स्वदेशी कपास उद्योग के पतन से हथकरघा उद्योग में काम करने वाले भारतीय कारीगर बड़ी संख्या में बेरोज़गार हुए। उनके पास भूमिहीन मज़दूरों के रूप में काम करने के अलावा विकल्प नहीं बचा। अंग्रेज बुनकरों को भी नुकसान हुआ। पर उन्हें लंकाशायर के मशीनी कपड़ा उद्योग में काम मिल गया। इस समय ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति चल रही थी। उसके असर में पूँजीवादी ताक़तें भारत पहुँच चुकी थीं। वे यहाँ व्यवसायी मध्यवर्ग को प्रोत्साहित कर रही थीं, जो आगे भारतीय उद्योग की नींव डालने वाला था।
तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1815 में जब पूरे देश का दौरा किया तब उन्हें नहरी-संरचनाओं की अहमियत समझ आई। इससे जुड़े मुनाफ़ों का भी वे अनुमान लगा सके। हिंदुस्तान में 18वीं सदी की अराजकता ने इन संरचनाओं को काफ़ी नुक़सान पहुँचाया था। लिहाज़ा हेस्टिंग्स ने तुरंत सबसे पहले पश्चिमी यमुना नहर के पुनरुद्धार का काम शुरू करने का आदेश ज़ारी किया। हालाँकि शुरू में काम धीमा रहा। मगर जब 1823 में सिंचाई परियोजनाओं का काम देखने के लिए दिल्ली में एक महाअधीक्षक की नियुक्ति की गई, तब इस 445 मील लंबी नहर का काम तेजी से पूरा हो सका। फिर पूर्वी यमुना नहर का 1830 में पुनरुद्धार कराया गया। वैस
सुनता है गुरु ज्ञानी, गगन में आवाज़ हो रही झीनी-झीनी। ------ अड़सठ घाट भीतर हैं, कहाँ जाना है? न गंगा, न यमुना, सुमिरन कर ले मेरे मना, मन चंगा तो कठौती में ही गंगा है। बीती जा रही है, सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नही हैं। इसी घट अन्तर बाग-बग़ीचे, पर भागना रुक नहीं रहा है। सोचने-समझने को तैयार नहीं हैं। -----
भारतीय परम्परा में "सप्त" का बहुत महत्त्व है। विवाह में सप्तपदी होती है। वहीं सात कदम साथ चलने से सज्जनों में मित्रता हो जाती है - "सतां सप्तपदी मैत्री"। सप्तऋषि, सात द्वीप, सात चक्र, सात दिन, सात स्वर, सात लोक, सात पदार्थ, पूजनीयों की संख्या भी सात ही है ईश्वर, गुरु, माता, पिता, सूर्य, अग्नि तथा अतिथि।
इस तरह बहुत सी चीजें है जो सात के समूह में उपलब्ध होती हैं। सूर्य की सात रश्मियाँ, जो सात भिन्न रंगों में होती हैं। सूर्य अपनी इन्हीं सात रश्मियों के माध्यम से जीवन प्रदान करता है।
ब्रिटिश सरकार ने ज़मीन से संबंधित जो कानून बनाए उनका पहला उद्देश्य था कि मालिक़ाना हक़ की स्थिति परिभाषित की जाए। राजस्व संग्रह बेहतर करने के लिए यह ज़रूरी था। लेकिन लगान के ऊँचे आकलन ने ग्रामीण इलाकों में लोगों की आर्थिक स्थिति को झिंझोड़ डाला। ज़मीन के मामलों से जुड़ीं दो अलग-अलग प्रणालियों- ज़मींदारी और रैयतवाड़ी ने सामाजिक अव्यवस्था की स्थिति भी पैदा कर दी। ख़ासकर, जिन इलाकों में ज़मींदारी सिद्धांत के आधार पर ‘स्थायी बंदोबस्त’ लागू था, वहाँ गैर-ग्रामीण ज़मींदारों की तादाद बढ़ गई। वे गाँवों के बजाय दूसरी जगहों, शहरों आदि में रहते थे। ज़मीनों से मुनाफ़ा वसूली उनका मुख्य मक़सद था। इससे
मेरे शहर में दो सड़कें हैं। वैसे तो कई सड़कें हैं,लेकिन आज हम इन दो सड़कों की बात ही करेंगे। एक ख़ास सड़क है। वह उतनी ही ख़ास है जितना कि ख़ास कोई नेता या अफ़सर या जज या इनकी पत्नियाँ होती हैं। इसे कहने को ‘वीआईपी रोड’ कह सकते हैं। वैसे ये ख़ास रोड है तो ‘हुजूर’, ‘सरकार’, ‘जी मालिक’, ‘जी मालकिन’ टाइप के सम्बोधन अधिक फ़बते हैं। दूसरी आम सड़क है। ऐसी आम सड़कों की भरमार है। जिधर देखो, उधर आम ही आम सड़कें। यह वैसी ही आम है, जैसे मैं और आप। चूँकि ये आम सड़क है तो इन्हें प्यार से ‘अबे’, ‘ओए’, ‘स्साली’ जैसा कुछ भी कह सकते हैं। ये बुरा नहीं मानती। ह