हर साल एक लड़के के माता-पिता उसे गर्मी की छुट्टी के लिए दादी के घर ले जाते थे, और वे दो हफ़्ते बाद उसी ट्रेन से घर लौट आते।
फिर एक दिन लड़का अपने माता-पिता से कहता है: "अब मैं अब बड़ा हो गया हूँ। क्यों न मैं इस साल अकेले ही दादी के घर जाऊँ?"
चर्चा के बाद माता-पिता भी सहमत हो जाते हैं। अब सब लोग प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं, और एक-दूसरे का अभिवादन कर रहे हैं। जैसे ही खिड़की के पास खड़े होकर पिता बेटे को यात्रा के लिए कुछ टिप्स देने लगते हैं, लड़का कहता है, “मुझे पता है। आप पहले ही मुझे कई बार बता चुके हैं!”
रोज़ाना की तुलना में आज मेट्रो सूनी है। इतना सूनापन डराता है। हालाँकि आज दिल्ली में कर्फ्यू है। लेकिन ज़िन्दगी तो चल ही रही है। कुछ ज़िन्दगियाँ लड़खड़ा रही हैं, तो उन्हें सम्भालने की कोशिश में कई ज़िन्दगियाँ लगी हैं। इस क्रूर समय में यही एक ख़ूबसूरत बात है।
मेट्रो में एक लड़का हैरान-परेशान है। बार-बार पानी पी रहा है। लगातार कहीं फ़ोन मिलाने की कोशिश कर रहा है। खीझ रहा है। बात नहीं हो पा रही है। एकाध जगह बात हुई तो "सलाम अलैकुम" से आगे नहीं बढ़ पाई। मास्क के ऊपर आँखें गीली हैं। माथे पर पसीने की सीलन है।
कहानियाँ रास्तों में बिखरी पड़ी थीं। कविताएँ पेड़ों पर लदी रहती थीं। धूल के हर कण में चलते-फिरते चरित्र नज़र आते थे। उसे लगता कि रचना बहुत सरल है और इसी राह पर चलते-चलते वह एक दिन इतना विपुल रच देगा कि शायद संसार में किसी से पढ़ना सम्भव ही नहीं हो पाएगा। पहले का रचा-बुना गया सब व्यर्थ हो जाएगा।
वह उन अभिन्न पलों का साक्षी रहा है, जो जीवन ने उसे भरपूर मात्रा में दिए; जिन्हें वह सहेजते हुए ही उम्र के उस पड़ाव पर आ गया कि सब कुछ विरल हो गया। मानो, इस यात्रा में उसे इतना मिला कि उसकी झोली भरते-भरते खाली हो गया। एकदम विरक्त और विलोपित।
आज शाम गायत्री मन्दिर जाना हुआ। वहाँ जाता हूँ तो अक्सर कोई न कोई बुज़ुर्ग मिल जाता है। उनसे बातें करता हूँ, तो कुछ नया जानने को मिलता है। आज भी एक बुज़ुर्ग मिल गए। उनसे बातें करने लगा। उन्होंने एक कहानी सुनाई, जिसे मैं हू-ब-हू यहाँ डायरी में दर्ज़ कर रहा हूँ। वे बताने लगे...
पिछली तीन कड़ियाें में चार्वाक दर्शन के बारे में थोड़ा कुछ जानने-समझने की कोशिश की। जबकि उससे पहले दो कड़ियों में इन प्रश्नों पर विचार किया कि भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी? और परम ब्रह्म को जानने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा? आज इसी दूसरे प्रश्न से सिलसिला आगे बढ़ाते हैं।
क्लबहाउस (ऐपल यूजर्स के लिए बतकही का अड्डा) पर चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर के साथ चुनिन्दा पत्रकारों (पढ़ना चाहिए, मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी के आलोचक) की बातचीत लीक होने के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार और भाजपा की जीत के कयास लगने तेज हो गए हैं। लोग कह रहे हैं कि प्रशान्त किशोर ने हार मान ली। भाजपा बंगाल जीत जाएगी। उनकी प्रतिक्रिया देख ऐसा लग रहा है, जैसे भाजपा के बंगाल जीत जाने से कयामत आ जाएगी, जो अब तक नहीं आई है।
भरत अपने ननिहाल से वापस अयोध्या पहुँचते हैं। अयोध्या में स्थितियाँ बहुत विकट थीं। एक तरफ राज सिंहासन प्रतीक्षा कर रहा था। दूसरी तरफ पिता की मृत्यु और अग्रज के वन गमन के दुःख से हृदय संतप्त था। किसका चयन करें। धर्मज्ञ भरत अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप पुत्रधर्म के निर्वाह के बाद दलबल के साथ श्रीराम को मनाकर वापस लाने निकल पड़ते हैं। श्रीराम के पास पहुँचकर मनाने के क्रम में ऋषि जाबालि श्रीराम से कहते हैं, “आप व्यर्थ वन जा रहे हो। मृत्यु के साथ सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। अब दशरथ आप के पिता नहीं हैं, न आप उनके पुत्र (वाल्मीकिविरचित रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग-108 श्
आज फेसबुक स्क्रॉल करते हुए ‘डायरी’ की एक पोस्ट सामने आ गई। पोस्ट में एक सुन्दर तस्वीर पर माखनलाल चतुर्वेदी जी की कविता लिखी थी। ‘पुष्प की अभिलाषा’। उसी से याद आया कि आज माखनलाल चतुर्वेदी जी की जयन्ती है। वरना हम भूल चुके हैं अपने कवियों, लेखकों और समाज के वास्तुकारों को। साथ ही ताज़ा हो गईं इस कविता से जुड़ी कुछ पुरानी यादें।
किताबें ज्ञान का स्रोत हैं या फिर ज्ञान किताबों के सृजन का माध्यम? इस प्रश्न पर विचार का भरा-पूरा कारण दिया है इस कविता ने। प्रश्न के मद्देनज़र इस कविता की हर लाइन गौर करने लायक है।
आचार्य चार्वाक बड़ी सुन्दर बात कहते हैं। उनकी बातें आज वर्तमान युग के एकदम अनुकूल हैं। बल्कि एक विचार तो यह भी हो सकता है कि वर्तमान बैंकिंग प्रणाली में प्रचलित समान मासिक किश्त (EMI) व्यवस्था शुरू करने वाला जरूर चार्वाक का अनुयायी रहा होगा। आज देखें, बैंक हर चीज ईएमआई पर देने को तैयार है। हम भी सब कुछ ईएमआई पर लेकर काम चला रहे हैं। और कोरोना महामारी ने तो हमें अनुभव करा दिया है कि हमारी ज़िन्दगी भी ईएमआई पर ही है। मानो, ईएमआई न भरने वालों से ये महामारी बकाया वसूल रही है, “लाओ वापस करो दी गई साँसे, तुमने