19वीं सदी की शुरुआत में मध्य और उत्तर भारत मराठा राजाओं के नियंत्रण में था। ये सब पेशवा के लिए निष्ठावान कहे जाते थे। पर नाममात्र के लिए। इनके प्रशासन का स्वरूप कुछ ऐसा था कि प्रभावी तरीके से राजकोष में राजस्व आता रहे, बस। राजकोष के लिए राजस्व इकट्ठा करने के तीन मुख्य तरीके थे। पहला- सीधे जनता से कर वसूली। दूसरा- युद्धों में लूटी गई दौलत। तीसरा- पराजित राजाओं से उनकी सुरक्षा के बदले मिलने वाला धन। लेकिन ये तरीके ज़्यदा सफल नहीं हुए। धीरे-धीरे बड़े इलाके मराठाओं के प्रभ
सन् 1748 से 1762 के बीच उत्तर-पश्चिमी भारत पर कई बार अफ़ग़ानों के हमले हुए। जबकि मध्य और उत्तरी भारत पर मराठों का कब्ज़ा हो गया। उन्हें मुग़लों का उत्तराधिकारी समझा जाने लगा। हालाँकि मराठों ने भी हिंदु होने के बावज़ूद मंदिरों को तोड़ा और गायों तथा पुजारियों तक को मौत के घाट उतारा। वे जहाँ भी गए अपने पीछे तबाही के निशान छोड़ गए। इस समय हिंदुस्तान में कोई मज़बूत केंद्रीय सत्ता नहीं थी। इससे हिंदुस्तान के तटवर्ती क्षेत्रों में शिविर स्थापित कर चुके यूरोप के छोटे कारोबारियों पर भी इसका विपरीत असर पड़ा। हिंदुस्तान की केंद्रीय सत्ता ने अब तक उनकी सुरक्षा का ज़िम्मा अपने कंधों पर ले
यादें बड़ी कमाल की चीजें होती हैं। हम अपनी यादों में पूरे संसार को समेटे रहते हैं। ये यादें अच्छी, बुरी, दुख देने वाली और प्रसन्नता देने वाली हो सकती हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि हम अपनी यादों में अपने दु:खद संस्मरणों को ज़्यादा समेटे रहते हैं। यही कारण है हम अपने अतीत से सीखते कम हैं। उसका स्मरण ज्यादा करते हैं। उन यादों से सीख कर आगे नहीं बढ़ते। उन्हें याद कर अवसाद में पहुँच जाते हैं। कहीं-कभी कट्टर हो जाते हैं। हिंसक भी हो उठते हैं। इसका ताज़ातरीन उदाहरण तालिबान है। न जाने कौन सी स्मृतियाँ हैं, जो इस संगठन को मानवीय रूप में बने रहने से रोकती हैं?
उस वक्त शाम के 5.25 बज रहे थे। मैं जर्मनी में अपने एक ग्राहक के साथ उनके दफ़्तर में बैठा हुआ था। बातचीत जारी थी कि अचानक वह कुर्सी से उठते हुए मुझसे बोले, “निकेश, मुझे एक मिनट का वक़्त दो। मैं बस यूँ गया और यूँ आया।” इतना कहकर वे तेजी से दफ़्तर के बाहर निकल गए।
बमुश्किल दो मिनट बाद ही हाँफते हुए लौटे और मुझसे कहने लगे, “हाँ अब हम अपनी बातचीत जारी रख सकते हैं।” मैं अब तक कुछ समझ नहीं पाया था। इसलिए मैंने उनसे सवाल किया, “आख़िर हुआ क्या था माइकल?”
अकबर के समय तक हर स्तर पर हिंदु जीवन पद्धति और तौर-तरीकों को स्वीकार करने की मंशा दिखती थी। यही कारण था कि अकबर ने प्रशासन में हिंदुओं को बराबरी से सहभागी बनाया। कई हिंदु अधिकारियों को बड़े पदों पर नियुक्त किया। फिर चाहे वह सैन्य प्रशासन हो या नागरिक। हिंदुओं के प्रभाव में उसने गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया। इस अपराध के लिए मौत की सज़ा तक का प्रावधान किया। मगर अकबर के बाद हालात तेजी से बदले। मसलन, 1632 में शाह जहाँ ने एक आदेश जारी कर नए हिंदु मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दी। साथ ही निर्माणाधीन मंदिरों को गिराने का फ
दिन के चौबीस घंटों में एकांत यूँ ही आता है, टुकड़ों में और हम उसमें एकसार होते हैं। फिर जीवन में लौट जाते हैं, जहाँ शोर है और सन्नाटा। --- कभी दूध को गर्म करें, अपनी आँखों के सामने। बहुत एकाग्रता लगती है। फोकस करना पड़ता है और अक्सर इन दोनों के होने के बाद भी उफनकर दूध बाहर निकल जाता है। जीवन में मौके ऐसे ही होते है प्रायः। ---
एक पुरानी कहानी है। एक राजा हुआ करता था। उसका नियम था कि उसके शहर के हाट-बाजार में जो भी सामान नहीं बिकता, उसे वह खरीद लेता। उसी के राज्य में एक गरीब अन्धा युवक भी रहता था। माता-पिता नहीं थे और वह अपने दो भाइयों पर आश्रित था। गरीबी से तंग आकर उसने अपने भाइयों से कहा, “मैं अपना जीवन आप पर भार बनते नहीं देख सकता। आप मुझे बाजार में बेच दो।” भाइयों ने पहले तो इंकार किया पर जैसा कि होता है, अन्त में गरीबी ने उन्हें व्यावहारिक निर्णय लेने के लिए बाध्य कर ही दिया।
और उस दिन ‘तंत्र’ की ‘जन’ से मुलाकात हो गई। पाठकों को लग सकता है कि भाई ‘तंत्र’ और ‘जन’ दोनों की मुलाकात का क्या चक्कर है? दोनों तो साथ ही रहते हैं - जनतंत्र।
हिन्दी का थोडा़ आनन्द लेते हैं। हिन्दी के मुहावरों की भाषा, उनकी अहमियत, उनकी ख़ासियत समझने की कोशिश करते हैं। हालाँकि इस ख़ूबसूरती से इन मुहावरों को चन्द लाइनों में सहेज लेने का यह काम मैंने नहीं किया है। काश!