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केल्हौरा की कहानी बताती है कि गाँव के भीतर से ही जल, जंगल, ज़मीन की सूरत बदल सकती है!

By टीम डायरी, 12/12/2020 - शनि, 12/12/2020 - 20:16

ये एक छोटे से गाँव की बड़ी कहानी है। देखी जा सकती है, सुनी जा सकती है और गुनी भी। यानि इस पर विचार किया जा सकता है। इससे सीखा जा सकता है। इसकी मिसाल पर अमल किया जा सकता है। 
 

परलोक और पुनर्जन्म को विज्ञान माने या न माने, ज्ञान साक्षात् दिखा देता है

By समीर, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 11/12/2020 - शुक्र, 12/11/2020 - 19:22

परलोक और पुनर्जन्म- दो ऐसी बातें हैं, जिनके बिना धर्म की गहनता को समझना सम्भव नहीं है। विज्ञान या तर्क से इसे न तो साबित कर सकते हैं और न ही ख़ारिज़। विज्ञान हालाँकि मानता है कि पदार्थ और ऊर्जा न पैदा होते हैं, न नष्ट। उनका बस रूपान्तरण होता रहता है। वह ये भी मानता है कि विचार, मनोभाव, विश्वास आदि के साथ मानव शरीर ऊर्जा की प्रक्रिया मात्र है। मानव ऊर्जा क्षेत्र के प्रयोगों में यह देखा जा सकता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

संवेदना : एक कहानी, गाय-बछड़े और दो चादर में छिपी भावनाओं की

By रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 10/12/2020 - गुरु, 12/10/2020 - 15:18

अख़बारों में अक्सर ही छपने वाली छोटी-छोटी कहानियों पर हम में से कितने लोग ध्यान देते हैं? शायद ही कुछ लोग देते हों। बावज़ूद इसके कि इन कहानियों में बड़ी मर्म की बातें लिखी होती हैं। तिस पर इनके पीछे किसी न किसी का हुनर भी तो होता है। कोई ऐसा, जो अपनी पहचान, अपने रचनाधर्म के लिए छटपटा रहा होता है। हम सबके लिए बड़ी शिक्षाएँ इनमें छिपी होती हैं। अपने बच्चों को मार्गदर्शन देने का रास्ता हमें दिखाती हैं। अपने साथ किसी को सुनने, समझने-बूझने  के नुस्खे हमें दे जाती हैं। और न जाने कितना-कुछ होता है, इनमें। ये कहानियाँ बोलती नहीं हैं, पर कहती बहुत-कुछ हैं।

तस्वीर (साभार)

आरबीआई के 10 लाख फॉलोअर्स होना ख़बर तो है, पर सबको ये ख़बर क्यों नहीं है?

By विकास, दिल्ली से, 28/11/2020 - शनि, 11/28/2020 - 12:35

अभी तीन रोज पहले सवेरे से ही फेसबुक के ज़रिए मिली एक ख़बर ने बड़ा बेचैन कर रखा था। आजकल ख़बरें अख़बार से बाद में, फेसबुक और ट्विटर से पहले मिलती हैं। अख़बार तो वैसे भी कोरोना-काल में अपन ने बन्द ही कर रखा है। इसलिए ई-पेपर पढ़ने के लिए मोबाइल सबसे सुविधाजनक बन पड़ता है। जहाँ मर्जी ले जाओ। चाहे तो शौचालय में भी। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

हम खुद मजबूत होंगे, तब ही किसी की मदद कर सकेंगे

By शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 22/11/2020 - रवि, 11/22/2020 - 18:39

अल-सुबह सबसे पहले उठना। देर रात सबसे बाद में सोना। परिवार के एक-एक सदस्य की छोटी से बड़ी, हर चीज का ख्याल रखना। घर के भीतर कब, क्या और कैसे होना है, उस सबका सोचना। उसे करना और कराना। ये पहचान है भारतीय गृहिणी की।

भेदभावविनाशकं खलु दिव्यभाषा संस्कृतम्

By टीम डायरी, 20/11/2020 - शुक्र, 11/20/2020 - 17:14

धर्म, जाति, भाषा के नाम पर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े होने की सूचना-सामग्री अथाह है। समाचार माध्यमों और कथित सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर ऐसा कुछ एक ढूँढ़ने जाएँ, तो सैकड़ों की तादाद हाथ में आती है। पर उसी अँधेरी खोह में कोई टिमटिमाती सी एकाध रोशनी भी कभी मिल जाती है। जैसे यह वीडियाे। इसे किसने बनाया? इसमें दिख रहे कलाकार कौन हैं, कहाँ से हैं?

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

क्या यह वाकई सरकार की ओर से कोरोना योद्धाओं का सम्मान है?

By टीम डायरी, 20/11/2020 - शुक्र, 11/20/2020 - 12:58

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अभी गुरुवार, 19 नवम्बर को एक अहम घोषणा की है। इसके मुताबिक देशभर के चिकित्सा महाविद्यालयों (Medical Colleges) में कोरोना योद्धाओं के बच्चों के दाखिले के लिए एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में कुछ सीटें आरक्षित रखी जाएँगीं। केन्द्र सरकार के काेटे (Central Pool) से ये सीटें दी जाएँगी। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने यह घोषणा की। साथ ही जोड़ा कि सरकार का “यह फैसला उन कोरोना योद्धाओं के सम्मान में एक छोटा सा प्रयास है, जिन्होंने मानवता के लिए जीवन बलिदान कर दिया।”

वैष्णवी द्विवेदी (तस्वीर साभार)

शरद शिव-स्तुति उत्सव

By टीम डायरी, 30/10/2020 - शुक्र, 10/30/2020 - 23:10

शरद पूर्णिमा पर भगवान कृष्ण को खीर का भोग लगाना। वृन्दावन की गोपियों के साथ उनके महारास को याद करना। उन्हें नौका विहार कराना। ये सब साल-दर-साल होता आया है। पर क्या कभी इस अवसर पर भगवान शिव की स्तुति के बारे में सोचा गया? शायद नहीं। या सोचा भी गया होगा तो बहुत कम। भाेपाल, मध्य प्रदेश से वैष्णवी द्विवेदी ने यह सोचा है। शरद पूर्णिमा का उत्सव और शिव की स्तुति। शरद-शिव-स्तुति-उत्सव। भरतनाट्यम के माध्यम से।

डॉक्टर प्रमोद पांडेय (तस्वीर साभार)

‘ग्रामोदय से भारत उदय’ की अवधारणा नानाजी देशमुख की थी, हम उसी से फूटे अंकुर हैं!

By डॉक्टर प्रमोद पांडे, कैलीफोर्निया, अमेरिका से, 30/10/2020 - शुक्र, 10/30/2020 - 17:36

मैं प्रमोद पांडे। वर्तमान में अमेरिका के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में व्याख्याता (Professor) हूँ। हालाँकि मैं मूल रूप से मध्य प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट से ताल्लुक रखता हूँ। वहाँ के नज़दीकी गाँव नकैला में मेरा जन्म हुआ। शुरुआती शिक्षा भी गाँव के सरकारी विद्यालय में ही हुई। इसके बाद मैं उच्च शिक्षा के लिए चित्रकूट आ गया। वहाँ ग्रामोदय विश्वविद्यालय से मैंने अभियांत्रिकी में स्नातक (Bachelor in Engineering) की उपाधि ली। वहाँ की पढ़ाई मेरे जीवन का सबसे अहम मोड़ साबित हुई। यह मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है। 

भारत रत्न नानाजी देशमुख के सहयोगी रहे गोपाल भाई (तस्वीर साभार)

इस वीडियो से वह वज़ह जानते हैं कि नानाजी देशमुख शरदोत्सव के लिए तैयार क्यों हुए?

By गोपाल भाई, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश से, 30/10/2020 - गुरु, 10/29/2020 - 23:32

नानाजी देशमुख ने अगर अपने सहयोगी डॉक्टर भरत पाठक जी को शरदोत्सव के तौर पर अपनी जयन्ती मनाने की सहमति दी तो वह यूँ ही नहीं थी। उसके पीछे उनका ख़ास मक़सद था। मन्तव्य था और इसकी भूमिका भी उनके मन-मस्तिष्क में काफी पहले बन चुकी थी। मुझे याद है, जब नानाजी ने बुन्देलखंड को अपना कार्यस्थल बनाया तो उनके मन में इस क्षेत्र के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता थी। यहाँ की संस्कृति, यहाँ का साहित्य, संगीत, आदि हर चीज में वे रुचि दिखा रहे थे। यह बात 1990 के दशक की शुरुआत की है। तब चित्रकूट में ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की नींव तैयार हो रही थी। उसी दौरान 18,19,20 नवम्बर 1991 को चित्रक

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