बुद्ध अपने प्रतीत्य समुत्पाद के तीसरे भाग अर्थात् समाधि की बात करते हैं। भारतीय दर्शन में समाधि अत्यधिक महत्त्वपूर्ण विचार है। बुद्ध समाधि में तीन चीजों को रखते हैं। इनमें पहली है, ‘सम्यक प्रयत्न’। प्रयत्न से यहाँ तात्पर्य है ‘व्यायाम’। हमने अक़्सर सुना होगा, “पहला सुख, निरोगी काया”। यानि जब हम स्वस्थ होंगे, तभी मन ठीक से कार्य करने की स्थिति में होगा।
मेरे कमरे में जब सुबह धूप आती है, तो बहुत गुनगुनी होती है। दोपहर तक परवान चढ़ती है और शाम फिर ठंडी पड़ने लगती है। लगता है जीवन में दुःख यूँ ही आते हैं। --- शाम का तापमान कभी एक समान नहीं देखा मैंने अपने जीवन में। जबकि सुख और दुःख हर दिन समान थे। एकदम किसी अटल पहाड़ के समान। सुरंगें अक्सर उजालों भरी ही होती हैं। असल में हमें उस पार उजाला देखने के भ्रम सिखा दिए गए हैं। --- ज़िन्दगी लम्बी या बड़ी नहीं होनी चाहिए। बस, अभी जो है, वैसी ही होनी चाहिए। अपने पूरे आकार और स्वरूप में। ताकि जो साँस अन्दर जा रही है, उसके साथ ही इसे आत्मसात कर सकें। पता नहीं हम अगली साँस में हों न हों। ---
भारतीय महिला हॉकी टीम टोक्यो ओलम्पिक खेलों में चौथे नम्बर रही। शुक्रवार, छह अगस्त को ब्रिटेन ने नज़दीकी मुकाबले में भारत की टीम पर चार-तीन से जीत हासिल की। यह वही ब्रिटिश टीम है, जिसने शुरुआती मुकाबले में भारत काे चार-एक से हरा दिया था। पिछले ओलम्पिक की स्वर्ण पदक विजेता थी। लेकिन इस बार वह काँस्य पदक के लिए भारत से मुकाबल
अरसा हो गया। इतने वर्षों से बापू को एक ही पोजिशन में बैठे हुए देखते-देखते। झुके हुए से कंधे। बंद आँखें। भावविहीन चेहरा। कहने की जरूरत नहीं, उम्मीदविहीन भी। चेहरा भावविहीन तो उसी दिन से हो गया था, जिस दिन देश को दो टुकड़ों में बाँटने का निर्णय लिया गया था। निर्णय ग़ैरों ने लिया था। उस पर कोई रंज नहीं था। पर मोहर तो अपने ही लोगों ने लगाई थी। इतनी जल्दी थी आज़ाद होने की, बापू के विचारों से आजाद होने की?
कल से आँखें ख़ुशी से नम हैं। ओलम्पिक में रोज़ाना ही कोई न कोई इतिहास रचा जा रहा है। कल क़तर के एक खिलाड़ी ने न केवल इतिहास रचा, बल्कि मुझे इतिहास की एक घटना याद भी दिला दी। इस खिलाड़ी का नाम है मुताज़ एज़ा बर्शिम।
कोरोना काल में न जाने कितने लोगों को अपनी आजीविका से विरत होना पड़ा। बहुतों ने इसे नई आजीविका के अवसर के रूप में देखा और नए उपक्रम खड़े कर दिए। इस दौर में एक तरफ़ कई लोग आजीविका खोने के कारण निर्धनता को प्राप्त हुए, वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने विविध उपायों से खूब धन अर्जित किया। मुझे याद आ रहा है कि हमारे कई मित्रों को ज़रूरत के वक़्त जीवन-रक्षक औषधियों और जीवन-रक्षक यंत्रों का कई गुना अधिक मूल्य चुकाना पड़ा। क्योंकि बहुत से औषधि विक्रेता निर्ममतापूर्वक उस समय केवल धन कमा रहे थे। अस्पतालों तक ने मानव जीवन के मुकाबले धन कमाने को वरीयता दी। यह
सौभाग्य से मुझे भारतीय सेना के साथ काम करने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं व्यक्तिगत तौर पर जिन भी सैनिकों से संपर्क में आया, उनसे चर्चा, हास-परिहास या यहाँ तक कि सामान्य बातचीत में भी किसी सैनिक को देश के अलावा किसी अन्य पर गर्व करते नहीं देखा। हाँ, उन्हें अपनी कंपनी, अपनी रेजीमेंट, अपनी बटालियन के लिए ज़रूर जीत की भावना से भरे हुए पाया। लेकिन उसमें भी सेना की दूसरी कंपनी के प्रति उतना ही सम्मान और गर्व भी देखा, जितना अपनी कंपनी के प्रति रहता है।
आज शाम मौसम अचानक बदल गया। दूध ख़त्म हो गया था फ्रिज में। बहुत हिम्मत करके बाहर निकला और गुमटी से दूध लिया। उसे जब रुपए दिए तो वापसी के लिए उसके पास चिल्लर नहीं थी। मैंने कहा, "कोई बात नहीं बाद में कर लेंगे हिसाब" तो वह बोला, "नहीं भैया जी, ले जाओ बाद में मैं भूल जाऊँगा।" मुझे समझ नहीं आया कि मात्र तीन रुपए की चिल्लर के लिए उसने अपने आप को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया।
किसी ने व्हाट्स एप पर यह कहानी मुझे भेजी। आज के दौर में जब हर कोई एक-दूसरे को गिराने की कोशिश करता है। कीचड़ उछालता है, तब यह कहानी बड़ी प्रेरक सीख देती है हमें। और चूँकि #अपनीडिजिटलडायरी पर इस तरह की चीजों को प्रमुखता से दर्ज़ किया जाता है, इसलिए सोचा डायरी पर इसे एक पन्ने की तरह जोड़ते हैं। डायरी के पाठकों के लिए। तो कहानी यूँ है....
दो जासूस, दोनों के दोनों प्रगतिशील किस्म के। देश-दुनिया की समस्याओं पर घंटों चर्चा करके कन्क्लूजन को अपनी तशरीफ़ वाली जगह पर छोड़कर जाने वाले। दोनों एक कॉफ़ी हाउस में मिले। वैसे तो दोनों अक्सर इसी कॉफ़ी हाउस में मिलते रहते हैं। लेकिन आज का मिलना ज्यादा क्रान्तिकारी है। अब ये जासूस कौन हैं? क्या हैं?