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महामारी सिर्फ वह नहीं जो दिखाई दे रही है!

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 2/10/2021 - शनि, 10/02/2021 - 23:53

हम सब स्तब्ध हैं। निशब्द हैं। दिमाग़ पंगु हो गया है। यदि कोई इस समय ज़रूरी मुद्दे या काम की बात कर ज्ञान-विज्ञान, समाज, संस्कृति, राजनैतिक बिन्दुओं आदि पर अपनी पारंगतता दर्शाता है, तो माफ़ कीजिए वह मनुष्यता की सीमा से परे हो चुका है। ---- अभी-अभी हमने सड़कों पर छाले लिए चलती लाशों के हुज़ूम देखे हैं। गर्भवती, धात्री एवं सद्य प्रसूताओं के साथ नवजात शिशुओं को देखा है। वे किसी कारवाँ में चल रहे थे। हमारे देखते-देखते तड़प कर गिर पड़े। उनकी इहलीला समाप्त हो गई। -----

भारत की मुक्ति के लिए आज क्यों गाँधी जी के उद्धार की ज़रूरत है?

By समीर, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 2/10/21 - शनि, 10/02/2021 - 21:21

गाँधी जी भारत की तरह चिरन्तन हैं। वे भारत की महानता, बल, कमजोरी, सीमाएँ और सम्भावनाओं के प्रतीक हैं। जयन्ती के बहाने एक बार फिर हम उनकी और अपनी हक़ीक़त का जायज़ा लेने का प्रयास करते हैं। 

स्वातंत्रोत्तर मुख्यधारा के इतिहास में गाँधी जी भारतीय गणराज्य के नैतिक, संवैधानिक और राजनीतिक मूल्यों के स्रोत के रूप में अवतरित होते हैं। वे युगपुरुष हैं, जिनमें अपने देश-काल के धर्म, नीति और राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति की विहंगम दृष्टि और समझ है। समकालीन समाज को दिशा देने का प्रबल पुरुषार्थ है। 

कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल का डिज़ाइन किसने बनाया था?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 30/9/2021 - शनि, 10/02/2021 - 00:04

बग़ावत के बाद भी अंग्रेज प्रशासकों, सैनिकों, सैन्य अफ़सरों आदि ने अपने पूर्ववर्तियों की साहित्यिक परंपरा जारी रखी। इनमें ज़्यादातर लोगों की कृतियाँ इतिहास और प्रशासन पर केंद्रित थीं। डब्ल्यूडब्ल्यू हंटर का नाम इनमें प्रमुख है। उन्होंने भारतीय इतिहास को खँगाला। मौलिक दृश्यों से भी तत्त्व निकाले। ऐसे ही, जॉर्ज ओट्‌टो ट्रेवेलियन की पुस्तक ‘कॉम्पटीशन-वल्लाह’ (1864)। इसमें 1857 की क्रांति के बाद के माहौल का चित्रण-विवरण है। अंग्रेज अफ़सरों में कुछ अपनी विशिष्ट शैली में लिखते थे। जैसे- एसएस थोरबर्न। उनकी किताब- ‘मुसलमंस एंड मनीलेंडर्स’ 1886 में आई। यह पंजाब प्रांत पर केंद्रित थी। म

भाषा अधिकारी बर्ख़ास्त...उसने समझने लायक अनुवाद कर दिया था!

By ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 30/9/2021 - गुरु, 09/30/2021 - 21:09

सरकार ने अपने एक भाषा अधिकारी को बर्ख़ास्त कर दिया। इस अधिकारी का क़सूर केवल यह था कि उसने एक अनुवाद करते समय ऐसी हिन्दी लिख दी कि दिमाग़ पर थोड़ा जोर देने से वह समझ में आ गई थी। इसलिए हिन्दी अधिकारियों और भाषा अधिकारियों को लज्जित करने वाले इस अक्षम्य अपराध को गम्भीरता से लेते हुए उसे तुरन्त नौकरी से हटाने के निर्देश दे दिए गए। 

भारतीय स्मारकों के संरक्षण को गति देने वाले वायसराय कौन थे?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 29/9/2021 - गुरु, 09/30/2021 - 11:43

सन् 1857 का विद्रोह ने भारतीय और भारत में रह रहे ब्रिटिश समुदाय के बीच खाई पैदा कर दी थी। हालाँकि कई जगहों पर अंग्रेज अधिकारी और सैनिक भारतीयों से संबंध बनाकर चल रहे थे। लेकिन ये औपचारिक ही थे। भारतीय संस्कृति में दिलचस्पी रखने वाले अंग्रेज अफ़सरों की संख्या तो नगण्य ही थी। सरकारी नौकरी या न्यायिक ढाँचे में भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की हर कोशिश का अब अंग्रेज विरोध कर रहे थे। भारतीयों में बढ़ती राष्ट्रीयता की भावना और सांप्रदायिक हिंसा ने उनका भय बढ़ा दिया था। 

क्या अंग्रेज भारत को तीन हिस्सों में बाँटना चाहते थे?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 28/9/2021 - गुरु, 09/30/2021 - 01:12

मई 1944 में महात्मा गाँधी को उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के आधार पर जेल से रिहा किया गया। बाहर आते ही उन्होंने सबसे पहले मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना से बातचीत की। लेकिन इस वार्ता का कोई नतीज़ा नहीं निकला। फिर मार्च 1945 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वॉवेल नए प्रस्ताव के साथ लंदन से भारत लौटे। इसके मुताबिक वायसराय की कार्यकारी परिषद में अब सिर्फ़ भारतीय सदस्य रहेंगे। बस, कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर। परिषद के सदस्य सभी राजनैतिक दलों से होंगे। इसमें हिंदु, मुसलमानों का बराबर प्रतिनिधित्व होगा। इस प्रस्ताव पर बातचीत के लिए जून 1945 में शिमला सम्मेलन हुआ। मग़र इसमें कोई नतीज़ा नहीं निकला

ब्रिटिश भारत में कांग्रेस की सरकारें पहली बार कितने प्रान्तों में बनीं?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 27/9/2021 - बुध, 09/29/2021 - 19:40

मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार में प्रावधान था कि हर 10 साल में इसके परिणामों की समीक्षा होगी। इसी के मुताबिक ब्रिटेन की रूढ़िवादी (कंज़रवेटिव) सरकार ने 1927 में सर जॉन साइमन की अगुवाई में आयोग बनाया। अगले साल यह आयोग भारत आया। लेकिन राष्ट्रवादी नेताओं ने उसका बहिष्कार कर दिया। फिर भी उसने रिपोर्ट तैयार की जो 1930 में जारी हुई। इसी बीच ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बन गई। उसने हिंदुस्तान के तत्कालीन वायसराय को लंदन बुलाया। उन्होंने भारत लौटकर ऐलान किया कि भारत को स्वतंत्र-उपनिवेश का दर्जा मिलेाग। यह भी घोषणा की कि लंदन में जल्द एक सम्मेलन होगा। इसमें भारत के सभी क्षेत्रों क

“गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास”

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 28/9/2021 - मंगल, 09/28/2021 - 22:48

 

बुद्ध की विशेषता है कि वे एकदम उपदेश देना शुरू नहीं कर देते। घूमते-फिरते बैठे सामान्य पर्यावरण में सहज होकर मित्रवत् बातें करते हुए अपने उपदेशों का कथन कर देते हैं। इसी कारण बुद्ध सरल हैं, बोधगम्य हैं। 

ऐसे ही बुद्ध एक बार श्रावस्ती के जैतवन में भ्रमण कर रहे थे। उस अवसर पर मालुंक्यपुत्त ने बुद्ध से संसार के शाश्वत - अशाश्वत, जीव, देह की भिन्नता, अभिन्नता आदि के बारे में प्रश्न पूछे। 

भारत में धर्म आधारित प्रतिनिधित्व की शुरुआत कब से हुई?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 26/9/2021 - मंगल, 09/28/2021 - 11:37

ब्रिटेन की सरकार ने 1858 में भारत का शासन अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद ब्रिटिश शासन के तहत आने वाली 500 से ज़्यादा रियासतों की सीमाएँ निश्चित कर दी गईं। बदले में इन रियासतों को ब्रिटिश सरकार की रहनुमाई स्वीकार करनी पड़ी। ऐसे ही, भारत सरकार लंदन में बैठे ब्रिटेन के गृह मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट्स) के अधीन हो गई। वहाँ 1858 में ही एक कानून के जरिए भारतीय परिषद (काउंसिल ऑफ इंडिया) बनाई गई। इसमें भारत में काम का अनुभव रखने वालों को शामिल किया गया। यह गृह मंत्री की सलाहकार परिषद थी। चूँकि तब

भारत में 1857 की क्रान्ति सफल क्यों नहीं रही?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 25/9/2021 - सोम, 09/27/2021 - 00:20

अंग्रेज भारतीय समाज को नैतिक और राजनैतिक रूप से अपनी सुविधानुसार बदलना चाहते थे। उनके इन प्रयासों ने भारत की परंपरागत सामाजिक व्यवस्था को झिंझोड़ दिया था। परंपराओं से लगाव रखने वाला वर्ग ख़ासा असंतुष्ट हो चुका था। यह असंतोष आख़िरकार 1857 के विद्रोह के रूप में सामने आया। उस समय हिंदुस्तान के वायसराय लॉर्ड डलहौजी थे। उनकी इच्छा थी कि जितना हो सके, छोटे-मोटे सामंतों को हटाया जाए। उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य का हिस्सा बनाया जाए। वह बड़ी रियासतों को भी अंग्रेजों की केंद्रीय सत्ता की अधीन, नाममात्र की आज़ादी देकर रखना चाहते थे। उन्होंने यह योजना बेहतर शासन संचालन के लिए बनाई थी। लिहाज़

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