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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

सिद्धार्थ के बुद्ध हो जाने की यात्रा की भूमिका कैसे तैयार हुई?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 18/5/2021

लगभग 2,600-2,700 वर्ष पूर्व भारत-भारती पर भासमान भास्कर का उदय हुआ। उसने भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित किया। यह सूर्योदय कपिलवस्तु के सिंहासन पर बैठने वाले परमसौभाग्यशाली राजा शुद्धोधन के राजमहल में हुआ। महाराज शुद्धोधन अपनी बड़ी रानी को प्रसव पूर्व रीति के अनुसार उनके पिता के घर (मायके) भेजते हैं। परन्तु मार्ग में ही लुम्बिनी नामक वन्य क्षेत्र में पुत्र का जन्म हो जाता है। वह तेजस्वी बालक जन्म के सात दिन बाद ही मातृछाया से वंचित हो जाता है। बालक का लालन-पालन उसकी विमाता करती हैं। तेजस्वी बालक का राशि नाम गौतम रखा गया। लोकप्रसिद्ध नाम- राजकुमार सिद्धार्थ।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 15/5/2021

एक संतरा सामने है, एक सेवफ़ल, एक बड़ा सा पपीता, एक कीवी, कुछ बेर रखे हैं। मैं सोचता हूँ कि आज भोजन न करूँ। इन चीज़ों से अपनी क्षुधा मिटाऊँ। आम का मौसम नहीं है। इसलिए थाली से आम गायब है। केले बाजार में बहुतायत में है पर मुझे पसंद नहीं। उनकी तासीर मेरे जिस्म से मेल नही खाती। अमरूद मौसम में बहुत खाए और अब जामुन का इन्तज़ार है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

मैं काल का ग्रास बनने से बचा हुआ हूँ, अन्धकार को सूरज का ग्रास बनाकर!

विकास, दिल्ली से 10/5/2021

दिल्ली। साल 2021, मई का महीना, 10 तारीख। बीती रात बारिश हुई है। इसे बारिश कहना गलत होगा। बादलों ने धधकती दिल्ली के कलेजे पर थोड़ा पानी डालकर उन्हें ठंडा करने की कोशिश की है शायद। अख़बारों में मौसम, मानसून की ख़बरें एक या दो कॉलम में दिख जाती हैं। अभी सवेरे हवा चल रही है। हवा में ठंडक है। लेकिन ये हवा पहली बार कुछ अलग-सी महसूस हो रही है। गोया इसमें कोई चीत्कार समाया हो। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता...

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 8/5/2021

सामने एक मराठी परिवार था, जिसमें एक बुजुर्ग साथ रहते थे। बाद में मालूम पड़ा कि वे अकेले ही थे। जीवन संग्राम अकेले ही लड़ते रहे और अपना जीवन परिजनों के सुख के लिए समिधा बना दिया। एक कड़कती बरसात की रात में देह छोड़ गए। अगले दिन सुबह जब हम सब लोग भीगते हुए श्मशान पहुँचे। सूखी लकड़ियों पर देह रखी। लेकिन शाम तक वह जल नहीं पाई। आख़िर अधजली देह को छोड़कर आ गए। कहते हैं, जो जीवन में अकेले रह जाते हैं, उन्हें अन्तिम समय में जलाने से अग्नि देव भी मना कर देते हैं। 

दर्शन हमें परिवर्तन की राह दिखाता है, विश्वरथ से विश्वामित्र हो जाने की!

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 4/5/2021

भौतिक उन्नति करना यानि आज के सन्दर्भ में कहें तो पैसा कमाना। सामान्य तौर पर इसे बुरा नहीं माना जाता। लेकिन हमें यह पता होना चाहिए कि जीवन का उद्देश्य क्या है। अन्यथा हम मानव नहीं रह जाते। मात्र एक जीवरूप रह जाते हैं, जो पेट भरता है। चाहे इस पेट के लिए किसी की जान ही क्यों न लेनी पड़े। कहीं-कहीं हम मानवत्व से गिरकर राक्षसत्व तक पहुँच जाते हैं, इसके लिए। यह होता कब है? जब हम केवल भौतिक उन्नति की तरफ अग्रसर रहते हैं। चार्वाक के अनुयायी अक्सर यही करते हैं। केवल भौतिक उन्नति को ध्येय मानकर अपने जीवन को कहीं न कहीं दुःख के गर्त धँसा लेते हैं। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा...

संदीप नाइक, देवास, मध्य प्रदेश से, 1/5/2021

पानी नीला था, पानी नदी में था। नदी धरती पर थी, धरती पर पेड़ थे। पर पेड़ हरे-भरे थे। धरती के ऊपर एक आसमान था। आसमान नीला था। आसमान में पक्षी जो उड़ते थे, वे रंग-बिरंगे थे। कोई काला, कोई नीला, कोई हरा, कोई बैगनी, कोई जामुनी, कोई लाल और कोई-कोई इन सब रंगों से मिला-जुला हुआ करता था। सभी पक्षी छत के ऊपर से निकलते तो मेरे आसमान का नीला रंग छुप जाता। उनकी छाँह पानी में नजर आती तो पानी का नीला रंग भी छुप जाता।

यह वैश्विक महामारी कोरोना हमें किस ‘दर्शन’ से साक्षात् करा रही है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 27/4/2021

अभी  22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ था। यह पहला अवसर है, जब पूरी दुनिया के ‘मानव’ एक ही समय में एक जैसी महामारी से पीड़ित है। और इससे बड़े आश्चर्य की बात है कि यह महामारी मानव को छोड़कर अन्य समस्त प्राणियों, समस्त प्रकृति के लिए वरदान बनकर आई है। 

स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 24/4/2021

यह भी शुरुआत ही है। लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो गया है। जीवन कुल चार मकानों के इर्द-गिर्द समेट कर रख लिया है मानो। पहली धुँधली स्मृति रज्जब अली खाँ वाले रोड के मकान की है। दूसरी, बजरंग पूरे में हनुमान मन्दिर के सामने वाले मकान की। तीसरी, जच्चा खाने वाले रोड के मकान की। और चौथी, इस स्थायी मकान की, जहाँ से लगता है, अब विदाई का समय करीब आ गया है। जैसे कबीर कहते हैं, "चार जना मिल माथो उठायो और बाँधी काठ की घोड़ी"।

हे राम! अब यूँ करो-ना, नहीं सहा जाता तेरे राज्य में

दीपक शर्मा, नीमराना, राजस्थान से, 23/04/2021

डायरी के इस पन्ने पर पड़ी तारीख अपने आप में सारी कहानी कहती है। यह ऐसी तारीख है, जब देश में कोरोना के मामले पहली बार सारे आँकड़ों को पार कर गए हैं। पिछले साल इन्हीं दिनों अमेरिका बिलबिला उठा था। यह वह समय था जब वहाँ एक दिन में तीन लाख मामले सामने आए थे। 

अब हमारे यहाँ हालात उस महाशक्ति से भी बदतर हो गए हैं। अभी दो दिन पहले यानी 21 तारीख को देश में 24 घंटे में पहली बार तीन लाख 14 हजार नए मामले सामने आए। ये कल के अख़बारों का शीर्षक था। 

आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 17/4/2021

कहानियाँ रास्तों में बिखरी पड़ी थीं। कविताएँ पेड़ों पर लदी रहती थीं। धूल के हर कण में चलते-फिरते चरित्र नज़र आते थे। उसे लगता कि रचना बहुत सरल है और इसी राह पर चलते-चलते वह एक दिन इतना विपुल रच देगा कि शायद संसार में किसी से पढ़ना सम्भव ही नहीं हो पाएगा। पहले का रचा-बुना गया सब व्यर्थ हो जाएगा। 

वह उन अभिन्न पलों का साक्षी रहा है, जो जीवन ने उसे भरपूर मात्रा में दिए; जिन्हें वह सहेजते हुए ही उम्र के उस पड़ाव पर आ गया कि सब कुछ विरल हो गया। मानो, इस यात्रा में उसे इतना मिला कि उसकी झोली भरते-भरते खाली हो गया। एकदम विरक्त और विलोपित।

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