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कब अहिंसा भी परपीड़न का कारण बनती है?

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 23/11/2021 - मंगल, 11/23/2021 - 20:35

प्राचीन काल की बात है। किसी गाँव में चन्द्रभूषण नामक एक विद्वान पंडित रहते थे। उनकी वाणी में गज़ब का आकर्षण था। भागवत् कथा सुनाने में निपुण थे। उनकी वाणी से कथा सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इसीलिए उनके घर रोज कथा सुनने वालों की भीड़ लगी रहती। दूर-दूर से लोग चन्द्रभूषण से कथा सुनाते थे। उसी गाँव में दूसरे पंडित जी रहते थे। उनका नाम था, नंबियार। पढ़े-लिखे तो वे बहुत थे। लेकिन थोड़े घमंडी स्वभाव के थे। स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान भी समझते थे। सोचते कहाँ कल का यह बच्चा चन्द्रभूषण, जो अटक-अटक कर कथा पढ़ता है और कहाँ मैं शास्त्रों क

ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 20/11/2021 - रवि, 11/21/2021 - 09:01

एक मीना बाज़ार लगता था, हर वर्ष नवरात्रि में। उसमें घूमने जाने का मज़ा ही कुछ और होता था। बड़े-बड़े झूले उसकी पहचान थी। कई बार हिम्मत की कि किसी एक झूले में बैठूँ पर अन्दर का डर हमेशा हावी रहा। ऊँचाई, चक्राकार गति और कर्कश आवाज़ें नीचे से ही सुनकर भयभीत हो जाता था। रोपवे पर आज भी बड़ी हिम्मत के बाद बैठ पाता हूँ। नीचे देख नहीं पाता। ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं। जुगुप्सा रूपी भय दर्ज़ करती है, दिलो-दिमाग़ पर। इसलिए ऊँचाई कभी पसन्द नहीं आई। 

सोचिए कि जो हुआ, जो कहा, जो जाना, क्या वही अंतिम सत्य है

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 16/11/2021 - मंगल, 11/16/2021 - 23:06

तैत्तिरीय उनिषद् में एक प्रसंग है। ऋषि भृगु और उनके पिता का। ऋषि भृगु अपने पिता वरुण के पास जाते हैं और पूछते हैं, परमात्मा कैसा है? वरुण कुछ विचारमग्न होकर पुत्र को देखने लगते हैं। और भृगु उस परमात्मा को पाने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त कर देते हैं।

स्मृतियों के जंगल मे यादें कभी नहीं मरतीं

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 13/11/2021 - रवि, 11/14/2021 - 00:47

दो बार फोन लगाया पर नहीं उठाया, आख़िर रख दिया। सोचा कि अगला ड्यूटी पर होगा और जब समय मिलेगा तो ख़ुद कर लेगा। आख़िर रात में स्क्रीन पर नाम चमका तो लगा कि चलो, ज़वाब तो आया। बात शुरू की तो कुछ समझ नहीं आ रहा था। जैसे कोई गम्भीर हकलाने वाला हो और आवाज़ लथड़ रही हो। बहुत हिम्मत करके वो लगभग चार मिनिट में इतना ही बोल और समझा पाया कि टेक्स्ट मैसेज से बात करो। 

जो क्षमा करे वो महावीर, जो क्षमा सिखाए वो महावीर...

By अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 9/11/2021 - मंगल, 11/09/2021 - 22:49

एक सेठ ने अपने छोटे भाई को व्यापार शुरू करने के लिए कुछ धन दिया। लेकिन छोटे भाई ने व्यापार जमने के बाद धन वापस नहीं किया। धीरे-धीरे धन के कारण दोनों भाइयों में विवाद गहरा होता चला गया। दोनों में बातचीत बन्द हो गई। कई वर्ष बीत गए। 

सेठ का मन हमेशा इस बात से व्यथित रहता। किसी दिन सेठ ने एक महत्मा से अपनी व्यथा-कथा सुनाई। महात्मा ने कहा, “आप अपने भाई से क्षमा माँग लीजिए। आपकी व्यथा दूर हो जाएगी।” 

इस पर सेठ कहने लगे, “मैं क्यों क्षमा माँगूं?’ 

विचित्र हैं हम.. जाना भीतर है और चलते बाहर हैं, दबे पाँव

By संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 6/11/2021 - शनि, 11/06/2021 - 20:21

जिनसे उम्र भर लड़ते-भिड़ते रहते हैं, वे एक दिन हम सबसे दूर हो जाते हैं। सदा के लिए संसार त्याग देते हैं। हम दुख मनाते हैं। मातम में रहते हैं। फिर धीरे-धीरे पटरी पर लौटते हैं और दोबारा सुख खोजते हैं। खुशियाँ तलाशते हैं पर यह भूल जाते हैं कि खुशियाँ रिश्तों में नहीं हैं। सम्बन्धों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर हैं। 

राजनीति का पटाखा बाज़ार : मोदी बम, सिद्धू रॉकेट, केजरी तड़तड़ी.. और भी बहुत कुछ!

By ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 5/11/2021 - शुक्र, 11/05/2021 - 09:00

अब मार्केट में देवी-देवताओं के नाम वाले बम और पटाखे तो नहीं हैं, लेकिन नेताओं के नाम वाले पटाखों की भरमार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिशा-निर्देशों में कहा है कि पटाखे पॉल्यूशन-फ्री होने चाहिए। यानि उनसे किसी तरह का प्रदूषण न फैले। लेकिन इन नेता छाप पटाखों पर ये दिशा-निर्देश लागू नहीं होते। इसलिए आम आदमी को मशविरा दिया जाता है कि इनका इस्तेमाल सोच-विचारकर ही करें। 

बेटा! नाहक गरमी मत दिखा, हमने इसे घर की लक्ष्मी को निकालते देखा है

By समीर, भोपाल मध्य प्रदेश से, 1/11/2021 - सोम, 11/01/2021 - 23:38

घटना बहुत पुरानी नहीं है। लेकिन समय वह था, जब देश में धन-समृद्धि अधिक थी। मग़र फिर भी किसी ब्राह्मण का धनवान होना तो एक अनहोनी घटना ही होती थी। ऐसे ही, एक अत्यंत विरल महानुभव हमारे गाँव के हरिप्रसाद व्यास थे। व्यास जी के पास कोई दो सैकड़ा बीघा ज़मीन थी। बैलों की 30 से कम जोड़ी कभी नहीं रहती थीं उनके यहाँ। पाँच सौ से अधिक गायें थीं। सिर्फ़ गाय-बैलों की देखरेख के लिए पंद्रह-सोलह लोग थे। खेती के कामों के लिए हाली अलग थे। पंडित जी स्वभाव से थोड़े तेज थे, लेकिन अपने धर्मसम्मत आचरण, समझबूझ और व्यवहार से आसपास के 40 गाँवों में उनका सम्मान था। गाँव में किसी को भी दूध-दही- मठे की ज़रूर

वीर सावरकर की हिन्दु महासभा के उद्देश्य क्या बताए गए थे?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 30/10/2021 - शनि, 10/30/2021 - 13:20

सुभाष चंद्र बोस के विचारों और कार्यों ने भारत में तमाम युवाओं को प्रेरित किया। इन्हीं में एक अग्रणी नाम था विनायक दामोदर सावरकर (1883-1965) का। वे भी क्रांति के पथ पर चलते हुए भारत से अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने का मंसूबा पाले थे। उन्होंने 1919 में अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ‘हिंदु महासभा’ की स्थापना की। इस संगठन की छवि मुसलिम विरोधी बन गई थी क्योंकि यह भारतीय मुसलमानों को हिंदु धर्म में वापस लाने के लिए सक्रिय था। हालाँकि इसके कार्यक्रमों में दूसरा पहलू भी दिखता है।

महात्मा गाँधी को संत और राजनेता का असहज मिश्रण क्यों कहा जाता था?

By माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 30/10/2021 - शनि, 10/30/2021 - 13:01

बंगाल के विभाजन के ख़िलाफ़ हुआ आंदोलन वैसे तो राष्ट्रीय स्वरूप का था, फिर भी कुछ मुसलमानों ने इसका विरोध किया। इसे हिंदुओं की प्रतिक्रिया माना। ख़ास तौर पर मुसलिम आबादी की प्रतिक्रिया इस आंदोलन के विरुद्ध तीखी थी। उस पृष्ठभूमि में रूढ़िवादी मुसलिमों को प्रेरित किया कि कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए उन्हें भी राजनीतिक संगठन बनाना चाहिए। इस समय तक आज़ादी के आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह कांग्रेस के हाथ में आ चुका था। साथ ही उसके बारे में यह राय भी बनने लगी थी कि उसके संगठन पर अतिवादी नेता हावी हो गए हैं। लिहाज़ा अल्पसंख्यक मुसलिम प्रतिक्रि

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