फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को लेकर सोशल मीडिया पर जारी बेइंतिहा गहमागहमी से सभी वाक़िफ़ हैं। फिल्म को लेकर कश्मीरी पंडितों के अनुभव से लेकर विरोध में उठ खड़े हुए पब्लिक इंटलेक्चुअल्स स यह पता तो लग ही जाता है कि इससे जमीन हिली है। सो, इसका जायज़ा लेने के लिए एक लंबे अरसे के बाद आज आइनॉक्स जाना हुआ। वहाँ ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म
खुशियाँ छोटी थीं इतनी कि नजर नहीं आती थीं। शायद दरवाज़े पर ‘शुभ-लाभ’ लिखा होने या सुबह माँ की बनाई रंगोली में लक्ष्मी के पाँव देखकर लौट जाती हों। कम खर्च और मितव्ययिता का अर्थ तो अब इस उम्र में मालूम पड़ रहा है। पर उस समय में लम्बा चलना या मन मसोसकर रह जाना, मानो जीवन का स्थाई भाव था। लम्बी-लम्बी बहसों का परिणाम यह होता कि कामरेड लोग कहते कि तुम सुखी हो, जो इतना कुछ है तुम्हारे पास। यह कहकर वे लोग एक लम्बी गाड़ी में, जिसमें विदेशी किस्म की शराब भरी होती, एसी लगा होता, में बैठकर चले जाते। उनके घरों के गमले और पौधों का खर्च मेरी एक माह की तनख़्वाह के बराबर होता था। उनके घरों के एक कप, जो अक्सर हर
आज ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ है। पूरा विश्व महिला सशक्तिकरण और महिलाओं के अधिकारों पर व्याख्यान दे रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में, मैं भी जब जैनदर्शन की इस श्रृंखला का यह भाग महिला-केन्द्रित होकर लिखने की इच्छा से बैठा, तो सोचने लगा कि भारतीय समाज कितना उदार रहा है। भारतीय समाज में प्रत्येक विचारधारा पुरुष के पक्ष में नहीं, अपितु शक्ति की आराधना में लीन दिखाई देती है। मुझे इस बात कर गर्व की अनुभूति हुई कि भारतीय समाज की श्रेष्ठता सम्भवत: इसी में है कि वह मानवीय है। यहाँ महिला को अशक्त माना ही नहीं गया, जो उसके सशक्तिकरण के लिए आन्दोलित होने की आवश्यकता दिखाई दे।
चलो जीती हूँ आज से, मैं सिर्फ़ अपने लिए।
भूल जाती हूँ बचपन से, जीना माता-पिता के लिए शादी के बाद पति और बच्चों के लिए चलो तोड़ती हूँ, आज सारे बन्धन, मैं सिर्फ़ अपने लिए।
चलो मुश्किल है मुझे समझना, आसान बनाती हूँ, सबके लिए छोड़ती हूँ ससुराल में, सबकी हाँ में हाँ मिलाना शादी के बाद सिन्दूर और बिन्दी लगाना चलो छोड़ती हूँ हर क़दम पे, मैं रिश्तों का बोझ उठाना।
खूब नौकरियाँ पकड़ीं और छोड़ीं। मानो जीवन में यही सब करने के लिए पैदा हुआ था। लोग कहते हैं ईश्वर ने जब जन्म दिया है तो किसी उद्देश्य के साथ ही दिया होगा। संसार में महान और बड़ा काम करने के लिए। हम चौरासी लाख योनियों में भटककर आते हैं और अपने कर्मों से मनुष्य योनि पाने की यह पुण्याई अर्जित करते हैं। लेकिन मुझे कभी नहीं लगा यह। तनाव, अवसाद, त्रासदी और ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाने की क़श्मकश में सुख का मुँह देखा ही नहीं कभी। हमेशा अपने आगे एक समस्या मुँह बाए खड़ी देखी। और जब तक इससे निजात पाता, तब तक अम्बार खड़ा मिलता समस्याओं का। जिन्दगी धूँ-धूँ जलते दानावल में पटकी जाती। जैसे, कोई
आजकल समाज में वस्त्र-विशेष (हिज़ाब) को लेकर उथल-पुथल चल रही है। इसके पक्ष-विपक्ष में अज़ीब-अज़ीब तर्क दिए जा रहे हैं। इसके समर्थक मुँह सहित स्त्री का पूरा शरीर ढँकने सम्बन्धी अपने धार्मिक क़ायदों की दलील दे रहे हैं। वहीं, विरोध करने वाले ये तक कहते सुने जा रहे हैं कि अगर जैन सम्प्रदाय के लोग दिगम्बर होकर कक्षाओं में जाने लगें तो क्या होगा? या नागा साधु विश्वविद्यालय जाने की ज़िद करने लगें तो?
आज के बुलेटिन में ख़ास
- पिछले साल 4 मौके मिले थे और इनमें से सर्वश्रेष्ठ मान्य था - पिछले साल करीब 25 लाख छात्रों ने जेईई परीक्षा दी थी - इस बार के लिए इस महीने के आखिर में रजिस्ट्रेशन शुरू होंगे - बप्पी लाहिड़ी का निधन, महज 3 साल की उम्र से संगीत में हाथ आज़माना शुरू कर दिया था - भाग्य के लिए गले और हाथों में बप्पी खूब सारे सोने के गहने पहना करते थे
आज के बुलेटिन में ख़ास
बहुत दिनों में कल किसी से बातचीत में कड़क ब्लैक कॉफ़ी का ज़िक्र सुना। अचानक वहाँ से उठा और सीधा घर चला आया। अपनी रसोई में ब्लैक कॉफ़ी के पाउच खोजता रहा। बहुत सारे पाउच थे मेरे पास। लगभग सारे गिफ़्ट में मिले थे और कुछ ख़रीदे थे। कॉफ़ी के रोस्टेड बीज थे, जिन्हें ताज़ा कूटकर कॉफ़ी बनाना पसन्द था। कुछ ऐसे बीज थे, जो किसी जानवर के खाने के बाद उसके मल में से निकालते हैं। फिर उन्हें प्रोसेस करके बेचा जाता है। ये सब बहुत महंगे थे।
एक पल स्थिर हो जाना, एक पल ठहर जाना। एक पल की खुशी, एक पल के दुख में जीवन खपा देना। एक पल के इंतज़ार की पीड़ा, एक पल की मुलाकात। एक पल ठिठुरना, एक पल की मुस्कुराहट। एक पल का साथ, एक पल में सब कुछ छोड़कर गुजर जाना। एक पल में विलोपित हो जाना और एक पल में ख़त्म हो जाना। और इस एक पल का यूँ आना और ढाढ़स बँधाते हुए उसी पल में विलीन हो जाना कितना विचित्र है न?