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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 9/3/2021

भारतीय संस्कृति में समस्त विद्याओं का स्रोत यानि पैदा होने का स्थान वेद को माना जाता है। इसीलिए यह निश्चित है भारतीय दर्शन का मूल भी वेद ही हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक स्तर पर अत्यधिक उन्नत संस्कृति रही है। कारण शायद ‘भौतिक समृद्धि’ रहा होगा। जब पेट भरा हो, तब भजन ठीक से होता है। भोजन से तन की भूख शान्त होती है। भजन मन की भूख शान्त करने के लिए किया जाता है। जब मन की भूख शान्त होती है, तो आत्म यानि स्वयं को जानने की भूख पैदा होती है। बस, यहीं से दर्शन की उत्पत्ति शुरू हुई होगी।

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...पर उल्टा भी है- वृक्ष जब फलों से लद जाता है तो झुकता है!

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 4/3/2021

#अपनीडिजिटलडायरी पर पढ़ा... “झुकन झुकन से जानिए, झुकन झुकन पहचान। तीन जनें जादा (ज़्यादा) झुकें, चीता चाेर कमान।”

बढ़िया लिखा है... और जो लिखा गया है, मौज़ूदा लोक-व्यवहार में एक हद तक सही भी है।

पर दूसरा पहलू इसका उल्टा भी है - वृक्ष जब फलों से लद जाता है तो झुकता है

शायर भी कहते है, "यक़ीनन उसका क़द आपसे बड़ा रहा होगा। वो शख़्स जो आपसे झुककर मिला होगा।"

तीसरा पहलू भी है। कवि/शायर दुष्यन्त कुमार लिखकर गए  हैं, “ये सारा ज़िस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा। मैं सज़दे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।”

राज्यसभा टीवी : सूचना, मनोरंजन और ज्ञान का गुलदस्ता ; क्यों हमें इसके बन्द होने पर चिन्ता होनी चाहिए?

विकास, दिल्ली से, 2/3/2021

सवेरे-सवेरे दफ्तर के लिए घर से निकला। रास्ते में फेसबुक खोला तो इरफ़ान सर की पोस्ट देखी। वहीं से पता चला कि राज्यसभा टीवी बन्द हो गया। लोकसभा टीवी में इसका विलय कर दिया गया है। पढ़कर मैं मायूस हो गया। वैसे तो यह सूचनाभर है। लेकिन कुछ सूचनाएँ होती हैं, जिनके मिलने पर हमारे भीतर एक निश्चित वेग से कुछ दौड़ने लगता है। यही वजह है कि सूचना पाकर हमें कष्ट, दुःख, ख़ुशी जैसे मनोभावों का भान होता है। जो घट चुका है, वह तो समय से मायनस हो चुका है। वैसे घटना का एक अर्थ ‘मायनस होना’ भी है।  

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सोचना ज़रूरी है कि दिशा रवि मामले में आधी-अधूरी रिपोर्टिंग क्यों हुई?

विकास, दिल्ली से 26/2/2021

पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि मामले में फैसला आए तीन दिन बीत गए हैं। मैंने इसे अभी-अभी तीन दिन किया है। पहले यहाँ दो दिन लिखा था। जैसे ही लिखा, तीन दिन बीत गए हैं, मुझे रामायण का दोहा याद आने लगा- विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति।

सुकून वहाँ नहीं जहाँ हम ढूँढ़ते हैं

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 25/2/2021

जीवन की आपाधापी। तरक्की के ऊँचे पायदान। खूब पैसा। तमाम सुविधाएँ। लेकिन क्या इन सब को पाकर हम खुश हैं? संतुष्ट हैं? हमारा मन शान्त है?

इन सवालों के ज़वाब अधिकांश लोगों के पास ‘नहीं’ में ही हो सकते हैं। इसीलिए यहाँ फिर सवाल हो सकता है कि आख़िरकार ऐसा क्यों है कि जिन चीजों के पीछे हम भाग रहे हैं। जिन्हें हम कुछ हद तक हासिल भी कर रहे हैं। उन्हें पाकर, उनके लिए कोशिश कर के भी हमें आनन्द क्यों नहीं मिलता? 

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वो बूढ़ी औरत... नाम उसका ‘गरीबी’

विकास, दिल्ली से, 8/2/2021

पिछले दिनों एक साक्षात्कार के सिलसिले में लोकसभा जाना हुआ। इसकी आरम्भ सीमा के पास ही एक बूढ़ी औरत बैठी रो रही थी। उन्हें देखकर मुझसे रहा नहीं गया। उनसे पूछ बैठा, “क्या हुआ माँ जी?” मगर कुछ कहने के बजाय उनकी सिसकियाँ और बढ़ गईं। मैंने फिर उनसे कहा, “देखिए मैं आपके बेटे समान हूँ। कुछ बताइए तो शायद मैं आपकी कोई मदद कर सकूँ।”

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किसी का पत्थर, किसी के लिए हीरा

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 5/2/2021

कई बार कहा सुना गया है कि ‘हीरे की कीमत, जौहरी ही जानता है’। लेकिन क्या हमने इसी कहावत के दूसरे पहलुओं को भी जाना-समझा है? मसलन, इसका एक दूसरा पहलू कि ‘कोई पत्थर दरअसल हीरा होता ही तब है, जब वह सही हाथों में पहुँचता है।’ और तीसरा ये कि ‘जब तक पहचाना न जाए, तराशा न जाए, पत्थर हीरा नहीं होता।’ बहुत थोड़े से फर्क के साथ कही गई ये तीनों बातें अहमियत बड़ी रखती हैं। अपनी-अपनी, अलहदा। 

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जहाँ सिंह, वही सिंहासन

टीम डायरी, 22/1/2021

अभी हाल में एक तस्वीर सामाजिक मंचों (सोशल मीडिया) पर तेजी से प्रसारित हुई। इसमें एक सिंह सामान्य घरेलू सोफे पर बैठा दिखाई दिया। तस्वीर कहाँ की थी, असल थी या गढ़ी हुई, यहाँ ये बहुत मायने नहीं रखता। मायने रखता है, इस तस्वीर के पीछे छिपा सन्देश, जो हमारे काम का हो सकता है। इसीलिए यह सामान्य और सहज हँसी-मज़ाक जैसा दिखने वाला विषय भी #अपनीडिजिटलडायरी के इस लेख का कारण है।

पानी की कहानी, पानी की ज़ुबानी : मैं जल... मैं कल... मुझे सुनिए... मैं घायल!

देवांशी वशिष्ठ, दिल्ली से, 17/1/2021

मैं, जल, आपका प्राण। मेरी एक घूँट में ही जन्नत का आराम मिलता है। जब आप मुझे पीते हैं तो पानी हो जाता हूँ। जब सूर्य को चढ़ाते हैं, तो जल। मैं पंचमहाभूतों में से एक हूँ, जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। मेरे बिना सब सून है। इसीलिए रहीम कह गए हैं... रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।

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हमारी सोच और ईश्वर का न्याय

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 30/12/2020

अक्सर हम ईश्वर के न्याय पर सवाल उठाते हैं। हमारी यह मनोदशा खास तौर पर उस समय होती है, जब हमें लगता है कि हमारे साथ अन्याय हुआ है। ऐसे मौकों पर हम हमेशा सोचते हैं कि हमने तो कभी किसी के साथ गलत किया नहीं। फिर हमें ही ईश्वर ने तकलीफ़ क्यों दी? हमें औरों से कम क्यों दिया? वहीं दूसरी तरफ जिन लोगों काे हम हमेशा गलत करते देखते हैं, उन्हें सुख भोगते हुए पाते हैं। तब फिर हमारे मन में सवाल उठते हैं कि ईश्वर उन्हें पीड़ित-प्रताड़ित क्यों नहीं करते?

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