ईसाई पंथ के कट्टर समर्थकों को पहली बड़ी सफलता 1813 में मिली। उस साल के अधिकार पत्र अधिनियम के जरिए ब्रिटेन की सरकार ने भारत में बिशप (ईसाई धर्मगुरु) की नियुक्ति के लिए कंपनी को बाध्य किया। बिशप का मुख्यालय कलकत्ता में रखा गया। अंग्रेजों के अधिकार वाला पूरा भारतीय इलाका उनका कार्यक्षेत्र बनाया गया। उन्हें ज़िम्मेदारी दी गई कि इस पूरे इलाके को ईसाई मिशनरियों के कामकाज के लिए सुलभ बनाएं। इस कानून ने कंपनी को उसका व्यावसायिक एकाधिकारवाद थोड़ा और छोड़ने के लिए विवश किया। वैसे, कंपनी ने जब से 1757 में बंगाल पर आधिपत्य किया, तभी से व्यापार का मसला उसके लिए दूसरे दर
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर कृष्ण के विविध रूपों की लोगों ने अपने-अपने मतानुसार आराधना की। प्राय: श्रीक़ष्ण का बाल रूप और उनके उस स्वरूप की लीलाएँ हर व्यक्ति के मन को मोह लेती हैं। सभी के मन को आकृष्ट करती हैं। इसका कारण है कि बाल स्वभाव, बाल रूप सहज, सरल और मोहक ही होता है। लेकिन वही बालक जब बड़ा होकर युवक बन जाता है और समाज में अपनी पहचान स्थापित करता है, तब वह हर किसी के लिए मोहक नहीं रह जाता। कारण कि युवा अपनी योजना, अपनी शैली, अपने विचारों का पुंज होता है। इसलिए उससे सम्बन्धित लोग उसकी इन तमाम चीजों को देखते हैं, आकलन करते हैं,
कृष्ण एक अभिशप्त मानव, निर्वासित देवता...। सुनने में अटपटा लगा न, अस्वीकार्य भी? ऐसा ही होता है। सच अक़्सर अस्वीकार्य और कड़वा सा लगता है। इसीलिए उस पर महिमामंडन का लेप, अलौकिता का छिड़काव और आदर्श का आवरण डालने की कोशिश की जाती है। और फिर निरपेक्ष सत्य को अपना-अपना सच बनाकर कितने ख़ुश हो लेते हैं हम मनुष्य।
ब्रिटिश शासन में कई प्रशासक-विचारक इस पक्ष में थे कि भारतीय राजाओं और उनके राज्यों को संरक्षण देना चाहिए। इससे भारतीय संस्कृति को नैसर्गिक रूप से पुष्पित-पल्लवित होने की गुंजाइश मिलती रहेगी। साथ ही जिन अहम स्थानीय लोगों को सरकारी अधिकारी-कर्मचारी के रूप में ब्रिटिश भारत के पदक्रम में जगह नहीं मिली, उन्हें पुनर्वासित किया जा सकेगा। इस तरह शासक और शासितों के बीच सीधा संबंध स्थापित होगा, जो स्थायित्व की नींव बनेगा। उनका यह भी मानना था कि आम लोगों के लिए सरकार की उपलब्धता सहज होनी चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया की गति भी तेज होनी चाहिए। उनके मुताबिक, यह सब न्यायपालिका और कार्यपालिक
जब अंग्रेजों ने सत्ता संभाली तो शुरू में उनके पास शासन करने के लिए न पर्याप्त लोग थे, न क्षमता। मग़र वे शासन करते रहना चाहते थे। लिहाज़ा सबसे पहले रॉबर्ट क्लाइव ने ‘दोहरे शासन’ का नुस्खा आज़माया। इसमें राजाओं-नवाबों के शासन को मुखौटे की तरह चलने दिया गया। जबकि, अंग्रेज परदे के पीछे सक्रिय रहते थे। यह व्यवस्था अंग्रेजों को शुरू में फ़ायदे की लगी। क्योंकि सीधी ज़िम्मेदारी के बिना वे व्यवस्था से पूरे लाभ ले रहे थे। यह उनका मुख्य मक़सद भी था। इस समय तक मोटे तौर पर, उनका मानना था कि हमें भारत में
जीवन में जब होने, खोने और पाने के मायने जल्दी समझ आ जाते हैं, तो समझदार व्यक्ति ही आगे जाने या ख़ुद को ख़त्म करने का निर्णय लेता है।
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भारत में ब्रिटिश समुदाय के कला और शिल्प को भी पेशेवर और शौक़िया, दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। टिली कैटल (1796-1776) के मद्रास आने के बाद कई चित्रकार भारत आए्र। इनमें कैटल, जॉन ज़ॉफनी (1783-1789), आर्थर डेविस (1785-1795) ने तैल चित्र बनाए। लेकिन उनकी कृतियों को आबोहवा ने ख़राब कर दिया। वे आकार में भी इतनी बड़ी थीं कि उन्हें इंग्लैंड ले जाना मुश्किल था। ऐसे में छोटे आकार के चित्र बनाने वाले चित्रकारों को लाभ मिला। जॉन स्मार्ट (1785-1795) और ओज़ियस हंफ्री (1785-1787) के नाम इनमें प्रमुख हैं। उनके बाद के चित्रकार भी उतने ही सक्षम हुए। जैसे, 19वीं सदी के शुरू में जॉर्ज चिनरी (1
उस दम्पति को शादी-शुदा जीवन में करीब 60 साल हो चुके थे। वे आपस में हर बात एक-दूसरे से साझा करते थे। हर चीज पर बात करते थे। कुछ भी उनके बीच गोपनीय नहीं था। सिवाय एक छोटे से बक़्से के। पत्नी वह बक़्सा हमेशा अपने सिरहाने रखती थीं। उन्होंने पति को ताक़ीद की हुई थी कि उनकी इजाज़त के बिना उसे कभी छुएँ भी नहीं। खोलना तो दूर की बात है। पति ने भी पत्नी की इस ताक़ीद के ख़िलाफ़ कभी कोई कोशिश नहीं की।
ब्रिटिश भारत के शुरुआती दौर में कई सैन्य-असैन्य अंग्रेज लेखक उभरे। इन्ही में एक थे, रॉबर्ट ऑरमे। उनकी क़िताब- ‘हिस्ट्री ऑफ मिलिट्री ट्रांजेक्शन ऑफ द ब्रिटिश नेशन इन इंडोस्तान’ 1763 में प्रकाशित हुई। जबकि जॉन मैल्कम की ‘पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ 1826 में आई। वहीं, मॉन्सटुअर्ट एल्फिंस्टन की ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ 1841 और जेम्स ग्रांट डफ की ‘हिस्ट्री ऑफ मराठा’ 1826 में आई। इनमें से मैल्कम ने अंग्रेजों के तौर-तरीकों को सही ठहराने की ही कोशिश की। वे लिखते हैं, “इंग्लैंड ने पूरब में जो साम्रा
सुबह नित्य कर्म, योगासन और ध्यान-स्नान से फ़ारिग होते ही वे अपने बालों को सँवारने के लिए हमेशा की तरह दर्पण के सामने थे। लेकिन बाल सँवारते-सँवारते आज उन्हें दर्पण में कुछ हलचल महसूस हुई। शायद दर्पण कुछ कहना चाहता है। हालाँकि दर्पण कहना तो काफी दिनों से चाहता था, लेकिन महसूस उन्होंने आज किया। पर उनके सामने कुछ कहने की क्या कोई मज़ाल कर सकता है? इसलिए उनके दम्भ को हल्की-सी ठेस लगी। वे एक कदम पीछे हो गए। फिर दर्पण से मुँह फेर लिया। लेकिन तभी उन्हें आवाज़ सुनाई दी, “राजन ओ राजन...”। यह आवाज़ दर्पण से ही आ रही थी।