कमाल यूँ ही नहीं होते। सालों-साल लगते हैं, उनके होने में। गढ़ने में, बढ़ने में। लेकिन जब होते हैं, तो यक़ीनी तौर पर सालों-साल ही नहीं, मुद्दतों तक याद रखे जाते हैं। हिन्दी सिनेमाई फ़नकार कमाल अमरोही, उनकी बेगम मीना कुमारी और इन दोनों का मिला-जुला शाहकार (रचना) ‘फिल्म पाकीज़ा’ ऐसे ही कमाल हैं। आज, यानि 4 फरवरी को ‘कमाल की पाकीज़ा’ का 50वाँ साल लग गया है, जो 2022 में पूरा होगा। ‘पाकीज़ा’ 1972 में फिल्मी पर्दे पर आई थी।
अभी हाल में एक तस्वीर सामाजिक मंचों (सोशल मीडिया) पर तेजी से प्रसारित हुई। इसमें एक सिंह सामान्य घरेलू सोफे पर बैठा दिखाई दिया। तस्वीर कहाँ की थी, असल थी या गढ़ी हुई, यहाँ ये बहुत मायने नहीं रखता। मायने रखता है, इस तस्वीर के पीछे छिपा सन्देश, जो हमारे काम का हो सकता है। इसीलिए यह सामान्य और सहज हँसी-मज़ाक जैसा दिखने वाला विषय भी #अपनीडिजिटलडायरी के इस लेख का कारण है।
अक्सर कहा जाता है, ‘गहरी नदी का बहाव हमेशा शान्त होता है।’ एकदम सही है। लेकिन क्या इसी ‘कहन’ का दूसरा पहलू ये नहीं है कि शान्ति और स्थिरता गहराई से ही आती है। फिर चाहे वह गहराई पानी की, नदी की हो या फिर व्यक्तित्व की।
मैं, जल, आपका प्राण। मेरी एक घूँट में ही जन्नत का आराम मिलता है। जब आप मुझे पीते हैं तो पानी हो जाता हूँ। जब सूर्य को चढ़ाते हैं, तो जल। मैं पंचमहाभूतों में से एक हूँ, जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। मेरे बिना सब सून है। इसीलिए रहीम कह गए हैं... रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।
क्रिकेट से तो हम में से तमाम लोग वाकिफ़ हैं, लेकिन क्या ‘ब्लॉकेथॉन’ (Blockathon) को जानते-समझते हैं? सम्भव है, क्रिकेट से ताल्लुक रखने वाले कई लोग इससे भी बावस्ता हों। मगर क्या इसमें हम अपने जीवन-संघर्षों के लिए कोई सबक छिपा देख सकते हैं?... ये बहुतों के लिए मुश्किल सवाल हो सकता है। पर सच में, ब्लॉकेथॉन हमारे जीवन-संघर्ष से जुड़ता है। ये हमें उस संघर्ष में टिके रहने का बड़ा गुर सिखाता है।
निश्चित रूप से यह एक बड़ा सवाल है कि हमारा रसूख यानि ‘स्टेटस’ सही मायने में आखिर बड़ा कैसे होता है? हमारा दिल बड़ा होने से या दिमाग चढ़ा होने से?
परसों शाम अस्पताल से लौटते वक्त मन कुछ अंतर्मुखी हो रहा था। जीवन की सभी परिक्षाओं को लेकर मन में उहापोह हो रही थी और दो सवाल उठे। पहला- धार्मिक समाज को इतने अत्याचार क्यों सहना पड़ रहा है? दूसरा- धर्मविरोधी क्या भगवान का अंश नहीं है, तो उसका प्रतिकार क्यों किया जाए? सवाल उठाकर सद्गुरुदेव का ध्यान कर उनके समक्ष निवेदित कर दिए। फिर मन में जो विचार तरंगें प्रकट हुईं, उससे सारा कुहाँसा छँट गया। उन प्रश्नों और उत्तरों को यहाँ डायरी में दर्ज कर रहा हूँ, शायद और किसी भाग्यवान को लाभप्रद सिद्ध हो जाएँ!
अक्सर हम ईश्वर के न्याय पर सवाल उठाते हैं। हमारी यह मनोदशा खास तौर पर उस समय होती है, जब हमें लगता है कि हमारे साथ अन्याय हुआ है। ऐसे मौकों पर हम हमेशा सोचते हैं कि हमने तो कभी किसी के साथ गलत किया नहीं। फिर हमें ही ईश्वर ने तकलीफ़ क्यों दी? हमें औरों से कम क्यों दिया? वहीं दूसरी तरफ जिन लोगों काे हम हमेशा गलत करते देखते हैं, उन्हें सुख भोगते हुए पाते हैं। तब फिर हमारे मन में सवाल उठते हैं कि ईश्वर उन्हें पीड़ित-प्रताड़ित क्यों नहीं करते?
This story was narrated to me by my uncle from the maternal side when I visited him in 2004. After retirement, he chose to stay at Pondicherry. He was old now and like any normal aged person, enjoyed sharing stories and anecdotes with others.
कहने को तो यह एक बोध-कथा है। लेकिन गौर करें तो सम-बोधकथा सी लगेगी। ऐसी जो समान रूप से हमारी भावनाओं, संवेदनाओं को सम्बोधित करती है। सीधे हमको हमसे रू-ब-रू कराती है। हमें बताती है कि हमारी रोजमर्रा की आपाधापी अगर हमसे कोई चूक हो रही है तो वह कहाँ? और उसे अगर हम सुधारना चाहें तो वह कैसे? इसीलिए सुनने लायक बन पड़ी है। एक बार ही नहीं कई बार, बार-बार।
कुछ अच्छी चीजें हमारे अभ्यास में आ जाएँ, उसके लिए यही एक तरीका भी तो है... बार-बार उनसे दो-चार होते रहना!
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