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संघर्ष और साधना की ये कहानी सिर्फ़ सिद्धू की नहीं, शख़्सियत बने हर शख़्स की ह्रै

By ज्योति प्रकाश त्यागी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 28/5/2021 - शनि, 05/29/2021 - 00:19

नवजोत सिंह सिद्धू। भारतीय क्रिकेट की दुनिया में धाकड़ बल्लेबाज के तौर पर जाना-पहचाना नाम। फिर जब क्रिकेट की दुनिया छोड़ी तो वक्तृत्व कला (Art of Oratory) के क्षेत्र में उससे भी बड़ा नाम। राजनीति में आए तो उसमें भी पीछे की बेंच पर नहीं ही दिखे।

लोग अक्सर उनके ये कारनामे देख चौंकते हैं। पूछते हैं- कैसे कर पाए इतना कुछ? हर किसी के वश में तो नहीं होता? कोई एक जन्म में किसी एक क्षेत्र विशेष को ही अच्छी तरह साध ले, वही बड़ी बात है?

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

तेज गए तो भटक जाओगे, धीरे गए तो पहुँच जाओगे!

By टीम डायरी, 27/5/2020 - शुक्र, 05/28/2021 - 00:39

आचार्य रजनीश ‘ओशो’ के प्रवचनों का हिस्सा है, ये ऑडियो। एक बौद्ध कथा के जरिए वे बता रहे हैं, ‘तेज गए तो भटक जाओगे, धीरे गए तो पहुँच जाओगे।’

वे ध्यान दिला रहे हैं कि अगर हमें कुछ साधना है तो हमारी गति धीमी होनी चाहिए। क्योंकि तेज गति से हम सिर्फ़ क्षणभंगुर भौतिक सुख-सुविधाएँ, पद, पैसा आदि ही हासिल कर सकते हैं। सुख और शान्ति नहीं। आनन्द नहीं। 

एक और उदाहरण देते हुए वे कह रहे हैं, अगर बड़े पेड़ की तरह कद हासिल करना है, अपनी छाँव में जीवों को आसरा देना है, उन्हें मधुर फल देना है, सालों-साल टिके रहना है, तो धीरे-धीरे बढ़ना होगा। एकदम फर्राटे से नहीं। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध का पुनर्जन्म और धर्मचक्रप्रवर्तन

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 25/5/2021 - मंगल, 05/25/2021 - 23:20

वन में वैशाख पूर्णिमा को जन्मा राजकुमार फिर वन की तरफ चल दिया। पुनः जन्म लेने हेतु। वह राजगृह के घने वनों में भटकता रहा। पहाड़ियों की गुफ़ाओं में ध्यान, तप और अध्ययन करते हुए समय व्यतीत किया। कुछ समय आलार कालाम सन्यासी के पास रहे। उसके बाद उद्रक नामक सन्यासी से हिन्दू धर्म दर्शन की शिक्षा प्राप्त की। उद्रक ने सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा प्रदान की थी। लेकिन इससे सिद्धार्थ को मानसिक शान्ति नहीं मिली हृदय को सन्तोष न मिला।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

चरित्र जब पवित्र है, तो क्यूँ है ये दशा तेरी?

By टीम डायरी, 23/5/2020 - सोम, 05/24/2021 - 00:03

साल 2016 में एक फिल्म आई थी, ‘पिंक’। समाज में महिलाओं की व्यथा, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष को दिखाती एक कहानी। इसी फिल्म में एक कविता थी, ‘तू चल, तेरे वज़ूद की समय को भी तलाश है’। इन ख़ूबसूरत लब्ज़ों को अपनी कलम से कागज़ पर उतारा था, गीतकार तनवीर ग़ाज़ी ने। जबकि आवाज़ दी थी, हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे की हैसियत पा चुके अमिताभ बच्चन ने। 

लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 22/5/2021 - शनि, 05/22/2021 - 19:53

यहाँ आसमान में कड़क बिजलियाँ चमक रही है। बादलों की गड़गड़ाहट में किसी की आवाज सुनाई नहीं देती। बरसात की बूंदें बड़े ओलों के रूप में गिर रही हैं। 

खेतों में गेहूँ कटा पड़ा है। चना मुस्तैदी से खड़ा है। सेम से लेकर बाकी सब्जियाँ झूम रही हैं। लेकिन काले बादल देखकर किसान की आँखें रो रही हैं। वह खेत मे बिजूका बनकर रह गया है, बस।

ये पंछियों की चहचहाहट नहीं, समय का गीत है

By दीपिका शर्मा, नीमराना, राजस्थान से, 21/05/2021 - शुक्र, 05/21/2021 - 18:22

ये राजस्थान के एक गाँव का दृश्य है। सवेरा अभी हुआ नहीं है। बस होने को है। यह सूर्योदय से ठीक पहले की वेला है। मई का महीना है। लेकिन ‘ताऊ ते’ तूफ़ान का कुछ असर है। इससे बेख़बर कि इसने हज़ारों घर तबाह किए हैं और सैकड़ों जानें भी ली हैं। यहाँ दो दिन से लगातार बारिश हो रही है। इसलिए मई की बीती तारीख प्रदेश में 10 साल की सबसे कम गर्म रही। ये और बात है कि प्रदेश में अग्रणी और देश का नम्बर-एक अख़बार होने का दावा करने वाला समाचार पत्र मई को सबसे ठंडी कह देता है। अख़बार के पहले पन्ने पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी यह बात पढ़कर मैं अपनी हँसी नहीं रोक पाती हूँ। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

सिद्धार्थ के बुद्ध हो जाने की यात्रा की भूमिका कैसे तैयार हुई?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 18/5/2021 - बुध, 05/19/2021 - 00:14

लगभग 2,600-2,700 वर्ष पूर्व भारत-भारती पर भासमान भास्कर का उदय हुआ। उसने भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित किया। यह सूर्योदय कपिलवस्तु के सिंहासन पर बैठने वाले परमसौभाग्यशाली राजा शुद्धोधन के राजमहल में हुआ। महाराज शुद्धोधन अपनी बड़ी रानी को प्रसव पूर्व रीति के अनुसार उनके पिता के घर (मायके) भेजते हैं। परन्तु मार्ग में ही लुम्बिनी नामक वन्य क्षेत्र में पुत्र का जन्म हो जाता है। वह तेजस्वी बालक जन्म के सात दिन बाद ही मातृछाया से वंचित हो जाता है। बालक का लालन-पालन उसकी विमाता करती हैं। तेजस्वी बालक का राशि नाम गौतम रखा गया। लोकप्रसिद्ध नाम- राजकुमार सिद्धार्थ।

योगेश बलवानी, गौरव बजाज

‘आयुष्मान् भव’ या ‘आयुष् मा भव’ यानि ‘चिरायु हों’ अथवा ‘चिरायु न हों’?

By टीम डायरी, 17/5/2021 - सोम, 05/17/2021 - 01:24

ये पहला वीडियो मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के ‘आम शख़्स’ योगेश बलवानी का है। और दूसरा शहर के बड़े ‘ख़ास अस्पताल’ चिरायु के प्रबन्धक गौरव बजाज का। ये अस्पताल इतना ख़ास है कि जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके जैसे दूसरे बड़े सत्ताधारी विशिष्ट जन कोरोना संक्रमित होते हैं, तो यहीं का रुख़ करते हैं। फिर ठीक होकर लौटते भी हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है!

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 15/5/2021 - शनि, 05/15/2021 - 23:16

एक संतरा सामने है, एक सेवफ़ल, एक बड़ा सा पपीता, एक कीवी, कुछ बेर रखे हैं। मैं सोचता हूँ कि आज भोजन न करूँ। इन चीज़ों से अपनी क्षुधा मिटाऊँ। आम का मौसम नहीं है। इसलिए थाली से आम गायब है। केले बाजार में बहुतायत में है पर मुझे पसंद नहीं। उनकी तासीर मेरे जिस्म से मेल नही खाती। अमरूद मौसम में बहुत खाए और अब जामुन का इन्तज़ार है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

विवादित होने पर भी चार्वाक दर्शन लोकप्रिय क्यों रहा है?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 11/5/2021 - मंगल, 05/11/2021 - 22:58

इस श्रृंखला में ‘चार्वाक दर्शन’ की यह अन्तिम कड़ी है, ऐसा विचार कर चार्वाक दर्शन के विषय में संक्षेप में कुछ बातें रखने का प्रयास करते हैं।

भारतीय मत में ज्ञान का आदि स्रोत वेद है। इसमें सभी के सूत्र हैं, ऐसी मान्यता है। इसलिए शुरू वेद से ही करते हैं। 

चार्वाक भौतिक सुख की कामना को महत्त्वपूर्ण मानते हैं इस भौतिक उन्नति के लिए वेद में अनेकानेक मंत्रों में प्रार्थना की गई है।

अथर्ववेद का 19/71/1 मंत्र है :

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