अपना पन्ना

पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 18/9/2021

अभी धूप भी थी और बरसात भी। बचपन में ऐसी स्थिति में हम कहते थे चिड़ा-चिड़ी का ब्याह हो रहा है। बड़ा प्रतीक है, मौसम का यह फ्यूजन (मिश्रण)। अटपटा और विचित्र भी। पर जीवन अक्सर ऐसा ही होता है। चिड़ा-चिड़ी मात्र प्रतीक हैं और धूप में बरसात की बूँदें असली सच। ----- आस्था और भरोसा हमें अगली सुबह का सूरज देखने के लिए आश्वस्त करता है। हम आज से ऊब चुके होते हैं। इसलिए हर रात आज की स्मृतियों को दफन करते हैं। एक आह के साथ उन स्मृतियों को ठीक-ठाक करके तह में लपेटकर तकिये के नीचे रखकर सो जाते हैं कि भोर तक वे फुर्र हो जाएँगी पर सच यह नहीं होता। वे रातभर में मंजकर गाढ़ी और दुरूह हो जाती हैं।

बुद्ध कुछ प्रश्नों पर मौन हो जाते हैं, मुस्कुरा उठते हैं, क्यों?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 14/9/2021

एक बार बुद्ध के पास मौलुंकपुत्त नामक व्यक्ति आया। उसने बुद्ध से पूछा कि क्या वाक़ई ईश्वर है? 

बुद्ध ने ज़वाब दिया, “क्या वाक़ई में तुम्हें जानने की इच्छा है कि ईश्वर है या नहीं? या फिर तुम ऐसे ही पूछ रहे हो?” 

मौलुंकपुत्त ने बुद्ध से कहा, “बिल्कुल जानना है, मैं इतनी दूर आप से यही जानने आया हूँ।” 

मौलुंकपुत्त को लगा कि बुद्ध उसे गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं, तो उसने कहा, “मैंने कई विद्वानों से इस प्रश्न का ज़वाब माँगा। लेकिन कभी मिला नहीं।”  

पूर्णता ही ख़ोख़लेपन का सर्वोच्च और अनन्तिम सत्य है!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 11/9/2021

सुनता है गुरु ज्ञानी, गगन में आवाज़ हो रही झीनी-झीनी। ------ अड़सठ घाट भीतर हैं, कहाँ जाना है? न गंगा, न यमुना, सुमिरन कर ले मेरे मना, मन चंगा तो कठौती में ही गंगा है। बीती जा रही है, सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नही हैं। इसी घट अन्तर बाग-बग़ीचे, पर भागना रुक नहीं रहा है। सोचने-समझने को तैयार नहीं हैं।  -----

अपनी डिजिटल डायरी का एक वर्ष..

टीम डायरी, 11/9/2021

भारतीय परम्परा में "सप्त" का बहुत महत्त्व है। विवाह में सप्तपदी होती है। वहीं सात कदम साथ चलने से सज्जनों में मित्रता हो जाती है - "सतां सप्तपदी मैत्री"। सप्तऋषि, सात द्वीप, सात चक्र, सात दिन, सात स्वर, सात लोक, सात पदार्थ, पूजनीयों की संख्या भी सात ही है ईश्वर, गुरु, माता, पिता, सूर्य, अग्नि तथा अतिथि।

इस तरह बहुत सी चीजें है जो सात के समूह में उपलब्ध होती हैं। सूर्य की सात रश्मियाँ, जो सात भिन्न रंगों में होती हैं। सूर्य अपनी इन्हीं सात रश्मियों के माध्यम से जीवन प्रदान करता है। 

महात्मा बुद्ध आत्मा को क्यों नकार देते हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 7/9/2021

किन्हीं सेठ जी को अपने धन पर बहुत गर्व था। वे जब किसी को धन से मदद करते, तो सब जगह उसका बख़ान किया करते थे। अपना ही गौरवगान करते। एक दिन उन्हें पता चला कि नगर में महात्मा बुद्ध आए हैं। उन्होंने सोचा- क्यों न, महात्मा जी को कुछ भेंट दी जाए। थोड़ा पुण्य अर्जित कर लिया जाए। लिहाज़ा, वह हजार स्वर्ण मुद्राएँ लेकर बुद्ध के पास पहुँच गए। अभिवादन किया और पास ही बैठ गए। बुद्ध ने उनके आने का कारण पूछा, तो पहले उन्होंने अपनी दानशीलता की स्वयं प्रशंसा की। फिर बोले, “महात्मन्, आपके पास धन का अभाव रहता होगा। इसलिए मैं आपके लिए कुछ भेंट लाया हूँ। कृपया, इसे ग्रहण करें।” इसके बाद उन्होंने स

अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 5/9/2021

हम सब अधूरे हैं। आधे-अधूरे काम करते हैं। अधूरेपन में जीते हैं। अधूरे रहकर ही जीवन समाप्त करते हैं। अपने अधूरेपन के कारण ही जीवन मुकम्मल हो पाता है। --- हम अपने आपको इस क़दर अधूरा छोड़ते हैं कि किसी न किसी को उसे पूरा करना पड़ता है। जो पूरा करने का मुग़ालता रखता है, वह भी बहुत संत्रास में जीता है। पूरापन असल में कुछ होता ही नहीं है। --- जो चीज़ें अपने भव्य और सम्पूर्ण स्वरूप में दिखाई देती हैं, वह किसी समय-सीमा और हड़बड़ाहट का अन्तिम परिणाम नहीं बल्कि किसी तरह से ख़त्म कर नए अधूरे को थामने की पुरज़ोर कोशिश है। क्योंकि मानव मन एक ही जगह लम्बे समय तक टिक नहीं सकता। ---

कृष्ण और बुद्ध के बीच मौलिक अन्तर क्या हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 31/8/2021

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर कृष्ण के विविध रूपों की लोगों ने अपने-अपने मतानुसार आराधना की। प्राय: श्रीक़ष्ण का बाल रूप और उनके उस स्वरूप की लीलाएँ हर व्यक्ति के मन को मोह लेती हैं। सभी के मन को आकृष्ट करती हैं। इसका कारण है कि बाल स्वभाव, बाल रूप सहज, सरल और मोहक ही होता है। लेकिन वही बालक जब बड़ा होकर युवक बन जाता है और समाज में अपनी पहचान स्थापित करता है, तब वह हर किसी के लिए मोहक नहीं रह जाता। कारण कि युवा अपनी योजना, अपनी शैली, अपने विचारों का पुंज होता है। इसलिए उससे सम्बन्धित लोग उसकी इन तमाम चीजों को देखते हैं, आकलन करते हैं,

...पर हे कृष्ण! मैं हूँ तुम्हारे साथ, जीने और संग मरने के लिए भी!

आद्या दीक्षित, ग्वालियर, मध्य प्रदेश से, 30/8/2021

कृष्ण एक अभिशप्त मानव, निर्वासित देवता...। सुनने में अटपटा लगा न, अस्वीकार्य भी? ऐसा ही होता है। सच अक़्सर अस्वीकार्य और कड़वा सा लगता है। इसीलिए उस पर महिमामंडन का लेप, अलौकिता का छिड़काव और आदर्श का आवरण डालने की कोशिश की जाती है। और फिर निरपेक्ष सत्य को अपना-अपना सच बनाकर कितने ख़ुश हो लेते हैं हम मनुष्य। 

हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 28/8/2021

जीवन में जब होने, खोने और पाने के मायने जल्दी समझ आ जाते हैं, तो समझदार व्यक्ति ही आगे जाने या ख़ुद को ख़त्म करने का निर्णय लेता है।

--- 

बुद्ध की बताई ‘सम्यक समाधि’, ‘गुरुओं’ की तरह, अर्जुन के जैसी

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 24/8/2021

आतंक के शिकंजे में दबोचे जा चुके अफ़ग़ानिस्तान से आज, 24 अगस्त 2021 को गुरु ग्रन्थ साहिब की तीन प्रतियाँ भारत आई हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब, यानि वह पुस्तक जिसमें गुरुओं की शिक्षाएँ हैं। जिसमें गुरुओं के बताए मार्ग का उल्लेख है। जिसमें गुरुओं की ओर से मानव जीवन के लिए तय लक्ष्यों का ज़िक्र है। वे गुरु, जिन्होंने हिन्दुस्तान के एक काल-विशेष में सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपना सब कुछ अर्पित कर दिया। मानवता, सभ्यता, संस्कृति, अस्मिता की रक्षा के लिए अपना कुछ भी अपने पास नहीं रखा। जो धारण किया, वह भी सिर्फ़ इन्हीं लक्ष्यों के लिए। 

पृष्ठ

अपना पन्ना की  सदस्यता लें!