भारत सरकार अधिनियम-1919 में प्रावधान था कि हर 10 साल में इसकी समीक्षा होगी। इसी के मुताबिक 1927 में एक आयोग बना, जो नवंबर में भारत पहुँचा। ब्रिटिश सरकार ने इसे सोच-समझकर दो साल पहले गठित किया। कारण कि ब्रिटेन में 1929 में चुनाव होने थे। उसमें लेबर पार्टी के जीतने की संभावना थी। लेबर पार्टी भारत को ‘स्वराज का अधिकार’ देने की पक्षधर थी। लिहाज़ा तत्कालीन रूढ़िवादी सरकार के गृह मंत्री ने लॉर्ड बिरकेनहैड ने आयोग के ज़रिए संदेश देने की कि वे भी भारत के पक्ष में सोच रहे हैं। जबकि इन्हीं बिरकेनहैड ने ब्रिटिश संसद में 1919 के सुधारों का विरोध किया था। बहरहाल, नए आयोग के गठन का समर्थन
दिसंबर 1916 में इंग्लैंड में रुढ़िवादियों की सरकार बनी। लेकिन प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज उदारवादी थे। उन्होंने अगले साल जुलाई में एडविन मॉन्टेग्यू को गृह मंत्रालय में भारत से जुड़े मामले देखने के लिए, खास तौर पर तैनात किया। वे भी उदारवादी थे। उन्होंने 20 अगस्त 1917 को संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कॉमंस’ में घोषणा की, “भारत के संबंध में हमारी सरकार की नीति ये है कि शासन-प्रशासन की सभी शाखाओं में भारतीयों को ज्यादा से ज्यादा सहभागी बनाया जाए। भारत की स्वशासी संस्थाओं का विकास किया जाए। भारत की उत्तरदायी सरकार ब्रिटिश साम्राज्य अविभाज्य हिस्सा है। लिहाज़ा इस दिशा में जो कदम ज़रूरी है
ब्रिटेन में 1906 में बनी उदारवादी सरकार मानती थी कि भारतीयों की माँगों का समाधान करना होगा। इसलिए उसने तय किया कि भारत में अप्रत्यक्ष शासन की व्यवस्था करनी चाहिए। तब ब्रिटेन में गृह मंत्री जॉन मॉरले थे। इधर भारत में लॉर्ड मिंटो (1905-1910) वायसराय बन चुके थे। मिंटो मानते थे कि सिर्फ़ भारतीय मध्यम वर्ग की भावनाओं/इच्छाओं का ख्याल रखते हुए बदलाव नहीं करने चाहिए। भारतीय राजा-महाराजाओं की परिषद भी गठित करनी चाहिए। ताकि कांग्रेस से अलग राय भी सरकार को मिले। उधर, मॉरले के दिमाग में यह बिलकुल नहीं था कि अभी भारत में ब्रिटेन की तरह संसदीय संस्थाएँ होनी चाहिए। लिहाज़ा, 1909 में जब
‘न्यूटन’ फिल्म में अभिनेता राजकुमार राव दूरस्थ आदिवासी गाँव में चुनाव करवा रहे हैं। वे बूथ पर अपने सहयोगियों से पूछते हैं कि क्या वे निराशावादी हैं? ये सवाल जब वे अभिनेत्री अंजलि पाटिल से पूछते हैं तो वे जवाब देती हैं, "नहीं सर मैं आदिवासी हूँ" और राजकुमार राव चुप हो जाते हैं। इस ज़वाब का क्या मतलब है? यही कि जो जल, जंगल, ज़मीन पर निर्भर है, जिसने प्रकृति से जीवन को जोड़कर अपने को दुनिया से मुक्त कर लिया है, जिसने न्यूनतम साधनों से जीवन की लय को जोड़कर मस्त रहना सीख लिया है, वह निराशावादी हो नहीं सकता। कबीर कहते हैं, "जब मन मस्त हुआ तो फिर क्या बोले।" आशा यहीं से उपजती है। ---
साल 1905 में अंग्रेजी सरकार ने बंगाल का विभाजन कर दिया। इसका मक़सद बताया, प्रशासन की कार्यकुशलता बढ़ाना। लेकिन इससे भारतीय शिक्षित वर्ग में संदेश गया कि सरकार उनके विचारों की अनदेखी का इरादा रखती है। इस बारे में सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने लिखा था, “हमें लगता हैं, जैसे हमारा पूरा भविष्य दाँव पर है। बंगालीभाषी समाज के लिए बढ़ते समर्थन और उसमें बढ़ती आत्म-चेतना, व्याकुलता के मद्देनज़र जानबूझकर आघात किया जा रहा है।” उस दौर में एक पूर्व नौकरशाह थे, रोमेश चंद्र दत्त। साल 1900 के आसपास वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे। उन्होंने तब वायसराय लॉर्ड कर्जन को खुले आलोचनात्मक
हम मसख़रों पर हँस सकते हैं, लेकिन उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। क्योंकि इसका मतलब होगा, देश की पूरी राजनीति और लोकतंत्र को ख़तरे में डाल देना। याद रखें, उन्हें लोकतंत्र को गाहे-बगाहे ख़तरे में डालने का अधिकार है, हमें नहीं। तो हम क्या करें?
एक मसख़रे से बात ही कर लेते हैं।
आप मसख़रे होकर भी राजनीति में हैं?
जब भी बुद्ध को पढ़ता हूँ तो पाता हूँ, आधुनिक भारत के बौद्ध व्याख्याकारों और बौद्धधर्मियों ने बुद्ध को सनातन के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ भारतीय भूमि से जन्मा बुद्ध धर्म धीरे-धीरे अपनी ही धरती से अलग हो गया। जबकि बुद्ध तो मूल रूप से सनातन के अतिकर्मकांडो की श्रृंखलाओं के परिहार के लिए खड़े हुए थे, बस।
ऐसे ही एक उल्लेखनीय ब्रिटिश विचारक-प्रशासक थे, अलफ्रेड लॉयल। वे अप्रत्यक्ष शासन प्रणाली के समर्थक विचारों के प्रवक्ता थे। उन्होंने और उनके जैसे अन्य लोगों ने पूरे दिल से स्टीफन और स्ट्रेची के विचारों को अपनाया। बस एक फ़र्क था कि लॉयल राजनीतिक अधिकारों को प्रयोग में लाने के लिए ताक़त और सेना के इस्तेमाल के पक्षधर नहीं थे। वे न दूसरे देशों के समाजों के पश्चिमीकरण के पक्ष में थे और न ऐसी राजनीतिक संस्थाएँ उन पर थोपने के, जिनका मूल स्थानीय परम्पराओं में न हो। उनका मानना था कि पश्चिमी सभ्यता का हिंदुस्तान पर असर ये होना था कि भारतीय समाज के बंध खुल जाएँ। उनका कहना था, “हम (अंग्र
स्टीफन का दृष्टिकोण व्यावहारिक था। सिद्धांतों की उन्होंने ज़्यादा परवाह नहीं की। उन्होंने कानून के सामान्य ढाँचे को आकार दिया। जहाँ विशिष्ट किस्म की ख़ामियाँ देखीं, वहाँ उनके समाधान भी सुझाए। अपने पूर्ववर्तियों की तरह वे भी ग्रामीण समुदाय के मौज़ूदा ढाँचे की ‘जड़ता’ को तोड़ना चाहते थे। उन्होंने लिखा था, “यह तथ्य है कि ग्रामीण समुदाय के संस्थानों में, वे चाहे कहीं के भी हों, सदियों से बहुत मामूली बदलाव ही आया है। इससे साबित होता है कि भारतीय समुदाय भी सदियों से ठहरी हुई अवस्था में है। यह स्थिति संपदा, बौद्धिकता, राजनीतिक अनुभव और नैतिक तथा बौद्धिक परिवर्तनों के अनुकूल नहीं है।
विद्रोह के बाद भारत की सरकार की कार्यशैली और उसकी सोच भी बदली थी। पहले यह यक़ीन हुआ करता था कि अंग्रेजों और भारतीय मध्यवर्ग के बीच कामकाजी समन्वय, सहयोग की स्थिति बन जाती है तो सुधार भी तेज हो सकते हैं। लेकिन बग़ावत ने इस यक़ीन का अंत कर दिया। अब उन कानूनों का स्वरूप भी बदला जाने वाला था, जो 1860-70 के दशक में बनाए गए थे। ये अब आक्रामक होने वाले थे। यह नई कार्यशैली पंजाब में लागू व्यवस्था से मिलती-जुलती थी। कठोर और हर चीज को अपनी बपौती मानने वाली। सरकार की कोशिश थी कि अब अधिक सक्षम, आधुनिक शासन-व्यवस्था लागू की जाए। इसे विशेषज्ञ संचालित करें, जो संहिताबद्ध नियम-कानून से लैस