औद्योगिक विस्तार में सरकार की भूमिका 1914 से पहले महज निजी पूँजी और उद्यमों को प्रोत्साहन देने तक सीमित थी। वह भी ख़ास यूरोपीय कारोबारियों के लिए। सरकार ने 1905 में वाणिज्य विभाग स्थापित किया था। मग़र इसके प्रभाव बाद में नजर। इसके बाद पहला औद्योगिक आयोग 1916 में बना, जिसकी रपट सालभर बाद आई। इसमें कहा गया कि भारत “अब भी बने-बनाए उत्पादों के बजाय मुख्य रूप से कच्चे माल का उत्पादक ही है।” इस बीच, प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के दौरान भारत को हथियार उत्पादन के अलावा अन्य क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत पर सरकार का ध्यान गया। इस बारे में 1921 के राजकोषीय आयोग ने भी अनुशंस
भारत में उद्योगों का विस्तार मुख्य रूप से पूँजी के अधिग्रहण और रेलवे के फैलाव पर निर्भर रहा। यहाँ रेलवे की आधारशिला 1858 से पहले ही रख दी गई थी। सन् 1869 तक पूरे देश में 4,000 मील लंबे रेल पथ पर रेलें चलने लगी थीं। यह सब कुछ निजी पूँजी के बलबूते हुआ। हालाँकि सरकार ने रेल परियोजनाओं में पैसा लगाने वालों को गारंटी दी थी कि उन्हें पाँच फीसदी ब्याज की दर से मुनाफ़ा वापस मिलेगा। यह भरोसा देने का मकसद ये था कि ज़्यादा से ज़्यादा निवेश आकर्षित किया जा सके। सरकार ने अपनी गारंटी के बदले रेल संचालन और उस पर व्यय आदि का नियंत्रण अपने हाथ में रखा। रेलों से डाक और सेना की आवाजाही की सुवि
बहुत पुरानी बात है। बोलपुर (पश्चिम बंगाल) के स्टेशन पर आधी रात थी। छोटा सा स्टेशन और मुसाफ़िरख़ाने में सात-आठ यात्री इन्तज़ार कर रहे थे। झपकी ऐसी लगी कि मेरा सहयात्री मुझे जगाता रहा पर मैं नहीं जागा। वह चला गया, सदा के लिए। कुछ यात्राएँ कभी पूरी नहीं होतीं। वे भीतर ही भीतर चलती हैं। वे छोड़ती नहीं अपना दारुण्य और वैभव।
ब्रिटिश शासन ने भारतीय किसानों को कुछ परेशानियों से मुक्त किया तो कुछ नई उसके सामने खड़ी कर दीं। इसने आंतरिक अव्यवस्था को खत्म किया। लगान के तौर पर ज़बरदस्ती ज़्यादा पैसे ऐंठने के चलन को भी रोका। इन बुराईयों ने किसानों की उपज को ख़तरे में डाल दिया था। अंग्रेजी शासन ने किसानों को मौका दिया कि वे अपने अतिरिक्त उपज भंडार का ठीक से निस्तारण कर सकें। नगदी फसलें उगा सकें। जमीन पर पट्टेदारों के अधिकारों को मान्यता देने का भी लाभ हुआ। लेकिन कुछ अन्य घटनाक्रमों का ग्रामीण आबादी पर विपरीत प्रभाव भी पड़ा। जैसे…
विजया दशमी पर शक्ति की आराधना का इससे बेहतर तरीका शायद ही कोई दूसरा हो सकता है। इस वीडियो में दिख रहीं गायिका सावनी शेंडे हैं। वरिष्ठ और आला दर्ज़े की दक्ष भारतीय शास्त्रीय गायिका। उन्होंने माँ दुर्गा की आराधना का ये नायाब नमूना अपने यू-ट्यूब चैनल पर पेश किया है। #अपनीडिजिटलडायरी ने संगीत, साहित्य, कला, संस्कृति के प्रति अपने ‘सरोकार’ की वजह से साभार इसे अपने पन्नों पर दर्ज़ किया है
जैसे-जैसे विजयादशमी नज़दीक आती है, बड़े रावण की छोटे वाले से कोफ़्त बढ़ती जाती है। विजयादशमी के दिन तो वह फूटी आँख नहीं सुहाता। सोचता, यह जितनी जल्दी यहाँ से टले, उतना अच्छा। लाज़िमी भी है। मंच पर भाषण वो दे, समिति वालों को चन्दा वो दे और सारा अटेंशन लूट ले जाए मैदान में खड़ा छटाँक भर का रावण। क़द बड़ा हुआ तो क्या हुआ, रावणत्व में तो छोटा ही है, बड़े वाले की तुलना में छटाँक भर का।
लॉर्ड मेयो 1869-72 तक भारत के वायसराय थे। उन्होंने ब्रिटेन की सरकार को एक पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा, “दुनिया में भारत जैसा शायद ही कोई देश हो, जहाँ सरकार का कृषि के क्षेत्र से ऐसा सीधा हित जुड़ा हो। भारत सरकार सिर्फ ‘सरकार’ नहीं है, वह मुख्य ज़मींदार भी है। सरकार को जिस संपत्ति के लगान के रूप में बड़ा राजस्व मिलता है, वह किसी निजी मालिक की नहीं, सरकारी है। ऐसे में पूरे देश में कृषि के हालात सुधारने के लिए कदम उठाने पर सरकार और उसकी संपत्ति की अहमियत बढ़ती है। इसीलिए इंग्लैंड में जो काम बड़े जमींदार करते हैं, भारत
भगवान बुद्ध अपने अन्तिम उपदेश में बड़ी कठोर बात करते हैं। हालाँकि अभी तक हम बुद्ध को जहाँ भी देखते हैं हमेशा सौम्य, शान्त, सहज दिखाई देते हैं। लेकिन अन्तिम उपदेश के समय बुद्ध कठोर हो उठते हैं। सदा क्षमा करने वाले बुद्ध दंड देने की बात कहते हैं।
दरअसल, हर किसी को क्षमा करना सम्भव भी नहीं। बुद्ध सौम्य हैं। लेकिन व्यवहारिक भी हैं। बुद्ध केवल श्रद्धा की बात करते तो अपने उपदेश कैसे करते? श्रद्धा रहती तो प्राचीन सिद्धान्तों को यथावत् ही न मान लेते? अपने नए व्यवहारिक उपदेशों की आवश्यकता ही क्या थी?
दिसंबर-1858 में ब्रिटेन के तत्कालीन गृह मंत्री ने निर्देश दिया कि जो लोग “खाली पड़ी जमीनों पर कपास या निर्यात करने लायक अन्य उत्पाद की खेती करना चाहते हैं, उन्हें भारत सरकार जमीन उपलब्ध कराने पर विचार करे। इससे ब्रिटेन को कच्चे माल की अधिक आपूर्ति में हो सकेगी।” इसके बाद ऐसी अधिकांश जमीन सरकार की ओर से बाग़ानों के लिए उपलब्ध करा दी गई। गृह मंत्री के निर्देश में स्पष्ट था कि ऐसी जमीन सिर्फ़ यूरोपीय समुदाय के लोगों को उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहना है। यह निर्देश भारत सरकार के लिए तब काम आया, जब उसने 1871 में खाली जमीन लोगों को उपलब्ध कराने संबंधी नियम बनाए। इन नियमों के मुत
मैकॉले ने ब्रिटिश-भारत में कानून का राज स्थापित करने के लिए बड़े क्रांतिकारी सुधार सुझाए थे। उनका दृष्टिकोण भी सिर्फ कानूनी ढाँचे और न्यायिक प्रशासन तक सीमित नहीं था। उदाहरण के लिए उन्होंने दिसंबर 1835 में एक समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा था। इस समिति को जेलों से संबंधित मामले और वहाँ के अनुशासन आदि की जाँच का जिम्मा सौंपा जाना था। इसके पीछे उनका तर्क था, “सबसे अच्छी आपराधिक दंड संहिता भी तब तक अल्प-उपयोगी ही है, जब तक कि सज़ा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी मशीनरी न हो।” सो, उनके सुझाव पर यह समिति बनी भी, लेकिन गृह विभाग ने 1838 में आई इसकी रिपोर्ट को ख़ारिज़ कर दिया। दलील दी कि “इसे लागू करने