मेरे मित्र के बॉस नेत्रहीन हैं। उनका मानना है कि उनके द्वारा किए गए सभी कार्य सही ही हैं। चाहे वे कार्य दूसरों की नज़र में ग़लत या अनुचित ही क्यों न हो। हमारी नज़र में हम अक्सर सही ही होते हैं। दुर्योधन अपनी दृष्टि से, कहीं से भी स्वयं को अनुचित कैसे बता सकता है। चाहे दुर्योधन के आदेश से भरी सभा में किसी महिला की गरिमा को ही क्यों न चोट पहुँचाई गई हो।
हिन्दी फिल्मों के बड़े अभिनेता अमिताभ बच्चन अक्सर अपने जीवन का एक किस्सा सुनाया करते हैं। वे बताते हैं, “मैं छोटा ही था, जब बाबूजी ने जब मुझे जीवन के एक विचलित मोड़ पर ये सीख दी थी- मन का हो तो अच्छा, न हो तो ज्यादा अच्छा। उस वक्त मेरी समझ में नहीं आया कि जो मन का न हो वो ज्यादा अच्छा कैसे हो सकता है? लेकिन बाद में जब उन्होंने समझाया तो समझ गया कि अगर तुम्हारे मन का नहीं हो रहा है, तो समझो ईश्वर के मन का हो रहा है। और ईश्वर हमेशा तुम्हारा अच्छा ही चाहेंगे, इसलिए ज्यादा अच्छा।”
बड़ी मौज़ूँ है ये कहानी। अभी जब जापान की राजधानी में टोक्यो में ओलम्पिक खेल चल रहे हैं, तब ख़ास तौर पर।
पैदा होने के बाद ग़लत स्कूल में चला गया। वहाँ तीन ग़लत प्राचार्यों और 50-60 ग़लत शिक्षकों ने ग़लत पढ़ा दिया। गणित के बदले जीव विज्ञान विषय गलती से भर दिया प्रवेश फॉर्म में तो भुगतना पड़ा आजतक जीवन में। माध्यमों के खेल में असली खेल सीख ही नहीं पाया कभी। एक दिन जवाहर चौक, देवास में ग़लत जगह खड़े होकर केरल से आए नुक्कड़ नाटक के दल का भोपाल गैस त्रासदी पर नाटक देख लिया और जीवन देखने की दृष्टि ही बदल गई। उस दिन एक गलत बस में बैठा था और वह मुझे उस गाँव ले गई, जहाँ से बदलाव और विकास का नया रास्ता चुना मैंने।
भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परम्परा अगर कहीं अब भी अपने श्रेष्ठ स्वरूप (कुछ अगर-मगर छोड़ दें, तो बहुतायत) में है तो वह या तो आध्यात्म का क्षेत्र है या संगीत का। इसमें संगीत की बात करें तो सालों-साल की साधना से अपनी विधा में जो शिष्य थोड़े पक जाते हैं, वे अक्सर अपनी तैयारी के प्रदर्शन से गुरु/गुरुओं को स्वरांजलि, आदरांजलि दिया करते हैं।
बीते दो-तीन दिनों राज्यसभा के सदस्य प्रोफेसर मनोज झा का सदन में दिया यह भाषण ख़बरिया ( Media) और सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर चल रहा है। चल क्या रहा है, छाया हुआ है। लोग उनके भाषण की तारीफ़ कर रहे हैं। तारीफ़ के काबिल है भी। क्योंकि आजकल के नेताओं से ऐसी उम्मीद कम ही की जाती है कि वे आम नागरिकों की ज़िन्दगी और मौत से जुड़े मुद्दों पर इतनी नज़दीकी संवेदनशीलता से बोलेंगे।
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होए।” यह दोहा हम बचपन से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। लेकिन इसे अपनाते-अपनाते पचपन के हो जाते हैं। फिर भी ठीक से अपना नहीं पाते। कारण? अच्छे या सद्-व्यवहार से बोलना अत्यधिक कठिन है। जो चीजें हमें सरल दिखती हैं, जरूरी नहीं कि वे सरल ही हों। अगर इतनी सरल होतीं तो बुद्ध को ‘सम्यक-वचन’ पालन का उपदेश नहीं देना पड़ता। इस कठिन सरल व्यवहार के परिणाम को इस कहानी से समझते हैं।
इस देश में नेताओं और उनके परिवारों ने छवि इस तरह की बना ली है कि एक बार इस तस्वीर (लेख के साथ दी गई) पर शायद ही किसी को यक़ीन हो। लेकिन यह सच्ची तस्वीर है। सहजता और सादगी की। तस्वीर में दिख रहे दम्पति केन्द्रीय मंत्री एल मुरुगन के माता-पिता हैं। पिता- लाेगनाथन, उम्र 68 साल और माँ- वरुदम्मल, उम्र 59 साल। दोनों तमिलनाडु के नमक्कल जिले में स्थित अपने गाँव कोनुर में रहते हैं। आज से कई बरस पहले जब बेटा (मुरुगन) छोटा था, तब ऐसे ही मज़दूरी किया करते थे। उसे जैसे-तैसे इधर-उधर से कर्ज लेकर पढ़ाया-लिखाया। बेटा होनहार था। जल्द ही अपने पैरों पर खड़ा हो गया। वकील बन गया। राजनीति में कदम रखे और देश के स
अभी किसी से फोन पर बहुत लम्बी बात हुई। आवाज़ों के शोर के पीछे जो आँसुओं का दर्द था, वो मैं महसूस कर पा रहा था। हम दोनों में पिछले दशक से एक अबोला प्रेम था। निश्छल, अबोध और बगैर अपेक्षाओं वाला। हम व्यक्त करने में बहुत समय लेते हैं। इसलिए जब हम किसी को सुनते हैं, तो एकाग्र होकर सुनें और अपनी ओर से कुछ न जोड़ें। बल्कि यदि कहना भी हो तो इतना ही कि बस सामने वाले को लगे कोई है जो सुन-गुनकर मेरे साथ है।
आज फेसबुक की याद गली से गुज़रा तो यादें मिलीं। उसने कमाल की चीज़ याद दिलाई। दो साल के अंतराल की। एक 2018 और दूसरी 2020 की। और इसी अंतराल में छिपा है एक सुखद संयोग। संयोग, दो अलग-अलग बरसों में, दो अलग-अलग शहरों में रहते हुए, दो अलग-अलग पुस्तक पंक्तियों को, दो अलग-अलग सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स से एक ही तारीख को, एक ही लेखक को पढ़ने का। अपने प्रिय कवि गीत चतुर्वेदी को पढ़ने का। और संयोग ही है कि 2021 में इसी तारीख को मैं फिर गीत की दो अलग-अलग पुस्तकों को अपने साथ लिए चल रहा हूँ। बिंज पर गीत ‘उस पार’ बैठे हैं और इधर झोले में ‘अधूरी चीज़ों का देवता’ है। ऐसा बहुत कम होता ह