लंदन में बैठे कंपनी के निदेशक मंडल ने कॉर्नवालिस को आदेश दिया था कि वह राजस्व संग्रह के लिए किन्हीं स्थायी नियमों को अमल में लाएँ। ऐसे में, उनके पास ज़मींदारों को मान्यता देने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह गया। कारण कि उनके पास किसानों से सीधे लगान वसूलने के तब तक कोई साधन ही नहीं थे। बहरहाल, बंगाल में ज़मीनों के मालिक कितना लगान अदा करेंगे, यह तय था। इसका उनकी आर्थिक स्थिति से कोई संबंध नहीं था। नियम ये भी था कि अगर ज़मीन मालिक तयशुदा लगान सरकार को नहीं दे पाए तो उनकी ज़मीन किसी और को बेची जा सकती थी।
जब अंग्रेजों ने बंगाल में प्रत्यक्ष रूप से शासन हाथ में लिया तो शुरू में ज़मींदारों के ज़रिए लगान वसूली की। ज़मींदारों के इलाके बँटे हुए थे, जो आकार में अलग-अलग थे। इस व्यवस्था ने नि:संदेह भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित किया। इसके बावज़ूद 1772 तक अंग्रेजों ने इसे ज़ारी रखा। रॉबर्ट क्लाइव ने इसका स्वाभाविक कारण बताया, “शुरू में हमारे लिए ज़रूरी था कि हम सरकारी-तंत्र के पुराने अधिकारियों पर भरोसा करें। उनसे हमें जानकारियाँ जो हासिल करनी थीं। इसीलिए अपने हित की दृष्टि से उन्हें साथ जोड़ना पड़ा। यह व्यवस्था हमें तब तक जारी रखनी थी जब तक हमारा अनुभव उसकी ज़रूरत को न्यूनतम न बता दे। नीति की
किन्हीं सेठ जी को अपने धन पर बहुत गर्व था। वे जब किसी को धन से मदद करते, तो सब जगह उसका बख़ान किया करते थे। अपना ही गौरवगान करते। एक दिन उन्हें पता चला कि नगर में महात्मा बुद्ध आए हैं। उन्होंने सोचा- क्यों न, महात्मा जी को कुछ भेंट दी जाए। थोड़ा पुण्य अर्जित कर लिया जाए। लिहाज़ा, वह हजार स्वर्ण मुद्राएँ लेकर बुद्ध के पास पहुँच गए। अभिवादन किया और पास ही बैठ गए। बुद्ध ने उनके आने का कारण पूछा, तो पहले उन्होंने अपनी दानशीलता की स्वयं प्रशंसा की। फिर बोले, “महात्मन्, आपके पास धन का अभाव रहता होगा। इसलिए मैं आपके लिए कुछ भेंट लाया हूँ। कृपया, इसे ग्रहण करें।” इसके बाद उन्होंने स
अंग्रेजों ने जब भारत में न्याय-व्यवस्था बनाना शुरू की तो शुरू में कुछ संशोधनों के साथ मुसलिम फौज़दारी कानून लागू किए। ख़ास तौर पर, उन पर जगहों में, जहाँ वे पहले से अमल में थे। हालाँकि अंग्रेजों द्वारा किए गए संशोधनों को अपना असर दिखाने में कुछ ज़्यादा ही समय लग गया। उदाहरण के लिए, 1789 तक भी बंगाल में मुसलिम कानून के मुताबिक डाकू-लुटेरों को उनके हाथ या पैर काट देने की सज़ा दी जाती थी। जबकि अंग्रेज यह सज़ा हटा चुके थे। इसके अलावा, अंग्रेजों ने उन इलाकों में अपने कानून लागू किए, जहाँ से मुसलिम फौज़दारी कानून हट चुका था। जैसे, मराठा शासन के अधीन रहे इलाके। इसका कारण ये कि आपराधिक
अंग्रेजों के आने से पहले हिंदुस्तान में कानून की अपनी व्यवस्था थी। हिंदु और मुसलमानों की अपनी विधायी संस्थाएँ थीं। लेकिन मुग़लिया सल्तनत के ढहने के बाद ग़ैरज़िम्मेदार ताक़तों के तौर-तरीकों की वज़ह से वे या तो नष्ट हो गई थीं या काम करना बंद कर चुकी थीं। वैसे, एक न्यायिक संस्था अब भी थी, ग्राम पंचायतों की। लेकिन उसकी कोई सटीक कानून संहिता नहीं थी। इसकी गतिविधियाँ और फ़ैसले पिछले फैसलों या परंपराओं पर आधारित होते थे, जिनकी प्रकृति स्थानीय थी। इसीलिए इनके फ़़ैसलों और गतिविधियों की स्वीकार्यता भी स्थानीय स्तर पर ही थी। स्पष्ट अर्थों में पंचायत कोई न्यायिक अदालत नहीं, बल्कि मध्स्थता क
यद्यपि मैकॉले सही थे। इसके बावज़ूद ध्यान रखने की बात है कि भारत की पत्रकारिता उस वक़्त लगभग पूरी तरह यूरोपीय समाचार जगत के हाथ में थी। इसमें अधिकांशत: ब्रिटिश समुदाय के हितों की वक़ालत ही की जाती थी। ऐसी पत्रकारिता बहुत कम थी जो ‘आम राय’ से प्रभावित हो, या उस पर असर डाले। फिर भाषा भी अंग्रेजी थी उसकी और अधिकांश भारतीय हिंदी भाषी। इससे स्वाभाविक तौर पर इसमें उन्हीं की राय प्रदर्शित होती थी, जो अंग्रेजी पढ़ना-लिखना जानते थे। बहुसंख्य लोगों की राय इसमें नहीं ही होती थी। इसीलिए तब सरकार ने तय किया था कि
हम सब अधूरे हैं। आधे-अधूरे काम करते हैं। अधूरेपन में जीते हैं। अधूरे रहकर ही जीवन समाप्त करते हैं। अपने अधूरेपन के कारण ही जीवन मुकम्मल हो पाता है। --- हम अपने आपको इस क़दर अधूरा छोड़ते हैं कि किसी न किसी को उसे पूरा करना पड़ता है। जो पूरा करने का मुग़ालता रखता है, वह भी बहुत संत्रास में जीता है। पूरापन असल में कुछ होता ही नहीं है। --- जो चीज़ें अपने भव्य और सम्पूर्ण स्वरूप में दिखाई देती हैं, वह किसी समय-सीमा और हड़बड़ाहट का अन्तिम परिणाम नहीं बल्कि किसी तरह से ख़त्म कर नए अधूरे को थामने की पुरज़ोर कोशिश है। क्योंकि मानव मन एक ही जगह लम्बे समय तक टिक नहीं सकता। ---
बेंटिंक ने जब प्रशासनिक सुधार शुरू किए तो सभी प्रमुख विचारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। उन्होंने कार्यपालिक और न्यायिक शक्तियों को मिलाने पर जोर नहीं दिया। उन्हें एक-दूसरे पर निर्भर बनाया। बंगाल में अब तक कलेक्टर-न्यायिक दंडाधिकारी हर जिले में नियुक्त हो चुके थे। उनके ही नियंत्रण में पुलिस थी। लगान से जुड़े मामलों में न्यायिक शक्तियाँ भी थीं। जिला न्यायाधीश अलग थे। वे कलेक्टर-न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा भेजे गए आपराधिक मामलों की सुनवाई करते थे। निचली भारतीय अदालतों के विरुद्ध दीवानी मामलों की अपील पर सुनवाई करना भी उनके&nb
भारत के बारे में जेम्स मिल जैसे उपयोगितावादी विचारकों का ध्यान भी मुख्य रूप से भू-राजस्व के मसले पर ही था। मिल इस भारतीय विचार को मान्यता देते थे कि ज़मीन की असल मालिक सरकार (राजा) है। लेकिन उन जैसों के सामने समस्या अभी ये थी कि सरकार को मिलने वाला लगान कैसे तय हो?
ये बादल भी न, कभी बरसते हैं, कभी नहीं। कहीं ख़ूब बरसते हैं। कहीं बिल्कुल नहीं या बहुत कम। बादलों की इस मनमानी और इससे होने वाली कुछ मूलभूत किस्म की दिक्क़तों से ख़बरनवीस परेशान। सो, जैसे ही पानी से भरे बादल का टुकड़ा एक ख़बरखोजी की छत से गुजरा, उसने उसे धर लिया। इरादा सीधे दो-टूक बात करने का था। लिहाज़ा, बिना भूमिका सीधे सवाल-ज़वाब शुरू। शुरुआत, अलबत्ता, बादल के उस टुकड़े ने की क्योंकि उसे बीच रास्ते रोक जो लिया गया था...
बादल : कौन हो भाई? क्यों रोक लिया हमें?
रिपोर्टर : मैं रिपोर्टर। आपसे बहुत जल्दी से कुछ सवाल-ज़वाब करने हैं।