उस ज़माने में ओडिशा या उत्कल प्रदेश के राजा हुआ करते थे इन्द्रद्युम्न। भगवान नीलमाधव, यानि श्रीहरि, श्रीकृष्ण के भक्त थे। कहते हैं, उन्हें एक रोज भगवान ने स्पप्न में आकर कहा, ‘समुद्र में लकड़ी का बड़ा लट्ठा द्वारका से बहकर तुम्हारी राजधानी की तरफ़ आ रहा है। तुम उसे मँगवा लो। उससे मेरी मूर्तियाँ बनवाकर मन्दिर में स्थापित करो।” भगवान के आदेश पर राजा ने अपने सैनिकों, सेवकों को समुद्र किनारे भेजा। वहाँ सच में एक लकड़ी का बड़ा लट्ठा उन्हें समुद्र में तैरता हुआ दिखाई दिया। उसे किसी तरह आदिवासियों की मदद से वे उठाकर राजप्रासाद तक लाए।
प्रिय मानसून,
कहाँ हो तुम? तुम्हें मालूम भी है, कब से यहाँ सब तुम्हारी राह देख रहे हैं? अब और देर मत करो आ जाओ। मैंने अख़बारों में तो पढ़ा था कि तुम इस बार जल्दी आ रहे हो। जून तक आ जाओगे। लेकिन यहाँ तो जुलाई भी एक-एक दिन बीतता जा रहा है और तुम्हारी कोई खोज ख़बर ही नहीं।
कल मैंने एक छोटी-सी गुहार लगाई तो तुम एक फुहार देकर लौट गए। फिर ढाक के वही तीन पात।
हम अपने जीवन में लोगों के बारे में धारणाएँ अक्सर बाहरी आवरण देखकर बना लेते हैं। रूप, रंग, वस्त्र के आधार पर व्यक्ति की छवि बना लेते हैं कि वह ऐसा होगा, वैसा होगा। मेरे एक मित्र हैं। वे दो भाई हैं। उनमें छोटा आधुनिक विचारों से युक्त सदैव अद्यतन (Update) रहता है। उसकी दिनचर्या में नियमित जिम शामिल है। वह अपने शरीर की सुडौल बनावट का ख्याल रखता है। खाना ऐसा खाता है, जो शरीर में वसा आदि की मात्रा को न बढ़ने दे।
जब 1982 में तिरुपति बालाजी चढ़े थे, तो पैदल ही चढ़ना होता था। वहाँ बहुत लोगों को कबीट ( कैथा ) के माफिक सर मुँडवाते देखा। हिन्दी बोल रहे थे, तो खूब मार खाई। एक गंजी स्त्री ने उन सबका मुकाबला किया और भीड़ को समझाया था, तेलुगु भाषा में कि बच्चे हैं, जाने दो। हिन्दी, यही इस देश की भाषा है। इसी यात्रा में राष्ट्रपति पुरस्कार लेना था। तत्कालीन मद्रास के यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन (YMCA) के मैदान पर 15 दिन रुककर कैम्प किया था। आने में कन्याकुमारी देखा पहली बार, रामेश्वरम और मण्डपम के बीच खुलने वाला समुद्र किनारे का पुल बना ही था नया-नया। वहाँ के लोगों की हिम्मत कमाल थी। पता नहीं था क
प्राचीन ग्रीस की कहानी है। वहाँ के एक बड़े दार्शनिक हुए हैं, सुकरात। एक बार कोई परिचित उनके पास आए। आते ही बड़ी आतुरता से कहने लगे, “आपको पता है, आपके अमुक दोस्त के बारे में मैंने अभी-अभी क्या सुना है?” इस पर सुकरात ने उनसे कहा, “थोड़ा ठहरिए। इससे पहले कि आप मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताएँ, मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दीजिए।” वे सज्जन बोले, “ठीक है, पूछिए।”
इस पर सुकरात ने उनसे पहला सवाल किया, “क्या आपने मेरे मित्र के बारे में जो सुना, उसके बारे में आपको पूरा भरोसा है कि वह सच है?” ज़वाब में उन्होंने कहा, “नहीं।”
बड़ों की बातें हैं। इसी तरह की होती हैं। सालों पहले कही जाती हैं। सालों बाद तक सुनी जाती हैं। उनकी कीमत कहे जाते वक्त जितनी होती है, सुने जाते समय उससे और अधिक बढ़ जाती है। फिर अगर कहीं गुन ली जाए, तो क्या ही कहने, तब वे बातें किसी भी कीमत की हद पार कर लिया करती हैं।
एक दिन बुद्ध प्रवचन देने के लिए अपने शिष्यों की सभा में पहुँचे। सभी शिष्य यह देख आश्चर्यचकित रह गए कि बुद्ध अपने साथ एक कपड़े का टुकड़ा लेकर आए हैं। जबकि वे हमेशा खाली हाथ आते थे। थोड़ी देर बुद्ध बिना बोले बैठे रहे और चुपचाप उस कपड़े के टुकड़े में गाँठें लगाते रहे। पाँच-छह गाँठें लगाने के बाद शिष्यों से पूछते हैं, “क्या यह कपड़े का वही टुकड़ा है जो गाँठें लगने के पहले था?”
उसके घर के बाहर चबूतरे पर कुछ बच्चे बैठे-ठाले पहेलियाँ बुझा रहे थे। इन्हीं में से एक पहेली थी, “मुर्गी पहले आई या अंडा आया।” पूछने और बताने वाले, दोनों के लिए ही यह पहेली बड़ी मज़ेदार थी। क्योंकि जब कोई कहता कि मुर्गी पहले आई तो अगला बोल उठता, “पर मुर्गी तो अंडे से पैदा होती है।” ऐसे ही, अगर कोई कहता कि अंडा पहले आया तो दूसरे बच्चे उसकी खिंचाई करते, “बुद्धू, अंडे तो मुर्गी देती है। इतना भी नहीं जानता।” फिर सब के सब जोर से ठहाका लगाकर हँसते।
1. इसलिए माँ का स्थान सबसे ऊपर :
कल एक बहुत प्रिय मित्र को एकान्तवास में भेज दिया गया। उनका बेटा भी संग में, इस काल में ग्रसित हो गया। कल ही एक मित्र ने बताया कि मात्र 34 बरस का एक युवा यहाँ भर्ती कर लिया गया है। भोपाल में एक मित्र के माता-पिता अकेले रहते हैं। दिन-रात समाचारों की आँधी से भड़भड़ाकर वे मान बैठे हैं कि काल उनके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है। चलते-फिरते उन्हें लगता है कि कोई कह दे, यह घोषित कर दे कि वे अब ज़्यादा समय रह नहीं पाएँगे। एक मित्र आशंका में अपना सब कुछ खोलकर बैठ गए। बही खातों से लेकर कपड़े और जेवरात भी। घर मे उपस्थित लोगों को बाँट रहे हैं। हाथ की अँगूठी और गले से चेन निकालकर दे दी।