दिल्ली। साल 2021, मई का महीना, 10 तारीख। बीती रात बारिश हुई है। इसे बारिश कहना गलत होगा। बादलों ने धधकती दिल्ली के कलेजे पर थोड़ा पानी डालकर उन्हें ठंडा करने की कोशिश की है शायद। अख़बारों में मौसम, मानसून की ख़बरें एक या दो कॉलम में दिख जाती हैं। अभी सवेरे हवा चल रही है। हवा में ठंडक है। लेकिन ये हवा पहली बार कुछ अलग-सी महसूस हो रही है। गोया इसमें कोई चीत्कार समाया हो।
सामने एक मराठी परिवार था, जिसमें एक बुजुर्ग साथ रहते थे। बाद में मालूम पड़ा कि वे अकेले ही थे। जीवन संग्राम अकेले ही लड़ते रहे और अपना जीवन परिजनों के सुख के लिए समिधा बना दिया। एक कड़कती बरसात की रात में देह छोड़ गए। अगले दिन सुबह जब हम सब लोग भीगते हुए श्मशान पहुँचे। सूखी लकड़ियों पर देह रखी। लेकिन शाम तक वह जल नहीं पाई। आख़िर अधजली देह को छोड़कर आ गए। कहते हैं, जो जीवन में अकेले रह जाते हैं, उन्हें अन्तिम समय में जलाने से अग्नि देव भी मना कर देते हैं।
देश के जाने-माने चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता प्रभु जोशी जी ने इसी चार मई को हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं। वे कोरोना संक्रमित थे। लेकिन जाने से पहले से अपने इस वीडियो के जरिए भाषायी सरोकार पर हमारी आँखें खोलने का प्रयास भी कर गए। वे बता गए कि कैसे हमारी राष्ट्र भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को ख़त्म करने की मानो कोई साज़िश हो रही है। और हम उस साज़िश में जाने-अनजाने हिस्सेदार बन रहे हैं। साथ ही हमें चेता गए कि अगर हम आज सचेत नहीं हुए तो सम्भवत: कल को हमारी पहचान का संकट भी हमारे सामने उपस्थित हो सकता है।
भौतिक उन्नति करना यानि आज के सन्दर्भ में कहें तो पैसा कमाना। सामान्य तौर पर इसे बुरा नहीं माना जाता। लेकिन हमें यह पता होना चाहिए कि जीवन का उद्देश्य क्या है। अन्यथा हम मानव नहीं रह जाते। मात्र एक जीवरूप रह जाते हैं, जो पेट भरता है। चाहे इस पेट के लिए किसी की जान ही क्यों न लेनी पड़े। कहीं-कहीं हम मानवत्व से गिरकर राक्षसत्व तक पहुँच जाते हैं, इसके लिए। यह होता कब है? जब हम केवल भौतिक उन्नति की तरफ अग्रसर रहते हैं। चार्वाक के अनुयायी अक्सर यही करते हैं। केवल भौतिक उन्नति को ध्येय मानकर अपने जीवन को कहीं न कहीं दुःख के गर्त धँसा लेते हैं।
पानी नीला था, पानी नदी में था। नदी धरती पर थी, धरती पर पेड़ थे। पर पेड़ हरे-भरे थे। धरती के ऊपर एक आसमान था। आसमान नीला था। आसमान में पक्षी जो उड़ते थे, वे रंग-बिरंगे थे। कोई काला, कोई नीला, कोई हरा, कोई बैगनी, कोई जामुनी, कोई लाल और कोई-कोई इन सब रंगों से मिला-जुला हुआ करता था। सभी पक्षी छत के ऊपर से निकलते तो मेरे आसमान का नीला रंग छुप जाता। उनकी छाँह पानी में नजर आती तो पानी का नीला रंग भी छुप जाता।
वक़्त मुश्किल है। एक अदृश्य दुश्मन (कोरोना) है, जिसने मानवता के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है। हमारे घरों में घुसकर हमारे अपनों को वह हमसे छीन रहा है। व्यवस्थाएँ पस्त हैं और अव्यवस्थाएँ मस्त। पूरा माहौल निराशाजनक है।
लेकिन वास्तव में यही हमारे लिए परीक्षा की घड़ी है। घनघोर निराशा के अन्धकार में भी हमें अपने आप पर यक़ीन करना होगा। ईश्वर पर भरोसा रखना होगा। ये मानना होगा कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। उम्मीद का दीया जलाए रखना होगा।
अभी 22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ था। यह पहला अवसर है, जब पूरी दुनिया के ‘मानव’ एक ही समय में एक जैसी महामारी से पीड़ित है। और इससे बड़े आश्चर्य की बात है कि यह महामारी मानव को छोड़कर अन्य समस्त प्राणियों, समस्त प्रकृति के लिए वरदान बनकर आई है।
बात तो पुरानी है, लेकिन आजकल फिर से यही वाक्य सुनने को मिल रहा है तो याद आ गई। और मैं डायरी के पन्ने पर उतारने बैठ गया।
दरअसल, बात उन दिनों की है, जब मैं पार्ट टाइम नौकरी ढूँढ़ रहा था। जहाँ भी जाता, बात होती और सामने से जवाब मिलता, "We will let you know. (हम बताते हैं)" इस तरह, धीरे-धीरे यह वाक्य कुछ दिनों के लिए ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया।
कल दीपक शर्मा जी की 23 तारीख की डायरी पढ़ी। निश्चित रूप से वाराणसी की घटना समेत पूरे देश की समस्या दुखद है। किन्तु इसके लिए केवल राजा ही नहीं बल्कि उसकी प्रजा भी उतनी ही ज़िम्मेदार है।
ऊपर फोटो पत्रकार मित्र ज्ञान त्रिपाठी की तस्वीर अपने आप सारी कहानी कह देती है। हम समय रहते भी नहीं चेते। यह तस्वीर तो शिक्षित समाज की है। बाकी देश का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। गाँवों के हालात के बारे में टुकड़ों में लगातार सोशल मीडिया पर बातें सामने आ रही हैं।
यह भी शुरुआत ही है। लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो गया है। जीवन कुल चार मकानों के इर्द-गिर्द समेट कर रख लिया है मानो। पहली धुँधली स्मृति रज्जब अली खाँ वाले रोड के मकान की है। दूसरी, बजरंग पूरे में हनुमान मन्दिर के सामने वाले मकान की। तीसरी, जच्चा खाने वाले रोड के मकान की। और चौथी, इस स्थायी मकान की, जहाँ से लगता है, अब विदाई का समय करीब आ गया है। जैसे कबीर कहते हैं, "चार जना मिल माथो उठायो और बाँधी काठ की घोड़ी"।