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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 17/7/2021

अभी किसी से फोन पर बहुत लम्बी बात हुई। आवाज़ों के शोर के पीछे जो आँसुओं का दर्द था, वो मैं महसूस कर पा रहा था। हम दोनों में पिछले दशक से एक अबोला प्रेम था। निश्छल, अबोध और बगैर अपेक्षाओं वाला। हम व्यक्त करने में बहुत समय लेते हैं। इसलिए जब हम किसी को सुनते हैं, तो एकाग्र होकर सुनें और अपनी ओर से कुछ न जोड़ें। बल्कि यदि कहना भी हो तो इतना ही कि बस सामने वाले को लगे कोई है जो सुन-गुनकर मेरे साथ है।

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दो शहर, दो बरस, दो पुस्तक पंक्तियाँ, एक कवि और एक ही तारीख

विकास, दिल्ली से 17/7/2021

आज फेसबुक की याद गली से गुज़रा तो यादें मिलीं। उसने कमाल की चीज़ याद दिलाई। दो साल के अंतराल की। एक 2018 और दूसरी 2020 की। और इसी अंतराल में छिपा है एक सुखद संयोग। संयोग, दो अलग-अलग बरसों में, दो अलग-अलग शहरों में रहते हुए, दो अलग-अलग पुस्तक पंक्तियों को, दो अलग-अलग सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स से एक ही तारीख को, एक ही लेखक को पढ़ने का। अपने प्रिय कवि गीत चतुर्वेदी को पढ़ने का। और संयोग ही है कि 2021 में इसी तारीख को मैं फिर गीत की दो अलग-अलग पुस्तकों को अपने साथ लिए चल रहा हूँ। बिंज पर गीत ‘उस पार’ बैठे हैं और इधर झोले में ‘अधूरी चीज़ों का देवता’ है। ऐसा बहुत कम होता ह

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सम्यक ज्ञान, हम जब समाज का हित सोचते हैं, स्वयं का हित स्वत: होने लगता है

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 13/7/2021

हम अपने जीवन में लोगों के बारे में धारणाएँ अक्सर बाहरी आवरण देखकर बना लेते हैं। रूप, रंग, वस्त्र के आधार पर व्यक्ति की छवि बना लेते हैं कि वह ऐसा होगा, वैसा होगा। मेरे एक मित्र हैं। वे दो भाई हैं। उनमें छोटा आधुनिक विचारों से युक्त सदैव अद्यतन (Update) रहता है। उसकी दिनचर्या में नियमित जिम शामिल है। वह अपने शरीर की सुडौल बनावट का ख्याल रखता है। खाना ऐसा खाता है, जो शरीर में वसा आदि की मात्रा को न बढ़ने दे। 

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जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 10/7/2021

जब 1982 में तिरुपति बालाजी चढ़े थे, तो पैदल ही चढ़ना होता था। वहाँ बहुत लोगों को कबीट ( कैथा ) के माफिक सर मुँडवाते देखा। हिन्दी बोल रहे थे, तो खूब मार खाई। एक गंजी स्त्री ने उन सबका मुकाबला किया और भीड़ को समझाया था, तेलुगु भाषा में कि बच्चे हैं, जाने दो। हिन्दी, यही इस देश की भाषा है। इसी यात्रा में राष्ट्रपति पुरस्कार लेना था। तत्कालीन मद्रास के यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन (YMCA) के मैदान पर 15 दिन रुककर कैम्प किया था। आने में कन्याकुमारी देखा पहली बार, रामेश्वरम और मण्डपम के बीच खुलने वाला समुद्र किनारे का पुल बना ही था नया-नया। वहाँ के लोगों की हिम्मत कमाल थी। पता नहीं था क

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बुद्ध बताते हैं, दु:ख से छुटकारा पाने का सही मार्ग क्या है

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 6/7/2021

एक दिन बुद्ध प्रवचन देने के लिए अपने शिष्यों की सभा में पहुँचे। सभी शिष्य यह देख आश्चर्यचकित रह गए कि बुद्ध अपने साथ एक कपड़े का टुकड़ा लेकर आए हैं। जबकि वे हमेशा खाली हाथ आते थे। थोड़ी देर बुद्ध बिना बोले बैठे रहे और चुपचाप उस कपड़े के टुकड़े में गाँठें लगाते रहे। पाँच-छह गाँठें लगाने के बाद शिष्यों से पूछते हैं, “क्या यह कपड़े का वही टुकड़ा है जो गाँठें लगने के पहले था?” 

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विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 3/7/2021

कल एक बहुत प्रिय मित्र को एकान्तवास में भेज दिया गया। उनका बेटा भी संग में, इस काल में ग्रसित हो गया। कल ही एक मित्र ने बताया कि मात्र 34 बरस का एक युवा यहाँ भर्ती कर लिया गया है। भोपाल में एक मित्र के माता-पिता अकेले रहते हैं। दिन-रात समाचारों की आँधी से भड़भड़ाकर वे मान बैठे हैं कि काल उनके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है। चलते-फिरते उन्हें लगता है कि कोई कह दे, यह घोषित कर दे कि वे अब ज़्यादा समय रह नहीं पाएँगे। एक मित्र आशंका में अपना सब कुछ खोलकर बैठ गए। बही खातों से लेकर कपड़े और जेवरात भी। घर मे उपस्थित लोगों को बाँट रहे हैं। हाथ की अँगूठी और गले से चेन निकालकर दे दी।

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बुद्ध त्याग का तीसरे आर्य-सत्य के रूप में परिचय क्यों कराते हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 29/6/2021

बुद्ध होने के लिए इच्छाओं को त्यागना पड़ता है। यह त्याग अत्यधिक कठिन है। इस त्याग को, इस निरोध को मोक्ष का मार्ग भी कहा गया है।

"क्षणिकाः सर्व संस्कारा इत्येवं वासना यका।  स मार्ग इह विज्ञेयो निरोधो मोक्ष उच्यते"।। ( षड्दर्शन समुच्चय, बौद्ध मत कालिका 7) अर्थ- समस्त संस्कार अर्थात पदार्थ क्षणिक हैं, इस क्षणिक भावना को, मार्गतत्त्व को और विषय भोगों के प्रति रागादि को, वासनाओं के नाश को, निरोध अर्थात मोक्ष कहते हैं।

बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है?

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 26/6/2021

रास्ते थे, सड़के थीं, नदियाँ, पहाड़, हवाई किलों से गुजरने वाले पथ और चलने वाले असंख्य पाथेय, जो अपनी-अपनी छाप देकर वहाँ चले गए हैं, जहाँ की आबादी आज की धरती पर बसे इन ज़िन्दा लोगों से बहुत-बहुत ज्यादा है। सक्षम, दक्ष और अनुभवी है। बस इतना है कि वे सब सदैव के लिए चुप हो गए हैं। उनके नामों का डंका जरूर आज भी गाहे-बगाहे लोग पीट लेते हैं पर उनमें से कोई आज हुँकार नहीं भरता।

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प्रश्न है, सदियाँ बीत जाने के बाद भी बुद्ध एक ही क्यों हुए भला?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 22/6/2021

त्यागना। इसे सामान्य भाषा में हमेशा के लिए किसी चीज को छोड़ देना कह देते हैं। जैसे दान देना भी त्याग है। वैसे, अक्सर हम धन त्यागने को ही असल त्याग मान लेते हैं। क्योंकि शायद धन ही ऐसी वस्तु है, जिसे छोड़ना सबसे कठिन है। अन्य चीजें त्यागना सरल है पर धन त्यागना बहुत कठिन। किसी ने कहा भी है, ‘चमड़ी जाए, दमड़ी न जाए।’ पर आधुनिक समाज में और भी बहुत सी चीजें त्यागी जा रही हैं। जैसे कि बुजुर्ग माता-पिता। महज़ अनुकूलता के लिए उनका त्याग कर दिया जाता है। हालाँकि आज व्यक्ति के परिवार में माता-पिता के अलावा और कोई रिश्ता-नाता होता नहीं। फिर भी

योग क्या है, कभी सोचकर देखा क्या हमने?

आद्या दीक्षित, ग्वालियर, मध्य प्रदेश से, 21/6/2021

बीते छह सालों की तरह इस सातवें साल भी 21 जून को दुनियाभर में ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के आयोजन हुए। ख़ूब तस्वीरें दिखीं। तरह-तरह के आसन, प्राणायाम आदि करते हुए आम से ख़ास तक सब नज़र आए। बड़ा आयोजन-अवसर है तो ज़ाहिर तौर पर ऐसे अन्य मौकों की तरह बधाई, शुभकामना सन्देशों का भी खूब आदान-प्रदान हुआ। लेकिन योग जैसे इस अति-आवश्यक और अति-महत्त्वपूर्ण विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ क्या? शायद नहीं। ज़रूरत ही नहीं समझी गई इसकी सम्भवत:। पर विचार-विनिमय होना चाहिए था। हम यहाँ वही कर रहे हैं।  

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