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कुमार गन्धर्व : जिनके गाए ‘निर्गुण’ से गुण-अवगुण परिभाषित कर पाता हूँ!

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 8/4/2021 - शुक्र, 04/09/2021 - 00:00

भारतीय मनीषा, विलक्षण संगीतकार और महान गायक पंडित कुमार गंधर्व का आज जन्मदिन है। कर्नाटक से मालवा के देवास में आ बसे। फिर यहीं जीवनभर संगीत और सुरों की आराधना करते रहे। आज उनके गाए कबीर को सुनकर ही मेरे जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं। उन्हीं के निर्गुण (भजन) से जीवन में गुण-अवगुण को परिभाषित कर पाता हूँ। उन्हीं से सीखा है, "जब होवेगी उमर पूरी, तब टूटेगी हुकुम हुजूरी। उड़ जाएगा हंस अकेला।"

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा!

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 7/4/2021 - बुध, 04/07/2021 - 16:59

पूरा जीवन राय बनाने में, विचारों को संश्लित करने में, सघन अनुभूतियों की जमीन को उर्वरा बनाने में ही निकलता नज़र आ रहा है। यह प्रक्रिया उस एकांत से बार-बार गुजरी, जिसने एक बड़ी समझ बनाने में मदद की पर जब भी कहीं कुछ दिखा, लगा और भीतर से महसूस किया तो तन-मन शीतल न हो पाया। एक अगन में, ज्वर में भावनाएँ उफनती रहीं और अपनी समझ से कुछ कह दिया।

पंडित रविशंकर, एक प्रेरक शख़्सियत, जिसने ‘ज़िन्दगी’ को थामा तो उसके मायने बदल दिए

By नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से 7/4/2021 - बुध, 04/07/2021 - 13:31

पंडित रविशंकर आज 101 साल के हो गए। ऐसा इसलिए कहना ठीक है, क्योंकि उनके जैसे लोगों की सिर्फ़ देह ही दुनिया छोड़ती है। शख़्सियत यहीं रह जाती है, हमेशा के लिए। पर एक समय शायद ऐसा भी आया था, जब उनकी शख़्सियत ने इतना बड़ा आकार नहीं लिया था। उसके निर्माण का क्रम चल रहा था कि तभी एक दिन रबीन्द्र शंकर चौधरी (पंडित रविशंकर का शुरुआती नाम) ‘ज़िन्दगी’ छोड़ने चल दिए थे। 

आचार्य चार्वाक के मत का दूसरा नाम ‘लोकायत’ क्यों पड़ा?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 6/4/2021 - मंगल, 04/06/2021 - 12:39

भरत अपने ननिहाल से वापस अयोध्या पहुँचते हैं। अयोध्या में स्थितियाँ बहुत विकट थीं। एक तरफ राज सिंहासन प्रतीक्षा कर रहा था। दूसरी तरफ पिता की मृत्यु और अग्रज के वन गमन के दुःख से हृदय संतप्त था। किसका चयन करें। धर्मज्ञ भरत अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप  पुत्रधर्म के निर्वाह के बाद दलबल के साथ श्रीराम को मनाकर वापस लाने निकल पड़ते हैं। श्रीराम के पास पहुँचकर मनाने के क्रम में ऋषि जाबालि श्रीराम से कहते हैं, “आप व्यर्थ वन जा रहे हो। मृत्यु के साथ सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। अब दशरथ आप के पिता नहीं हैं, न आप उनके पुत्र (वाल्मीकिविरचित रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग-108 श्

क्या हम प्रतिभाओं को परखने में गलती करते हैं?

By ज्योति प्रकाश त्यागी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 5/4/2021 - सोम, 04/05/2021 - 23:25

क्या हम प्रतिभाओं को परखने में, उनका आकलन करने में गलती करते हैं? मेरे दिमाग में यह सवाल अक्सर ही आता है। बीते दो-ढाई दशक से बच्चों को क्रिकेट का प्रशिक्षण देने के दौरान ऐसे तमाम वाक़ये पेश आए हैं, जब बार-बार यह सवाल ज़ेहन में उभरा। और अभी जब किसी मित्र ने वॉट्सऐप पर मुझे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ का कथन (Quote) भेजा, तो सवाल फिर जीवन्त हो उठा।

जयन्ती विशेषः अपने प्रिय कवि माखनलाल चतुर्वेदी की याद और पुष्प की अभिलाषा

By आकाश कुमार सिंह, छपरा, बिहार से, 04/04/2021 - रवि, 04/04/2021 - 16:42

आज फेसबुक स्क्रॉल करते हुए ‘डायरी’ की एक पोस्ट सामने आ गई। पोस्ट में एक सुन्दर तस्वीर पर माखनलाल चतुर्वेदी जी की कविता लिखी थी। ‘पुष्प की अभिलाषा’। उसी से याद आया कि आज माखनलाल चतुर्वेदी जी की जयन्ती है। वरना हम भूल चुके हैं अपने कवियों, लेखकों और समाज के वास्तुकारों को। साथ ही ताज़ा हो गईं इस कविता से जुड़ी कुछ पुरानी यादें। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

निर्मल वर्मा की जयन्ती और एक प्रश्न, किताबों से बड़ा ज्ञान या ज्ञान से बड़ी किताबें?

By टीम डायरी, 3/4/2021 - शनि, 04/03/2021 - 14:24

किताबें ज्ञान का स्रोत हैं या फिर ज्ञान किताबों के सृजन का माध्यम? इस प्रश्न पर विचार का भरा-पूरा कारण दिया है इस कविता ने। प्रश्न के मद्देनज़र इस कविता की हर लाइन गौर करने लायक है।  

रंगपंचमी, सूखे रंग और कैनवास पर रंगोली!

By संदीप नाईक, देवास मध्य प्रदेश से, 2/4/2021 - शुक्र, 04/02/2021 - 14:30

मराठी संस्कृति वृहद और समृद्ध है। इसके कई अच्छे गुणों में संस्कार से लेकर खान-पान, पहनावा और घर परिवारों का रखरखाव भी महत्वपूर्ण है। इसके लिए कल्पना और अभिव्यक्ति की बहुत ठोस जरूरत होती है। महिलाओं ने इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया है। बल्कि इसे अक्षुण्ण बनाए रखा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना...फिर याद आता उसे अपना कमरा

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 31/3/2021 - बुध, 03/31/2021 - 18:23

उजालों में अँधेरे देखने का आदी था वो। जब दुनिया जागती, उसे लगता कि अब सूरज ढला है। रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना...फिर याद आता उसे अपना कमरा। वह नीली दीवार, गाढ़े नीले रंग में पुती हुई, जो तीसरे माले पर बनी थी। कमरे के ठीक पीछे अपनी नीलाई की रोशनी में पूरी ताकत के साथ ज़िन्दा थी। 

नदी का पानी धरती के इस भू-भाग पर अविचल बह रहा है। निर्बाध और उद्दाम वेग से। वह अदभुत है। पानी में घुटने के नीचे से पाँव के पंजे तेज बहाव में दो-चार मीटर बह जाते। तब लगता कि शरीर का ऊपरी हिस्सा स्थूल और स्थिर न होता तो पानी के साथ पता नही कहाँ से कहाँ पहुँच जाता।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

चार्वाक हमें भूत-भविष्य के बोझ से मुक्त करना चाहते हैं, पर क्या हम हो पाए हैं?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 30/3/2021 - मंगल, 03/30/2021 - 09:45

आचार्य चार्वाक बड़ी सुन्दर बात कहते हैं। उनकी बातें आज वर्तमान युग के एकदम अनुकूल हैं। बल्कि एक विचार तो यह भी हो सकता है कि वर्तमान बैंकिंग प्रणाली में प्रचलित समान मासिक किश्त (EMI) व्यवस्था शुरू करने वाला जरूर चार्वाक का अनुयायी रहा होगा। आज देखें, बैंक हर चीज ईएमआई पर देने को तैयार है। हम भी सब कुछ ईएमआई पर लेकर काम चला रहे हैं। और कोरोना महामारी ने तो हमें अनुभव करा दिया है कि हमारी ज़िन्दगी भी ईएमआई पर ही है। मानो, ईएमआई न भरने वालों से ये महामारी बकाया वसूल रही है, “लाओ वापस करो दी गई साँसे, तुमने

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