आज राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया गया। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचन्द का जन्मदिन। भारत का मान बढ़ाने वाले खेल-खिलाड़ियों को उनके हिस्से का सम्मान देने का दिन भी। लिहाज़ा, दूर देश में भारत का मान बढ़ाने वाली एक बेटी का जिक्र करने का भी इससे बेहतर मौका कोई हो नहीं सकता। उसका नाम लिज़ा स्थालकर है। बेहद प्रेरक कहानी है लिज़ा की। हालाँकि ये बात दीगर है कि भारत के मीडियाने उसकी कहानी को जगह देने की ज़्यादा ज़हमत नहीं उठाई। पर ऑस्ट्रेलिया के अग्रणी अख़बार ‘द गार्जियन’ ने इसी 26 अगस्त को उसकी कहानी प्रकाशित की है।
जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने पद छोड़ने की घोषणा की है। उन्होंने शुक्रवार को मीडिया से बातचीत के दौरान कहा, “अगर मैं लोगों के लिए बेहतर फ़ैसले नहीं ले सकता, तो प्रधानमंत्री भी नहीं रह सकता। इसीलिए मैंने अपना पद छोड़ने का निर्णय किया है।”
हिन्दी फिल्मों के अभिनेता आमिर खान और उर्दू शायर मुनव्वर राणा इन दिनों विवादों में बने हुए हैं। अभी तीन-चार दिन पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र ‘पाँचजन्य’ में एक लेख प्रकाशित हुआ है। इसका शीर्षक था, ‘ड्रैगन का प्यारा खान’। इसमें सवाल उठाया गया है कि चीन में आमिर खान की फ़िल्में क्यों शानदार कारोबार करती हैं?
हिन्दु पंचांग के अनुसार आज राधाष्टमी है। यानि वह दिन, जब मधुरा के बरसाना कस्बे में, मुखिया वृषभान राय के घर ‘राधा जी’ ने जन्म लिया था। पूरे बृज में इस दिन को बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। देशभर के तमाम कृष्ण मन्दिरों में भी विशेष आयोजन होते हैं। क्योंकि ‘राधा’ कोई सामान्य किशोरी नहीं मानी जातीं। उन्हें श्रीकृष्ण की परम प्रेयसी का दर्जा हासिल है। बल्कि उनसे भी ऊपर मानी जाती हैं। राधा जी के जन्म और इसके बाद उनकी छठी पूजा आदि के मौके पर गाए जाने वाले पदों में इसका स्पष्ट उल्लेख है। जैसे- नीचे दिए गए इस पद में ख़ास तौर पर कहा गया है, “या कन्या के आगैं, कोटिक बेटन को अब मानैं...”। मतलब- करोड़
आज यकायक माई की याद आ गई। इसीलिए उसकी स्मृति को डायरी में दर्ज कर रही हूँ। यही कोई 38 साल पहले की बात है। तब मैं बहुत छोटी थी। पाँच-छह साल की। स्कूल में नया दाखिला मिला था। बाबा के तबादले के साथ ही हम एक नए शहर में आए थे। बुलढाणा, जो महाराष्ट्र के पहाड़ों में बसा है। हमारा बड़ा कुनबा था। दादा, दादी, दो चाचा, हम तीन बच्चे। बाबा घर भी बनवा रहे थे। सो, माँ पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया था। तब वह बूढ़ी माई हमारे घर पहली बार आई थी। घरेलू कामकाज के लिए। कमर कुछ झुकी हुई। बाल काले, घुँघराले। उनका छोटा सा जूड़ा बना होता था। वह भील जाति से थी।
पूरा देश इन दिनों गणपति बप्पा की आराधना में जुटा है। उनसे कामना कर रहा है, विनती कर रहा है कि वे अपने ‘विघ्नहर्ता’ स्वरूप के प्रभाव से देश और दुनिया को कोरोना महामारी के संकट से मुक्ति दिलाएँ। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:’ का सभी जीव-जनों आशीष दें। ऐसी कामनाओं, विनतियों के बीच ही अगर हमारी परिष्कृत भाषा ‘संस्कृत’ में भगवान गणेश की स्तुति, वह भी बढ़िया और सधे हुए उच्चारण के साथ सुनने मिल जाए तो क्या कहने। उससे होने वाली सुखद अनुभूति को शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। पर इस अनुभूति से गुजरना सम्भव हो पाया है।
करीब दस साल पहले एक चैनल से विदा होते हुए जब मैं अपने साथियों से अन्तिम बार मिल रहा था, तब एक कमउम्र लड़की ने मुझसे बाय कहा। मैंने जवाब दिया, “देखो.. जल्दी भेंट होगी!” वह कुछ विस्मय से बोली, “सर आप हिन्दी के बड़े अच्छे और भूले-बिसरे शब्द बोलते हैं।”
शीटी बजाना आम तौर पर अच्छा नहीं माना जाता। अक्सर बड़े-बुज़ुर्ग ऐसा करने से छोटों को रोकते हैं। कई बार शीटी के चक्कर में पिटने-पीटने की नौबत भी आ जाती है। लेकिन ऐसी आम धारणा को इस वीडियो में प्रदर्शित रचनात्मकता पूरी तरह छिन्न-भिन्न करती है।
यह वीडियो ‘इंडियन व्हिशलर्स एसोसिएशन’ के यू-ट्यूब चैनल से लिया गया है। ये संगठन उन लोगों का है, जिन्होंने शीटी बजा-बजाकर सुर-संगीत को साध लिया है। वह भी इस स्तर पर कि देखने-सुनने वाले के मुँह से ‘वाह’ निकल उठे। इतना कि दूरदर्शन जैसे राष्ट्रीय चैनल पर भी इनकी शीटियों से निकली रचना का प्रदर्शन किया जाने लगे।
ख़बर आई है कि पंडित जसराज नहीं रहे। पर क्या ऐसा हो सकता है भला? ये सवाल ग़ैरवाज़िब नहीं, बल्कि सोचने लायक है। क्योंकि जो शख़्स अपने संगीत से पिता को भी जीवन्त करने का इरादा रखता हो। जिसने अपने संगीत से पिता के साथ-साथ ख़ुद को भी समयातीत-सा बना लिया हो। क्या वह यूँ दुनिया छोड़ सकता है? नहीं। हाँ, उनकी ‘देह का अन्त’ ज़रूर हुआ है अलबत्ता और ये सच्चाई है। लेकिन बस इतनी ही। पंडित जसराज ख़ुद भी देह-गेह की बस इतनी ही सच्चाई स्वीकार करते थे शायद। उनके जीवन से जुड़े किस्सों से ये बात साबित होती है।
चेन्नई की रहने वाली पाँच साल की बच्ची संजना, तीरन्दाजी के अपने ‘हुनर’ की वज़ह से फिर चर्चा में है। उसने अभी 15 अगस्त के दिन हवा में उल्टे लटककर लगातार 111 तीर छोड़कर निशाना लगाया है। वह भी महज 13 मिनट 15 सेकेंड में। इस तरह उसने गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के लिए अपना दावा पेश किया है। यहाँ दिए जा रहे वीडियो में उसका यह कारनामा देखा जा सकता है। संजना के कोच शिहान हुसैनी की मानें तो किसी युवा पेशेवर तीरन्दाज ने भी अब तक ऐसा कमाल नहीं किया है। वैसे यह पहली बार नहीं है, जब संजना ने तीरन्दाज़ी में इस तरह का प्रदर्शन किया हो। साल 2018 में जब वह महज़ साढ़े तीन साल की थी,