सरल है पर धन त्यागना बहुत कठिन। किसी ने कहा भी है, ‘चमड़ी जाए, दमड़ी न जाए।’ पर आधुनिक समाज में और भी बहुत सी चीजें त्यागी जा रही हैं। जैसे कि बुजुर्ग माता-पिता। महज़ अनुकूलता के लिए उनका त्याग कर दिया जाता है। हालाँकि आज व्यक्ति के परिवार में माता-पिता के अलावा और कोई रिश्ता-नाता होता नहीं। फिर भी
बीते छह सालों की तरह इस सातवें साल भी 21 जून को दुनियाभर में ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के आयोजन हुए। ख़ूब तस्वीरें दिखीं। तरह-तरह के आसन, प्राणायाम आदि करते हुए आम से ख़ास तक सब नज़र आए। बड़ा आयोजन-अवसर है तो ज़ाहिर तौर पर ऐसे अन्य मौकों की तरह बधाई, शुभकामना सन्देशों का भी खूब आदान-प्रदान हुआ। लेकिन योग जैसे इस अति-आवश्यक और अति-महत्त्वपूर्ण विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ क्या? शायद नहीं। ज़रूरत ही नहीं समझी गई इसकी सम्भवत:। पर विचार-विनिमय होना चाहिए था। हम यहाँ वही कर रहे हैं।
किसी ने वॉट्सएप पर एक सन्देश भेजा। पढ़ते ही इतना प्रासंगिक और सत्यपरक लगा कि मैंने इसे तुरन्त #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करने का निर्णय ले लिया। क्योंकि ‘डायरी’ धीरे-धीरे सही, पर ऐसी स्वस्थ, रोचक-सोचक, प्रेरक और सरोकार से पूर्ण सामग्री के प्रसार का जरिया बन रही है। तो ‘डायरी’ के पाठक भला क्यों इससे वंचित रहें। सन्देश कुछ इस तरह है...
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शोर में बहुधा एकांत छिन जाने का खतरा रहता है। पर कुछ शोर मन को बहुत भाते हैं। मसलन- चिड़ियों की चहचहाट, टिटहरी की चीख, मुंडेर पर कौवों का क्रन्दन, नदियों में उद्दाम वेग से बहते पानी का कलकल भरा आलाप, समुद्र में चिंघाड़ भरती लहरों का शोर। किसी शंख को कान में लगाकर देर तक अनहद नाद को सुनना। जंगल में किसी सूनी पगडंडी से गुजरते हुए पत्तियों और झूमती मदमस्त शाखाओं का संगीत। मंडला (मध्य प्रदेश का शहर) में गोंड राजा के किले में असंख्य चमगादड़ों का शोर, जो उजालों से घबराकर सदियों से एक कमरे में भटक रहे हैं। पहाड़ों के उत्तुंग शिखर पर चढ़ते हुए पत्तों और घास की सरसराहट या अपने कम
भगवान बुद्ध दुःख के कार्य-कारण बताते हैं। इसमें दुःख समुदाय, यह दूसरा आर्यसत्य है। दुःख है तो दुःख के कारण भी होते ही हैं। इन कारणों को तृष्णा के नाम से भी जाना जाता है। यह तृष्णा किसी भी प्रकार की हो सकती है। धन की, भोग की, प्रसिद्धि की या अन्य कई तरह की। धर्म-पालन की भी हो सकती है।
मामला पूरी तरह निजी है। फिर भी विचार के लिए एक रोचक विषय है और सोचक यानि सोचनीय भी। क्योंकि इसी तरह के मामले अक्सर समाज में वैमनस्य और भेद के भाव का कारण बनते हैं। लेकिन पहले इस विमर्श का जो घटना आधार बनी, उस पर एक नज़र डाल लेते हैं।