बंगाल भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव था। लिहाज़ा पश्चिमी विचारों से उपजे भूचाल का केंद्र भी वही बना। वहाँ इसका प्रभाव पहले बंगाली राष्ट्रवाद के रूप में दिखा। इस प्रक्रिया में जो शुरुआती दो व्यक्तित्व उभरे, वे थे- हेनरी डेरोज़ियो और राममोहन रॉय। डेरोज़ियो (1809-1831) यूरोशियाई थे। वे 17 साल की उम्र में ही कुछ अच्छी रूमानी कविताओं के ज़रिए कलकत्ता के बौद्धिक वर्ग में लोकप्रिय हो चुके थे। कुछ समय बाद वे हिंदु महाविद्यालय के सहायक-प्राचार्य बन गए। उनके प्रभाव में बंगाली मध्य वर्ग के युवाओं ने ख़ास तौर पर फ्रांसिस बेकन, ह्यूम और थॉमस पेन जैसे यूरोपीय रचनाकारों को पढ़ा। वह भी इस
आसमान में जब भी देखा, एक नहीं हजार आकार नजर आए। भिन्न-भिन्न प्रकार के। किसी ने उनके हू-ब-हू चित्र बना दिए। किसी ने मिट्टी से गढ़ दिया इन आकारों को। किसी ने देखकर छोड़ दिया। कुछेक ने ऊपर आसमान देखा नहीं और किसी को कुछ दिखा ही नहीं। ----
पश्चिम ने मुख्य रूप से दो साधनों से भारतीय साहित्य पर असर छोड़ा। पहला- छापाखाने की व्यवस्था और दूसरा- अंग्रेजी भाषा की शिक्षा से। हालाँकि अंग्रेजों से पहले भारतीय भाषाओं में गाथागीत, लोकगीत, रचनाओं के रूपांतर आदि की साहित्यिक परंपराएँ थीं। ये तमाम रचनाएँ या तो संस्कृत में थीं या अरबी, फारसी में। उस समय ये बौद्धिक वर्ग की भाषाएँ थीं। इसके बाद जब भारतीय लोग पश्चिमी भाषा, विचार आदि के संपर्क में आए तो उन्हें लगा कि देशज भाषाओं में उनके विचारों को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्दकोष नहीं है। इससे नव-शिक्षित भारतीयों की स्वाभाविक रुचि अंग्रेजी भाषा, साहित्य की तरफ़ हुई। वे अंग्रे
अंग्रेजों से पहले हिन्दुस्तान में कलात्मक गतिविधियाँ मुख्य रूप से राजदरबारों तक सीमित थीँ। लेकिन मुग़लिया सल्तनत के पतन के बाद दरबारी चित्रकार, कलाकार बेकार हो गए। लिहाज़ा, उन्होंने संरक्षण की आस में अंग्रेजों के ठिकानों की तरफ़ रुख़ किया। लेकिन यहाँ भारतीय कलाकारों, चित्रकारों की सफलता दो कारकों पर निर्भर थी। पहला- अंग्रेजों के पास उन्हें अपने पास रखने का कोई कारण हो। दूसरा- कलाकार अपने नए संरक्षकों की ज़रूरतों और तकनीकों को समझें। उन्हें अपनाने के लिए तैयार हों। हिंदुस्तानी कलाकारों ने यह लचीलापन दिखाया भी। हालाँकि एक और कारण था, जो अंग्रेजों को भारतीय कलाकारों के संरक्षण के
वैसे तो ऐसे नाक़ारा देशभर में मिल जाएँगे, लेकिन इन दिनों मध्य प्रदेश में ये कुछ ज़्यादा ही पाए जा रहे हैं। अख़बार आए दिन ऐसे नाक़ारा लोगों की ख़बरों से भरे पड़े हैं। जिधर देखो, उधर कोई न कोई छोटा-बड़ा अफ़सर रिश्वत लेते पकड़ में आ रहा है। खलबली मची हुई है। पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लग रहे हैं। अब जितने मुँह, उतनी बातें...
“वाक़ई बड़ी शर्म की बात है। ऐसे ही लोगों की वज़ह से हमारी पूरी बरादरी बदनाम हो जाती है।”
भारत में ब्रिटिश सरकार की गतिविधियाँ जाने-अनजाने ऐसे साधन मुहैया करा रही थीं, जिससे हिंदुत्व मजबूत हुआ और कुछ कम सही पर इसलाम भी। जैसे, सरकार ने बड़े पैमाने पर संस्कृत और अरबी साहित्य का अनुवाद कराया। ताकि वह इन धर्मों के नियम, क़ायदों, परंपराओं आदि को समझ सके। लेकिन अनुवाद की क़वायद का लाभ आम हिंदुओं, मुसलिमों को भी मिला। ईसाइयत और उसकी शिक्षा ने जो चुनौती पेश की, उसका भी हिंदु, मुसलमानों पर पर्याप्त असर दिखा। यह असर समाज सुधार आंदोलनों के रूप में सामने आया।
बुद्ध बड़े मनोवैज्ञानिक व्यक्ति हैं। उन्होंने मनुष्य के मन को समझा और पाया कि मनुष्य हर समय पाप-पुण्य के फेर में पड़ा रहता है। इसलिए उन्होंने अंत:करण शुद्धि पर पूरा जोर दिया। इस अंत:करण शुद्धि के लिए बुद्ध नैतिक आचरण की उदात्तता के पालन का उपदेश देते हैं।
भारतीय शिक्षा प्रणाली के बारे में मैकॉले के जो विचार थे उनका सारांश जानना दिलचस्प हो सकता है। वे लिखते हैं, “सरकार के रूप में हमारे पास धन है। इसे हम इस देश के लोगों के बौद्धिक विकास में लगाएँगे। पर सवाल ये है कि इस धन को लगाने का सबसे उपयोगी तरीका क्या हो? इस देश के लोग जो बोलियाँ बोलते हैं, उनमें न कोई साहित्यिक अंश है, न वैज्ञानिक। वे इतनी तंग और उजड्ड हैं कि उनके साहित्य का अनुवाद तक मुश्किल है। इसीलिए सवाल ये अहम सवाल है कि लोगों को सिखाने-पढ़ाने की भाषा क्या हो?
अंग्रेजों को लगा था कि भरतीय समाज के शीर्ष वर्गों को अगर बदल दिया जाए तो वे समय के साथ बाकी जनता को भी बदलेंगे। शुरुआती वर्षों में इस आशावाद को सही ठहराने का आधार भी था। हजारों भारतीय नए विद्यालयों में दाखिला ले रहे थे। कोलकाता बुक सोसायटी ने दो साल में अंग्रेजी की 30,000 से ज़्यादा किताबें बेच ली थीं। सरकारी शिक्षण संस्थानों में धर्म, जाति के भेद के बिना सबके लिए अंग्रेजी शिक्षा उपलब्ध थी। हालाँकि, हिंदुओं में ब्राह्मण स्वाभाविक रूप से सबसे ज़्यादा इस सुविधा का लाभ उठा रहे थे। वहीं, मुसलिमों में उतने ही स्वाभाविक तौर पर नई शिक्षा के लिए ज़्यादा उत्साह नहीं था। बल्कि कलकत्ता
उस दौर में अंग्रेजी शिक्षा के लिए न सिर्फ भारतीयों, ख़ास तौर पर बंगाल में, उत्कट इच्छा दिख रही थी। ब्रिटेन के सुधारकों, राजनीतिक विचारकों का प्रभाव भी इसके पीछे था। जाने-माने मिशनरी डॉक्टर डफ ने इस बारे में लिखते हैं, “कलकत्ता में पश्चिमी शिक्षा के लिए जोश अटूट था। लोगों ने इसके लिए सड़कों पर हमारा पीछा किया। हमारी पालकियों के दरवाज़े खुलवाए। वे लगातार हमारे सामने अपनी दलीलें इस तरह पेश करते रहे कि उन्हें सुनकर पत्थर भी पिघल जाए।” हालाँकि पत्थर पहले ही पिघल चुका था। उस समय लॉर्ड विलियम बेंटिंक कई सुधारों में लगे हुए थे। लिहाज़ा, इसी रौ में उन्होंने लोकशिक्षण समिति को पत्र लिख