भारतीय संस्कृति में समस्त विद्याओं का स्रोत यानि पैदा होने का स्थान वेद को माना जाता है। इसीलिए यह निश्चित है भारतीय दर्शन का मूल भी वेद ही हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक स्तर पर अत्यधिक उन्नत संस्कृति रही है। कारण शायद ‘भौतिक समृद्धि’ रहा होगा। जब पेट भरा हो, तब भजन ठीक से होता है। भोजन से तन की भूख शान्त होती है। भजन मन की भूख शान्त करने के लिए किया जाता है। जब मन की भूख शान्त होती है, तो आत्म यानि स्वयं को जानने की भूख पैदा होती है। बस, यहीं से दर्शन की उत्पत्ति शुरू हुई होगी।
पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि मामले में फैसला आए तीन दिन बीत गए हैं। मैंने इसे अभी-अभी तीन दिन किया है। पहले यहाँ दो दिन लिखा था। जैसे ही लिखा, तीन दिन बीत गए हैं, मुझे रामायण का दोहा याद आने लगा- विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति।
पिछले दिनों एक साक्षात्कार के सिलसिले में लोकसभा जाना हुआ। इसकी आरम्भ सीमा के पास ही एक बूढ़ी औरत बैठी रो रही थी। उन्हें देखकर मुझसे रहा नहीं गया। उनसे पूछ बैठा, “क्या हुआ माँ जी?” मगर कुछ कहने के बजाय उनकी सिसकियाँ और बढ़ गईं। मैंने फिर उनसे कहा, “देखिए मैं आपके बेटे समान हूँ। कुछ बताइए तो शायद मैं आपकी कोई मदद कर सकूँ।”
लेखक नरेश मेहता ने अपनी ‘उत्तर कथा’ में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के गर्म और नर्म दल की नीति का विश्लेषण किया है। उसमें वे लिखते हैं कि नर्म दल की नीति कभी भी अवसरवादी सत्ता लोलुपता तक सिमट सकती है। जबकि गर्म दल की नीति कभी भी स्वयं को नुकसान पहुँचाने वाले अतिवाद का रूप ले सकती है।
कमाल यूँ ही नहीं होते। सालों-साल लगते हैं, उनके होने में। गढ़ने में, बढ़ने में। लेकिन जब होते हैं, तो यक़ीनी तौर पर सालों-साल ही नहीं, मुद्दतों तक याद रखे जाते हैं। हिन्दी सिनेमाई फ़नकार कमाल अमरोही, उनकी बेगम मीना कुमारी और इन दोनों का मिला-जुला शाहकार (रचना) ‘फिल्म पाकीज़ा’ ऐसे ही कमाल हैं। आज, यानि 4 फरवरी को ‘कमाल की पाकीज़ा’ का 50वाँ साल लग गया है, जो 2022 में पूरा होगा। ‘पाकीज़ा’ 1972 में फिल्मी पर्दे पर आई थी।
अक्सर कहा जाता है, ‘गहरी नदी का बहाव हमेशा शान्त होता है।’ एकदम सही है। लेकिन क्या इसी ‘कहन’ का दूसरा पहलू ये नहीं है कि शान्ति और स्थिरता गहराई से ही आती है। फिर चाहे वह गहराई पानी की, नदी की हो या फिर व्यक्तित्व की।
क्रिकेट से तो हम में से तमाम लोग वाकिफ़ हैं, लेकिन क्या ‘ब्लॉकेथॉन’ (Blockathon) को जानते-समझते हैं? सम्भव है, क्रिकेट से ताल्लुक रखने वाले कई लोग इससे भी बावस्ता हों। मगर क्या इसमें हम अपने जीवन-संघर्षों के लिए कोई सबक छिपा देख सकते हैं?... ये बहुतों के लिए मुश्किल सवाल हो सकता है। पर सच में, ब्लॉकेथॉन हमारे जीवन-संघर्ष से जुड़ता है। ये हमें उस संघर्ष में टिके रहने का बड़ा गुर सिखाता है।
परसों शाम अस्पताल से लौटते वक्त मन कुछ अंतर्मुखी हो रहा था। जीवन की सभी परिक्षाओं को लेकर मन में उहापोह हो रही थी और दो सवाल उठे। पहला- धार्मिक समाज को इतने अत्याचार क्यों सहना पड़ रहा है? दूसरा- धर्मविरोधी क्या भगवान का अंश नहीं है, तो उसका प्रतिकार क्यों किया जाए? सवाल उठाकर सद्गुरुदेव का ध्यान कर उनके समक्ष निवेदित कर दिए। फिर मन में जो विचार तरंगें प्रकट हुईं, उससे सारा कुहाँसा छँट गया। उन प्रश्नों और उत्तरों को यहाँ डायरी में दर्ज कर रहा हूँ, शायद और किसी भाग्यवान को लाभप्रद सिद्ध हो जाएँ!
This story was narrated to me by my uncle from the maternal side when I visited him in 2004. After retirement, he chose to stay at Pondicherry. He was old now and like any normal aged person, enjoyed sharing stories and anecdotes with others.