होली त्यौहार है रंग का, उमंग का। पर अगर दिलों में कड़वाहट घुली हो तो जीवन में न कोई उमंग रह जाती है, न रंग। इसीलिए हर साल होली आती है। हमारे बीच की कड़वाहट मिटाने के लिए। रंग और उमंग चढ़ाने के लिए। हालाँकि एक होली के दिन तो शायद यह सम्भव हो भी जाता हो, मगर क्या साल के पूरे 365 दिन, हर दिन हम कड़वाहट भूलकर रंग, उमंग के साथ रह पाते हैं? ज़वाब इसका बहुतों के लिए मुश्किल हो सकता है।
चाय। चाय केवल इसीलिए नहीं पी जाती कि अच्छी लगती है। चाय पीने के और भी कई कारण हो सकते हैं। चाय आदर-सत्कार की अनिवार्य वस्तु मानी जाती है। चाय पर न जाने कितने रिश्ते बन-बिगड़ जाया करते हैं। और फिर मैं तो ठहरा चाय का शौकीन। कोई मुझसे उसकी बात भी छेड़े, तो बातचीत का विस्तार फिर चाय की चुस्कियों के साथ ही होता है।
जिस उम्र में लोग आधुनिकता और दुनियावी चमक-दमक के पीछे भागते हैं, उस उम्र में कुछ युवा ऐसे भी हैं, जो संस्कृत और संस्कृति को चमका रहे हैं। उसे निखार रहे हैं। उसकी नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं।
ऐसे युवाओं में कुछ नाम हैं - शुभम आर्यन्, गौरव मलिक, शौर्य नान्दल और संजू नान्दल। इन युवाओं ने 25 मार्च को ही एक वीडियो ज़ारी किया है। होली के अवसर पर, संस्कृत भाषा में, भारतीय संस्कृति के रंगों से सजे पर्व की शुभकामनाएँ देने के लिए।
वीडियो में सुने जा रहे गीत के बोल हैं...
इसी गाढ़ी नीली दीवार के पीछे लटका है, माघ के शुक्ल पक्ष का चाँद, जो पूनम से होते हुए आज चौथ पर एक चौथाई कम हो गया है। बस यही, हाँ यही चाँद मुझे पसन्द है - पूनम का बड़ा सा खिला-खिला दूधिया रोशनी में नहाता चाँद मुझे पसन्द नही है, जिसे सारी दुनिया देखती है। आज के चाँद को देखने वही लोग देर तक जागते हैं, जो उपवास करते है, हिम्मत से भूखे रहकर बाट जोहते रहते हैं कि कब आसमान में चौथ का उदय होगा और चाँद निकलेगा।
ये लाइनें किसने लिखीं, पता नहीं। लेकिन जिसने भी लिखीं, क्या खूब और कितनी सच्ची लिखी हैं। दिल से लिखी हैं। सीधे दिल तक पहुँचती हैं। बीते दिनों सामाजिक कहे जाने वाले माध्यमों (Social Media) से होते हुए मुझ तक ये लाइनें पहुँचीं, तो मुझे लगा इसे #अपनीडिजिटलडायरी पर भी दर्ज़ करना चाहिए। इसीलिए लिखने वाले के प्रति ह्रदय से आभार व्यक्त करते हुए इन लाइनों का यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ, जिन्होंने चन्द मिनटों में ही मेरा और मेरे जैसे न जाने कितने लोगों का बचपन आँखों में तैरा दिया होगा।
मैं 70-80 के दशक का बचपन हूँ।
क्या है कि बहुत से मनुष्यों की प्रकृति बेचैन रहने की होती है। उनको कुछ ना कुछ चाहिए, जिसमें वे उलझे रहें। ऐसे ही कुछ लोगों के मन में हर चीज को खोद-खोद कर देखने की आदत लगी होगी। उनकी बेचैन प्रकृति ने उनके मन में उतने ही स्वाभाविक सवाल पैदा किए होंगे। जैसे, हवा क्या है? पानी क्या है? ज़मीन क्या है? आग क्या है? आकाश क्या है? ये कहाँ से आए? इन्हें किसने बनाया? क्यों बनाया? इनकी जरूरत क्या है? इन्हें मिटा कौन देता है? ऐसे तमाम सवालों से उन पहले से बेचैन लोगों की बेचैनी और बढ़ी होगी।
वीडियो में दिख रहा ये छोटा सा बच्चा दिल्ली के मयूर विहार स्थित रयान इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है। धैर्य जोशी नाम है इसका। इसी 26 जनवरी की बात है, जब ये सज-धजकर अपने ‘गणतंत्र दिवस’ और उसकी अहमियत के बारे में चन्द पंक्तियाँ बोल रहा था। निश्चित रूप से उसके शिक्षकों या माता-पिता ने उसे ये पंक्तियाँ रटवाई होंगी। पर उसने उन्हें इस ख़ूबसूरती से निभाया कि वहाँ मौज़ूद लोग उसे अपने मोबाइल कैमरों में कैद करने से ख़ुद को रोक नहीं पाए।
माँ अब बदल रही है। पर कितनी, कहाँ। और कहाँ नहीं। वक़्त के साथ उसका बदलना कितना ज़रूरी है। इस कविता में ऐसे कुछ पहलू छूने की कोशिश की गई है। कविता के साथ ही महिलाओं की तरफ़ एक महिला की महात्वाकाँक्षी पुकार भी है.. ..‘खोल दो बन्धन इनके, हर मंज़िल पा जाएँगी!
महान् गुणों से ओत-प्रोत महिलाएँ समर्थ थीं, हैं और रहेंगी भी। क्योंकि उनमें तमाम विपरीतताओं के बावज़ूद उस सामर्थ्य को हासिल कर लेने का इरादा होता है। कैसे भी। उदाहरण, अभी कुछ दिन पहले ही मेरे अनुभव से गुज़रा। मेरी सासू माँ श्रीमती शकुन्तला पाठक जी का उस दिन मेरे पास फोन आया। वे पूछ रही थीं, “बेटा गाड़ी में ऐसी कौन सी चीज लगती है, जिससे कहीं आते-जाते वक़्त बीच रास्ते में कहीं रुकना नहीं पड़ता।” उनकी बात सुनकर समझने में मुझे थोड़ा समय लगा। इस बीच उन्होंने जैसे ही बताया कि रास्ते में “सबकी गाड़ियाँ बिना रुके निकल जाती हैं, पर हमारी रुकी रहती है”, तो बात तुरन्त मेरी समझ में आ गई।&nb