बड़ी मौज़ूँ है ये कहानी। अभी जब जापान की राजधानी में टोक्यो में ओलम्पिक खेल चल रहे हैं, तब ख़ास तौर पर।
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होए।” यह दोहा हम बचपन से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। लेकिन इसे अपनाते-अपनाते पचपन के हो जाते हैं। फिर भी ठीक से अपना नहीं पाते। कारण? अच्छे या सद्-व्यवहार से बोलना अत्यधिक कठिन है। जो चीजें हमें सरल दिखती हैं, जरूरी नहीं कि वे सरल ही हों। अगर इतनी सरल होतीं तो बुद्ध को ‘सम्यक-वचन’ पालन का उपदेश नहीं देना पड़ता। इस कठिन सरल व्यवहार के परिणाम को इस कहानी से समझते हैं।
आज फेसबुक की याद गली से गुज़रा तो यादें मिलीं। उसने कमाल की चीज़ याद दिलाई। दो साल के अंतराल की। एक 2018 और दूसरी 2020 की। और इसी अंतराल में छिपा है एक सुखद संयोग। संयोग, दो अलग-अलग बरसों में, दो अलग-अलग शहरों में रहते हुए, दो अलग-अलग पुस्तक पंक्तियों को, दो अलग-अलग सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स से एक ही तारीख को, एक ही लेखक को पढ़ने का। अपने प्रिय कवि गीत चतुर्वेदी को पढ़ने का। और संयोग ही है कि 2021 में इसी तारीख को मैं फिर गीत की दो अलग-अलग पुस्तकों को अपने साथ लिए चल रहा हूँ। बिंज पर गीत ‘उस पार’ बैठे हैं और इधर झोले में ‘अधूरी चीज़ों का देवता’ है। ऐसा बहुत कम होता ह
उस ज़माने में ओडिशा या उत्कल प्रदेश के राजा हुआ करते थे इन्द्रद्युम्न। भगवान नीलमाधव, यानि श्रीहरि, श्रीकृष्ण के भक्त थे। कहते हैं, उन्हें एक रोज भगवान ने स्पप्न में आकर कहा, ‘समुद्र में लकड़ी का बड़ा लट्ठा द्वारका से बहकर तुम्हारी राजधानी की तरफ़ आ रहा है। तुम उसे मँगवा लो। उससे मेरी मूर्तियाँ बनवाकर मन्दिर में स्थापित करो।” भगवान के आदेश पर राजा ने अपने सैनिकों, सेवकों को समुद्र किनारे भेजा। वहाँ सच में एक लकड़ी का बड़ा लट्ठा उन्हें समुद्र में तैरता हुआ दिखाई दिया। उसे किसी तरह आदिवासियों की मदद से वे उठाकर राजप्रासाद तक लाए।
प्रिय मानसून,
कहाँ हो तुम? तुम्हें मालूम भी है, कब से यहाँ सब तुम्हारी राह देख रहे हैं? अब और देर मत करो आ जाओ। मैंने अख़बारों में तो पढ़ा था कि तुम इस बार जल्दी आ रहे हो। जून तक आ जाओगे। लेकिन यहाँ तो जुलाई भी एक-एक दिन बीतता जा रहा है और तुम्हारी कोई खोज ख़बर ही नहीं।
कल मैंने एक छोटी-सी गुहार लगाई तो तुम एक फुहार देकर लौट गए। फिर ढाक के वही तीन पात।
हम अपने जीवन में लोगों के बारे में धारणाएँ अक्सर बाहरी आवरण देखकर बना लेते हैं। रूप, रंग, वस्त्र के आधार पर व्यक्ति की छवि बना लेते हैं कि वह ऐसा होगा, वैसा होगा। मेरे एक मित्र हैं। वे दो भाई हैं। उनमें छोटा आधुनिक विचारों से युक्त सदैव अद्यतन (Update) रहता है। उसकी दिनचर्या में नियमित जिम शामिल है। वह अपने शरीर की सुडौल बनावट का ख्याल रखता है। खाना ऐसा खाता है, जो शरीर में वसा आदि की मात्रा को न बढ़ने दे।
प्राचीन ग्रीस की कहानी है। वहाँ के एक बड़े दार्शनिक हुए हैं, सुकरात। एक बार कोई परिचित उनके पास आए। आते ही बड़ी आतुरता से कहने लगे, “आपको पता है, आपके अमुक दोस्त के बारे में मैंने अभी-अभी क्या सुना है?” इस पर सुकरात ने उनसे कहा, “थोड़ा ठहरिए। इससे पहले कि आप मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताएँ, मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दीजिए।” वे सज्जन बोले, “ठीक है, पूछिए।”
इस पर सुकरात ने उनसे पहला सवाल किया, “क्या आपने मेरे मित्र के बारे में जो सुना, उसके बारे में आपको पूरा भरोसा है कि वह सच है?” ज़वाब में उन्होंने कहा, “नहीं।”
एक दिन बुद्ध प्रवचन देने के लिए अपने शिष्यों की सभा में पहुँचे। सभी शिष्य यह देख आश्चर्यचकित रह गए कि बुद्ध अपने साथ एक कपड़े का टुकड़ा लेकर आए हैं। जबकि वे हमेशा खाली हाथ आते थे। थोड़ी देर बुद्ध बिना बोले बैठे रहे और चुपचाप उस कपड़े के टुकड़े में गाँठें लगाते रहे। पाँच-छह गाँठें लगाने के बाद शिष्यों से पूछते हैं, “क्या यह कपड़े का वही टुकड़ा है जो गाँठें लगने के पहले था?”
उसके घर के बाहर चबूतरे पर कुछ बच्चे बैठे-ठाले पहेलियाँ बुझा रहे थे। इन्हीं में से एक पहेली थी, “मुर्गी पहले आई या अंडा आया।” पूछने और बताने वाले, दोनों के लिए ही यह पहेली बड़ी मज़ेदार थी। क्योंकि जब कोई कहता कि मुर्गी पहले आई तो अगला बोल उठता, “पर मुर्गी तो अंडे से पैदा होती है।” ऐसे ही, अगर कोई कहता कि अंडा पहले आया तो दूसरे बच्चे उसकी खिंचाई करते, “बुद्धू, अंडे तो मुर्गी देती है। इतना भी नहीं जानता।” फिर सब के सब जोर से ठहाका लगाकर हँसते।
1. इसलिए माँ का स्थान सबसे ऊपर :