संख्या भले कम थी, लेकिन अंग्रेजों में कई लोग मानते थे कि भारत के बारे में अधिक जानना चाहिए। जैसे- सर विलियम जोन्स। उन्होंने 18वीं सदी के अंत में संस्कृत साहित्य की समृद्धता के बारे में जानकारियां दीं। उन्होंने ही 1785 में ‘द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ की स्थापना की, जो आगे भारत से जुड़ी अंग्रेजों की जिज्ञासाओं की पूर्ति का केंद्र बन गई। सोसायटी ने ‘एशियाटिक रिसर्चर्स’ के नाम से एक अख़बार भी निकाला। इसके पहले ही संस्करण में बम्बई के नज़दीक एलीफेंटा की गुफाओं से जुड़े प्रसंग शामिल क
भारत में शुरू के 50 साल तक अंग्रेज आश्वस्त ही नहीं थे कि यहाँ उनका शासन लंबा भी हो सकता है। वे ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते थे। इतने कि आलोचना करते समय भी सावधान रहते कि कहीं उनकी भावनाएँ किसी को आहत न कर दें। बेवज़ह उनके शासन के लिए नई मुसीबत न आन पड़े। उनमें तब भारतीय संस्कृति के प्रति थोड़ा सम्मान भी था। शायद इसीलिए कई अंग्रेज अफ़सर फारसी पढ़ने-बोलने लगे थे। वह उस समय शासन और साहित्य की भाषा थी। एक स्तर तक वे अपने को भारत के कुलीन वर्ग का हिस्सा समझने लगे थे। लेक
आतंक के शिकंजे में दबोचे जा चुके अफ़ग़ानिस्तान से आज, 24 अगस्त 2021 को गुरु ग्रन्थ साहिब की तीन प्रतियाँ भारत आई हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब, यानि वह पुस्तक जिसमें गुरुओं की शिक्षाएँ हैं। जिसमें गुरुओं के बताए मार्ग का उल्लेख है। जिसमें गुरुओं की ओर से मानव जीवन के लिए तय लक्ष्यों का ज़िक्र है। वे गुरु, जिन्होंने हिन्दुस्तान के एक काल-विशेष में सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपना सब कुछ अर्पित कर दिया। मानवता, सभ्यता, संस्कृति, अस्मिता की रक्षा के लिए अपना कुछ भी अपने पास नहीं रखा। जो धारण किया, वह भी सिर्फ़ इन्हीं लक्ष्यों के लिए।
लॉर्ड हेस्टिंग्स भले साम्राज्य विस्तार के समर्थक रहे, लेकिन उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था में काफ़ी सुधार भी किए। उनके कार्यकाल में कई उल्लेखनीय प्रशासक सामने आए। जैसे- मोंस्टुअर्ट एल्फिंस्टन (दक्षिण), कर्नल टॉड (राजपुताना) और थॉमस मुनरो (मद्रास)। ये लोग हिंदुस्तान की वास्तविकताओं, यहाँ की भौगोलिक, प्रशासनिक आवश्यकताओं से अच्छी तरह परिचित थे। लिहाज़ा उन्होंने इन्हीं के मुताबिक अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संज़ीदगी से स्वीकारा और उनका निर्वहन किया।
अब तक दक्षिण में मैसूर के सुल्तान हैदर अली की फ्रांसीसियों से दोस्ती हो चुकी थी। वे अंग्रेजों के ख़िलाफ़ संघर्ष में उसकी सहायता कर रहे थे। इससे उत्साहित हैदर अली ने 1780 में लगभग 90,000 सैनिकों और 100 से ज़्यादा तोपों के साथ मद्रास पर धावा बोल दिया। उसके सैनिकों ने फोर्ट सेंट जॉर्ज को हर तरफ़ से घेर लिया। ऐसे में मद्रास की प्रशासक परिषद ने वॉरेन हेस्टिंग्स से मदद माँगी। हेस्टिंग्स ने तुरंत सर आयर कूट के नेतृत्व में काफ़ी धन और बड़ा सैन्य बल मद्रास भेजा। आयर कूट छापामार युद्ध के विशेषज्ञ थे। उन्होंने पोर्टो नोवो की लड़ाई में हैदर अली को हरा दिया। इस पराजय के एक साल बाद 1782
मीर क़ासिम अंग्रेजों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं हुआ। उसने कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों में दख़लंदाज़ी शुरू कर दी। इसके कारण थे। मसलन- मुग़ल बादशाह के पुराने फ़रमान की आड़ लेकर अंग्रेज करमुक्त व्यापार को अपना अधिकार समझने लगे थे। जबकि उस फ़रमान में अंग्रेजों को सिर्फ़ बंदरग़ाहों पर संचालित व्यावसायिक गतिविधियों में करों से छूट दी गई थी। हिंदुस्तान की ज़मीन पर नहीं। लेकिन अंग्रेज उस फ़रमान का दुरुपयोग कर मोटा मुनाफ़ा कमा रहे थे। इससे राजकोष को नुकसान हो रहा था। मीर क़ासिम ने जब यह देखा तो उसने सभी व्यापारिक गतिविधियाँ करमुक्त कर दीं।
यूँ तो रोज ही छुट्टी है, लेकिन इन दिनों रविवार का अपना मज़ा है। लिहाज़ा उस रोज़ सोचा कि कुछ बटन टूट गए हैं, उन्हें टाँक लूँ कमीज़ में। सो, सुई धागा खोजा पर मिला नहीं। दोपहर को याद आया। फिर जब सुई धागा मिला, तो बटन नहीं मिले। बटन मिले तो उनमें से लाल वाले गायब थे, जिनकी ज़रूरत थी। अन्त में वह कमीज़ ही भूल गया, जिसके बटन टूट गए थे।
उस समय लंदन में ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर थे सर जोसिया चाइल्ड। उनका मानना था कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखना कंपनी का कर्त्तव्य है। इसलिए उन्होंने 80,000 पाउंड अदा कर इंग्लैंड के राजा चार्ल्स-द्वितीय से निषेधाज्ञा जारी कराई। इसके जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रतिस्पर्धी ब्रिटिश कंपनियों को भारत में व्यावसायिक गतिविधियाँ चलाने से रोक दिया गया। हालाँकि 1694 में ब्रिटिश संसद ने संकल्प पारित कर यह निषेधाज्ञा रद्द कर दी। इसी बीच 1697 में स्पाइटलफील्ड्स (लंदन का एक इलाका) के र
अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के कारोबारी जब पहली समुद्री यात्रा पर निकले तो भारत नहीं, सुमात्रा पहुँचे थे। लेकिन 1608 में कंपनी के एजेंटों- बैंटम और मॉल्यूकस ने प्रबंधन को बताया कि भारत के कच्चे सूत की ग्राहकों में काफ़ी माँग है। लिहाज़ा भारत में कंपनी का वाणिज्यिक केंद्र होना चाहिए। इससे भारत के कच्चे सूत की ख़रीद-फ़रोख़्त आसान होगी। इसके बाद कंपनी की आग्रह पर तत्कालीन मुग़ल बादशाह शाह जहाँ ने उसे हिंदुस्तान में वाणिज्यिक केंद्र स्थापित करने की अनुमति दी। हालाँकि पुर्तगालियों ने इसका विरोध किया क्योंकि वे भारत में पहले से थे। वे भारत पहुँचने वाले पहले यूरोपीय थे। लेकिन उनका विरोध बेअ
काबुलीवाला ... हाँ, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की कहानी का पात्र काबुलीवाला। पाँच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त काबुलीवाला। कोलकाता की गलियों में घूम-घूमकर सूखे मेवे (ड्रायफ्रूट्स) बेचता काबुलीवाला। मिनी में अपनी बेटी को याद करता काबुलीवाला।