सन् 1857 की क्रांति के बाद भारतीय अधिक संख्या में समाज सुधार कार्यक्रमों की माँग करने लगे थे। हालाँकि यह माँग भारतीय समाज सुधारकों से ही थी। इस पृष्ठभूमि में राजा राममोहन रॉय द्वारा स्थापित ‘ब्रह्म समाज’ के बड़े नेता देबेंद्रनाथ टैगोर क्रमिक सुधार के पक्षधर थे। उन्होंने 1867 में लिखा था, “हमें हिंदु शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के आलोक में अपनी परंपराओं, रीति-रिवाज़ों, समारोहों का शुद्धिकरण करना है। लेकिन यह सावधानी भी बरतनी है कि सामाजिक बदलाव की गति बहुत तेज न हो। नहीं तो हम उसी वर्ग से अलग हो जाएँगे, जिसका हमें उन्नयन करना है।” लेकिन ‘ब्रह्म समाज’ के युवा कार्यकर्ता इस दृष
किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ भी नहीं मिलेगा। मेरे से लेकर तुम्हारे अतीत तक इतना कीचड़ है कि हम यह पूरी धरती 10 बार ढाँक सकते हैं। इसलिए बस वर्तमान में रहें, जब भी किसी से मिलें मुस्कुरा दें- अपना और उसका वही चेहरा ज़ेहन में रहे, जो अभी साँस ले रहा है। थोड़ा भी दिमाग़ पर जोर डालेंगे तो दिक्क़त होगी।
उस समय एक मिशनरी थे विलियम एडम। उन्होंने सरकार के कहने पर बंगाल और बिहार में शिक्षा की स्थिति पर कई रपटें तैयार की थीं। उन्होंने 1835 में महिलाओं की शिक्षा के मामले में कहा था, “विशुद्ध और असहाय अज्ञानता की स्थिति है।” उनके मुताबिक हिंदु महिलाओं में अंधविश्वास था कि जो लड़की पढ़ना-लिखना सीख जाएगी, वह शादी के तुरंत बाद विधवा हो जाएगी। इस अंधविश्वास को “पुरुषों ने हतोत्साहित भी नहीं किया।” अधिकांश पुरुषों का मानना था कि महिलाओं की जगह घर के भीतर है। उन्हें सिर्फ़ घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ी शिक्षा की ज़रूरत है। वह घर में ही मिलनी चाहिए।
कर्ज़न के सुधारों से पहले विश्वविद्यालयों की प्रबंध समितियों (सीनेट) में अधिकांश निजी और आधिकारिक रसूख वाले लोग होते थे। ये समिति भारी-भरकम भी थीं। जैसे- कलकत्ता में विश्वविद्यालयों की प्रबंध समिति में 180 सदस्य थे। वहीं बंबई की समिति में 310 सदस्य। इन समितियों के सदस्यों का अकादमिक स्तर भी संदिग्ध था। बंबई में विश्वविद्यालय के कई अध्येता (फैलो) अपने नाम के दस्तख़त करना तक नहीं जानते थे। सबसे गंभीर शिकायत ये थी कि विश्वविद्यालय शिक्षण संस्थान नहीं हैं। वहाँ संबद्ध महाविद्यालयों के विद्यार्थी सिर्फ़ परीक्षा देने बैठते थे। इन विद्यार्थियों का भी स्तर कैसा था, इसका एक उदाहरण
वायसराय लॉर्ड कर्ज़न (1899-1905) ने सितंबर 1901 में शिमला सम्मेलन आयोजित किया। इसमें भारत की शिक्षा-व्यवस्था पर विचार हुआ। हालाँकि सरकारी अफसरों, शिक्षा अधिकारियों के अलावा किसी भारतीय ने इसमें हिस्सा नहीं लिया। वायसराय ने इसकी अध्यक्षता करते हुए लंबा भाषण दिया। शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी नीतियों का ब्यौरा दिया। कुछ नीतियों की आलोचना भी की। यह भी उल्लेख किया कि तकनीकी विद्यालय स्थापित करने की योजना लागू नहीं की जा सकी क्योंकि भारतीय समाज के मध्य और उच्च वर्गों में उत्साह नहीं दिखा। हालाँकि सरकार को भी डर रहा कि तकनीकी शिक्षा से बेरोजगारी बढ़ सकती है। उनके मुताबिक, जो तकन
सर जॉर्ज कैंपबेल 1874 में बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। उन्होंने वहाँ की शिक्षा नीति पर एक रपट तैयार की। इसमें लिखा, “ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की मदद से विद्यालयों की स्थापना के लिए आम जन और ग्राम समितियों को आमंत्रित किया जाता है। योजना गाँवों को ऐसे शिक्षक उपलब्ध कराने जुड़ी है, जो विद्यालयों को कार्यकुशलता से स्थानीय शैली के मुताबिक चला सकें। इस काम के लिए उन्हें मिलने वाली सरकारी आर्थिक सहायता बहुत कम है। महीने में दो, तीन या चार रुपए ही।…पर ये भी तय है कि यह छोटी सी सरकारी आर्थिक सहायता बहुत दूर तक जाएगी। नई योजना का संतोषजनक पहलू ये है कि इसे हिंदु, मुसलिम दोनों
भारत के लोगों के स्वास्थ्य के प्रति सरकार का रुख़ ब्रिटेन से प्रेरित था। दरअसल अंग्रेज फौजियों की मृत्यु दर तब बहुत ज़्यादा थी। इसके मद्देनज़र फ्लोरेंस नाइटिंगेल (ब्रिटेन की समाज सुधारक और आधुनिक नर्सिंग की संस्थापक) ने ब्रिटिश सरकार को मज़बूर किया कि वह सैन्य ठिकानों में साफ-सफाई की जाँच कराए। इसी क्रम में भारत में भी जाँच का फैसला किया गया। लिहाज़ा मई 1859 में ब्रिटेन सरकार ने एक आयोग बनाया। लेकिन इस आयोग ने लंदन में बैठे-बैठे ही सतही रायशुमारी के आधार पर रिपोर्ट दी। ब्रिटेन सरकार ने नाइटिंगेल से इस पर विशेषज्ञ राय माँगी। उन्होंने राय दी भी लेकिन सरकार ने रिपोर्ट प्रकाशित नह
प्राचीन काल में काशी राज्य पर ब्रह्मदत्त नाम के राजा राज्य करते थे। कहते हैं, उन्हीं के समय में एक पहाड़ी पर बोधिसत्त्व (बुद्ध) ने वृक्ष के रूप में पुनर्जन्म लिया। वे आसपास के क्षेत्रों में रहने वालों के आचार-विचार पर ध्यान रखते थे। उसी पहाड़ी के पास घाटी में एक गुरुकुल था। एक विद्वान पंडित वहाँ के आचार्य थे। वे अपने कुछ शिष्यों के साथ गुरुकुल में रहते थे। एक बार अनजाने में आचार्य से कोई पाप हो गया। उस पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने एक व्रत रखने का निश्चय किया। उस व्रत के नियम के अनुसार उन्हें एक बकरे की बलि देनी थी। इसलिए आचार्य ने किसी धनी व्यक्ति से एक बकरा माँगा। ब
भारत के बड़े समाचार चैनल में काम करने वाली युवा पत्रकार सौम्या सिंह ने अभी ही नौकरी छोड़ी है। वैसे, यह कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन सोशल मीडिया (LinkedIn) पर उन्होंने नौकरी छोड़ने की सूचना देते हुए जो लिखा, वह ज़रूर बड़ी बात है। सौम्या ने लिखा, “मैंने नौकरी के साथ ज़हरीला वातावरण भी छोड़ दिया है।.. अब मैं बहुत राहत महसूस कर रही हूँ।” इसके बाद उनके जानने वालों ने उन्हीं के अन्दाज़ में उन्हें बधाइयाँ दीं। हालाँकि यह कोई इक़लौता उदाहरण नहीं है। ... क़रीब 70 फ़ीसद लोग ऐसे ही कारणों से और बेहतर विकल्पों के लिए इस्तीफ़ा देने को तैयार हैं।
ब्रिटिश भारत में 1858 से पहले कई बार अकाल, भुखमरी, महामारी आदि की स्थितियाँ बनीं। उनसे बड़े बेतरतीब तरीके से निपटा गया था। साल 1866-67 तक ये हाल रहा। उसी साल पूर्वी भारत में भयंकर अकाल पड़ा। ओडिशा में व्यापक असर हुआ। इसकी गंभीरता को देर से पहचाना गया। स्थिति अनियंत्रित हो गई। बारिश शुरू होने से तमाम रास्ते बंद हो गए। इससे ओडिशा के लिए ज़रूरी चीजों की आपूर्ति ठप हो गई। नतीज़ा ये हुआ कि करीब एक तिहाई आबादी भूखमरी, महामारी से जान गँवा बैठी। सरकार ने बारिश के बाद प्रभावित इलाकों में खाद्यान्न पहुँचाया लेकिन तब तक देर हाे चुकी थी। पहले की तरह इसकी भी जाँच हुई। जाँच रिपोर्ट देखने क